Thursday, July 29, 2021

सूरदास का वात्सल्य वर्णन

वृहत्   हिन्दी   कोश ’   के   अनुसार , ‘ वात्सल्य ’   के   कई   अर्थ   हैं ,  जैसे   ‘’ प्रेम ,  स्नेह ,  संतान   के   प्रति   माता - पिता   का   स्नेह ,  एक   भाव।   कुछ   आचार्य   ‘ वात्सल्य   रस ’  को   दसवाँ   रस   मानते   हैं। 
‘ हिन्दी   साहित्यकोश  ( भाग - एक ) ’  के   अनुसार , ‘’ वात्सल्य   शब्द   ‘ वत्स ’  से   व्युत्पन्न   और   पुत्रादिविषयक   रति   का   पर्याय   है।   प्राचीन   आचार्यों   ने   ‘ वात्सल्य   रस ’  न   लिखकर   ‘ वत्सल   रस ’  लिखा   है   और   वात्सल्य   को   इसका   स्थायी   भाव   माना   है। 
आचार्य   विश्वनाथ   ने   वात्सल्य   का   लक्षण   देते   हुए   कहा   है -  “ स्फुटं   चमत्कारितया   वात्सलं   च   रसं   विदुः।   स्थायी   वत्सलास्नेहः   पुत्रालम्बनं   मतम्।  “ अर्थात्   प्रकट   चमत्कार   होने   के   कारण   वत्सल   को   भी   रस   माना   है।   वात्सल्य   स्नेह   इसका   स्थायी   भाव   होता   है   तथा   पुत्रादि   आलम्बन।   बाल - सुलभ   चेष्टाओं   के   साथ - साथ   उसकी   विद्या ,  शौर्य ,  दया   आदि   विशेषताएँ   उद्दीपन   हैं।   आलिंगन ,  अंग   स्पर्श ,  सिर   का   चूमना ,  देखना ,  रोमांच ,  आनंदाश्रु   आदि   अनुभाव   हैं।   अनिष्ट   की   आशंका ,  हर्ष ,  गर्व   आदि   संचारी   भाव   माने   जाते   हैं। 
आचार्य   भोजराज   के   अनुसार ,  रसराज   सिद्ध   करने   के   प्रसंग   में   अन्य   रसों   की   गणना   करते   हुए   उनकी   संख्या   ‘ वात्सल्य   रस ’  को   मिलाकर   दस   मानी   जा   सकती   है। 11   इससे   ज्ञात   होता   है   कि   उनके   समय   तक   नौ   रसों   के   समकक्ष   वत्सल   को   भी   मान्यता   प्राप्त   हो   चुकी   थी।   अभिनव   गुप्त   के   मतानुसार   वात्सल्य   भाव   मात्र   है   और   उसकी   रस   रूप   में   स्वतंत्र   सत्ता   नहीं   मानी   जानी   चाहिए।  आचार्य   मम्मट   के   अनुसार -  ‘‘ जिस   रस   का   स्थायी   भाव   स्नेह   हो   उसकी   प्रेयांस   कहते   हैं   और   इसी   का   नाम   वात्सल्य   है। ” 
सूरदास   द्वारा   इस   वात्सल्य   भाव   का   इतना   विस्तार   दिया   गया   है   कि   ‘ सूरसागर ’   को   दृष्टि   में   रखते   हुए   वात्सल्य   को   रस   न   मानना   विडम्बना - सा   प्रतीत   होता   है।   ‘ हरिऔध ’  ने   मूलतः   इसी   आधार   पर   वात्सल्य   को   रस   सिद्ध   किया   है।   कृष्ण   लीला   के   अन्तर्गत   सूर   का   वात्सल्य   वर्णन   रसत्व   प्राप्ति   के   लिए   अपेक्षित   सभी   अंगोपांगों   को   अपने   में   समाविष्ट   किये   हैं।   ‘ सूरसागर ’  में   नंद   यशोदा   तथा   अन्य   वयस्क   गोपियों   का   बाल   कृष्ण   के   प्रति   प्रेम ,  आकर्षण ,  खीझ ,  व्यंग्य ,  उपालंभ   आदि   सब   कुछ   वात्सल्य   रस   की   ही   सामग्री   है।   कृष्ण   का   सौन्दर्य   वर्णन   तथा   बाल - क्रीड़ाओं   का   सूक्ष्म   मनोवैज्ञानिक   चित्रण   भी   इसी   के   अन्तर्गत   आता   है।   शृंगार   रस   की   तरह   वात्सल्य   के   भी   संयोग   और   वियोग   के   आधार   पर   दो   भेद   किये   हैं।
यदि   गंभीरता   से   देखा   जाए   तो   जीवन   का   मूलाधार   प्रेम   है।   यह   प्रेम   संसार   में   पशु ,  पक्षी ,  मानव   आदि   सभी   प्राणियों   में   पाया   जाता   है   और   इसके   विभिन्न   रूप   दृष्टिगोचर   होते   हैं।   कहीं   यह   समवयस्कों   में   मैत्री   या   सखा   भाव   के   रूप   में   दिखाई   देता   है   तो   कहीं   पति   और   पत्नी   के   मध्य   दाम्पत्य - भाव   के   रूप   में   दिखाई   देता   है।   इसी   तरह   वात्सल्य   भाव   प्रेम   का   एक   वह   प्रकार   है ,  जिसमें   किसी   छोटे   व्यक्ति   के   प्रति   निश्छल   एवं   निष्कपट   प्रेम   की   भावना   रहती   है।   वात्सल्य   ही   प्रेम   की   अत्यंत   निर्मल   एवं   पवित्र   दशा   है।   इसमें   सहज ,  सुकुमार   बालक   की   सामाजिक   चेष्टाओं ,  कौतुक   क्रीड़ाओं   एवं   अटपटे   कार्यों   का   प्राधान्य   रहता   है।   परिजन   एंव   पुरजन   बालक   की   चेष्टाओं ,  क्रीड़ाओं ,  कौतुकों   को   देख - देखकर   आनंद   विभोर   हो   जाते   हैं   और   अपने   आपको   भूल   जाते   हैं।
महाकवि   सूरदास   ने   वात्सल्य   भाव   का   वर्णन   अत्यंत   मार्मिकता   एवं   गंभीरता   से   किया   है।   उनके   इस   वर्णन   में   कवि   की   गहन   अनुभूति   दिखाई   देती   है।   पाश्चात्य   क्रोंचे   के   अनुसार   ‘ अनुभूति   ही   अभिव्यक्ति   है   और   अभिव्यक्ति   ही   काव्य   है। ’   हिन्दी   विद्वानों   के   अनुसार   सूर   का   वात्सल्य - वर्णन   हिन्दी - साहित्य   के   क्षेत्र   में   सर्वथा   अनुपम   एवं   अद्वितीय   है।   आचार्य   रामचन्द्र   शुक्ल   के   मतानुसार -  ‘‘ सूरदास   बाल - हृदय   का   कोना - कोना   झांक   आए   हैं। ”  उन्होंने   अपनी   बंद   आँखों   से   जो   वात्सल्य   वर्णन   किया   है।   वह   अद्वितीय   है।   आगे   आने   वाले   कवियों   की   शृंगार   और   वात्सल्य   की   उक्तियाँ   सूर   की   जूठन - सी   जान   पड़ती   हैं।   डॉ .  रामकुमार   वर्मा   ने   बाल - कृष्ण   के   शैशव   में ,  श्रीकृष्ण   के   मचलने   में ,  माँ   यशोदा   के   दुलार   में   हम   विश्वव्यापी   माता - पुत्र   का   प्रेम   देख   सकते   हैं।  आचार्य   हजारी   प्रसाद   द्विवेदी   ने   लिखा   है -  ‘‘ यशोदा   के   बहाने   सूरदास   ने   मातृ - हृदय   का   ऐसा   स्वाभाविक ,  सरल   और   हृदयग्राही   चित्र   खींचा   है   कि   आश्चर्य   होता   है। ”  डॉ .  हरवंश   लाल   शर्मा   के   अनुसार , ‘‘ सूर   का   वात्सल्य   भाव   विश्व - साहित्य   में   अपना   विशेष   स्थान   रखता   है। ”   डॉ .  द्वारिका   प्रसाद   सक्सेना   के   अनुसार , ‘‘ इसमें   कोई   संदेह   नहीं   कि   सूर   ने   श्रीकृष्ण   की   बाल - सुलभ   चेष्टाओं ,  मनोहारिणी   लीलाओं   एवं   रमणीय   बाल   क्रीड़ाओं   का   ऐसा   हृदयग्राही   एवं   प्रभावशाली   वर्णन   किया   है ,  जिसे   पढ़कर   एवं   सुनकर   हृदय   हठात्   उस   ओर   अकुर्षित   हो   जाता   है। ”    वे   आगे   लिखते   हैं -  ‘‘ वास्तव   में   बाल - सुलभ   चेष्टाओं   के   मनोमुग्धकारी   चित्रों   का   जितना   बड़ा   भंडार   सूर - सागर   में   विद्यमान   है ,  उतना   अन्यत्र   कहीं   भी   दिखाई   नहीं   देता।   सूर   के   इन   चित्रों   में   विविधता   है।   आकर्षण   है ,  रमणीयता   है   और   स्वाभाविकता   है ,  जिसके   फलस्वरूप   कोई   भी   अन्य   कवि   सूर   के   वात्सल्य - वर्णन   की   समानता   नहीं   कर   सका   है। ” 
सूरदास   का   वात्सल्य - वर्णन   अत्यंत   विशद्   एवं   गंभीर   है।   इसका   सम्यक्   अध्ययन   करने   के   लिए   इसे   दो   भागों   में   विभक्त   किया   जा   सकता   है -  1.  वात्सल्य   का   संयोग   पक्ष   2.  वात्सल्य   का   वियोग   पक्ष।

वात्सल्य   का   संयोग   पक्ष

वास्तव   में   सूरदास   बाल - मनोविज्ञान   के   इतने   बड़े   पारखी   थे   कि   उनके   बाल - वर्णन   में   बाल - स्वभाव   की   एक   भी   बात   छूटने   नहीं   पाई   है।   उन्होंने   कृष्ण   की   बाल - लीलाओं   की   जैसी   मनोहर   झांकी   प्रस्तुत   की   है ,  वैसी   झांकी   विश्व - साहित्य   की   किसी   भी   भाषा   में   मिलनी   संभव   नहीं   है।   इसीलिए   बाल - वर्णन   के   लिए   विश्व   में   अद्वितीय   कवि   सिद्ध   हुए   हें।   चक्षुविहीन   सूर   ने   बालक   कृष्ण   की   जिन   सूक्ष्मातिसूक्ष्म   मनोवृत्तियों   के   दर्शन   किए   हैं   तथा   हूबहू   उनके   चित्र   अपने   पदों   में   अंकित   किए   हैं ,  वह   एक   कुशल   चित्रकार   के   द्वारा   भी   संभव   नहीं   है।   बालक   कृष्ण   की   लीलाओं   का   उन्होंने   ऐसा   कलापूर्ण   चित्रण   किया   है   कि   उसे   पढकर   सहृदय   पाठक   झूम   उठता   है।   ‘ सूरसागर ’  में   लगभग   सात   सौ   पद   इसी   संदर्भ   में   रचे   गये   हैं।   सूर   ने   बालकों   की   सहज   मनोवृत्तियाँ   के   स्वाभाविक   चित्र   अंकित   करते   हुए   वात्सल्य   के   संयोग   पक्ष   का   बड़ा   ही   मार्मिक   एवं   मनोहारी   वर्णन   किया   है ,  जो   इस   प्रकार   है -
1. स्वभाविक   वेशभूषा   का   वर्णन
सूरदास   ने   बालक   कृष्ण   की   रूप   माधुरी   की   दिव्य   एवं   अलौकिक   चित्रों   द्वारा   बड़ी   ही   सजीवता   के   साथ   अंकित   किया   है।   बालक   कृष्ण   की   वेशभूषा   बड़ी   सरस ,  स्वाभाविक   एवं   चित्ताकर्षक   है।   यथा -
हरिजू   की   बाल - छवि   कहौं   बरनि।
सकल   सुख   की   सींव   कोटि   मनोज   सोभा   हरनि।
X       X       X       X
सोभा   कहत   नहीं   आवै।
अंचवत   अति   आतुर   लोचन - पुट   मन   न   तृप्ति   कौ   पावै।। 
वास्तव   में   कृष्ण   की   बाल - छवि   अनुपम   एवं   अद्वितीय   है।   ‘ देख   री   देख   आनंद - कंद ’ , ‘ सखि   री   नदनंदन   देखु ’ , ‘ वरनो   बाल - वेष   मुरारि ’   आदि   पदों   में   सूर   ने   कृष्ण   के   अलौकिक   एवं   अद्भुत   रूप   की   रमणीय   झाँकी   अंकित   की   है।
2. बालोचित   चेष्टाओं   एवं   क्रीड़ाओं   का   वर्णन
सूरदास   ने   श्रीकृष्ण   की   बाल - सुलभ   चेष्टाओं   एवं   विविध   क्रीड़ाओं   के   अत्यंत   स्वाभाविक   एवं   मनोमुग्धकारी   चित्र   अंकित   किये   हैं ,  जिनमें   कहीं   कृष्ण   घुटनों   के   बल   आँगन   में   चल   रहे   हैं ,  वहीं   मुख   पर   दधि   लेपकर   दौड़   रहे   हैं ,  कहीं   अपने   प्रतिबिम्ब   को   मणि - खंभों   में   निहार   रहे   हैं ,  कहीं   अपने   पैर   का   अंगूठा   चूस   रहे   हैं   तो   कहीं   हँसते   हुए   किलकारी   भर   रहे   हैं।   बालक   कृष्ण   अपना   हाथ   माता   को   पकड़ाते   हैं   तथा   डगमगाते   हुए   पैर   आगे   बढ़ाते   हैं।   यथा -
सिखवत   चलन   जसोदा   मैया।
अरबराई   कर   पानि   गहावत ,  डगमगाइ   धरनी   धरै   पैया।। 
बालक   कृष्ण   मक्खन   खाते   हुए   तथा   धूल   में   घुटनों   के   बल   चलते   हुए   बड़े   सुंदर   दिखाई   देते   हैं -
सोभित   कर   नवनीत   लिए।
घुटरुनि   चलत   रेनु - तन   मंडित   मुख   दधि   लेप   किए।
चारु   कपोल ,  लोल   लोचन ,  गोरोचन ,  तिलक   दिए।। 
सूर   ने   बाल - कृष्ण   की   बाल - सुलभ   क्रीड़ाओं   के   अनेक   चित्र   अंकित   किए   हैं।   पालने   में   शयन    करते   समय   बालक   कृष्ण   की   स्वाभाविक   बाल - चेष्टाएँ   द्रष्टव्य   हैं -
कर   पग   गहि ,  अंगूठा   मुख   मेलत।
प्रभु   पौढ़े   पालने   अकेले ,  हरषि   हरषि   अपने   रंग   खेलत।। 
बालक   कृष्ण   की   किलकारी   भरी   हँसी   एवं   मणि - जटित   आँगन   में   अपने   प्रतिबिम्ब   को   पकड़ने   के   लिए   दौड़ते   समय   का   चित्र   भी   बड़ा   ही   हृदयग्राही   बन   पड़ा   है -
किलकत   कान्ह   छुटुरुवनि   धावत।
मनिमय   कनक   नंद   के   आँगन   बिम्ब   पकरिबे   धावत।। 
3. बाल   मनोभावों   एवं   अन्त :  प्रकृति   का   चित्रण
सूर   ने   बाल - कृष्ण   के   हृदयस्थ   मनोभावों ,  बुद्धि - चातुर्य ,  स्पर्धा ,  खीझ ,  अपराध   करके   उसे   छिपाने   तथा   उसके   बारे   में   कुशलता   के   साथ   सफाई   देने   की   प्रवृत्ति   आदि   के   बड़े   मनोहारी   चित्र   अंकित   किये   हैं।   बालक   कृष्ण   दूध   पीने   में   आनाकानी   करते   हैं   और   माता   यशोदा   उसे   फुसलाकर   दूध   पिलाने   का   प्रयत्न   करती   है।   माता   यशोदा   उसे   कहती   है   कि   तुम   दूध   पी   लो ,  बलराम   की   तरह   तुम्हारी   चोटी   भी   बढ़   जाएगी।   दूध   पीते   हुए   बाल - कृष्ण   कहते   हैं -
मैया   कबहि   बढ़ेगी   चोटी।
किती   बार   मोहि   दूध   पिवत   भई ,  यह   अजहूँ   है   छोटी।।
तू   जो   कहति   बल   की   बैनी   ज्यों ,  हवै   है   लांबी   मोटी।।
काँचो   दूध   पिवावत   पचि - पचि   देत   न   माखन   रोटी।। 
दूसरा   चित्र   बाल - कृष्ण   की   बात - सलभ   सफाई   का   है।   कृष्ण   ने   मक्खन   चुराकर   खा   लिया   है   और   वे   रंगे   हाथों   पकड़े   भी   गए   हैं ,  क्योंकि   उनके   मुख   पर   मक्खन   लगा   हुआ   है।   माता   यशोदा   के   डाँटने   पर   बालकृष्ण   मधुर   सफाई   देते   हुए   कहते   हैं -
मैया   मैं   नहिं   माखन   खायो।
ख्याल   परै   ये   सखा   सबै   मिली   मेरे   मुख   लपटायौ।।
देखि   तु   ही   सींके   पै   भाजन   ऊँचे   धरि   लटकायौ।।
तुही   निरख   नान्हे   कर   अपने   मैं   कैसे   करि   पायो।। 
सूर   ने   बाल - सुलभ   खीझ   का   भी   चित्रण   किया   है।   बलराम   ने   कृष्ण   को   चिढ़ा   दिया   है   कि   तू   नंद   और   यशोदा   का   पुत्र   नहीं   है ,  तुझे   तो   मोल   खरीदा   गया   है ,  क्योंकि   नंद - यशोदा   तो   गोरे   हैं   और   तू   काला   है।   इस   बात   पर   कृष्ण   के   हृदय   में   खीझ   उत्पन्न   होती   हे ,  उसका   चित्ताकर्षक   वर्णन   सूर   ने   इस   प्रकार   किया   है -
मैया   मोहि   दाऊ   बहुत   खिझायो।
मो   सो   कहत   मोल   को   लीनो ,  तोहि   जसुमति   कब   जायो।।
कहा   कहौं   एहि   रिस   के   मारे ,  खेलन   हौं   नहिं   जातु।।
पुनि - पुनि   कहत   कौन   है   माता ,  को   है   तुम्हारे   तातु।।
गोरे   नंद   जसोदा   गोरी ,  तुम   कत   स्याम   सरीर।।
चुटकी   दै   दै   हँसते   ग्वाल   सब ,  सिखै   देत   बलवीर।। 
4. बालकों   के   संस्कार ,  उत्सवों   एवं   समारोहों   का   वर्णन
सूर   ने   बालकों   से   सम्बन्धित   संस्कारों ,  उत्सवों   एवं   समारोहों   का   वर्णन   करते   हुए   वात्सल्य   भाव   की   अभिव्यक्ति   की   है।   नकछेदन ,  नामकरण ,  वर्षगांठ   आदि   अवसरों   पर   माता - पिता   के   हृदय   में   जो   सहज   उत्साह   एवं   स्वाभाविक   प्रेम   उमड़ने   लगता   है।   कृष्ण   की   वर्षगाँठ   के   अवसर   पर   माता -  यशोदा   कितनी   प्रसन्न   होकर   अपनी   सखियों   के   साथ   मंगलगान   कराती   हैं ,  आँगन   में   मोतियों   का   चैक   पुरवाती   है   तथा   अन्य   तैयारी   कराती   हैं -
अरी   मेरे   लालन   की   आजु   वरष   गाँठ   सबै ,
साखिन   कौं   बुलाइ   मंगल - गान   करावौं।
चंदन   आँगन   लिपाई   मुतियन   चैके   पुराई ,
उमंग   अंगनि   आनंद   सौं   तूर   बजाओ।। 
5 . गो - दोहन   तथा   गोचारण   का   वर्णन
बालक   कृष्ण   का   गो - दोहन   के   लिए   मचलना ,  गौओं   को   दुहने ,  गोचारण   के   लिए   वन   में   जाने   की   हठ   करने ,  वन   में   माता   द्वारा   छाक   भिजवाने   आदि   का   वर्णन   करके   वात्सल्य   भाव   की   सुंदर   अभिव्यक्ति   की   है।   गो - दोहन   क   लिए   हठ   करते   हुए   बालक - कृष्ण   का   वर्णन   द्रष्टव्य   है -
तनक   तनक   मोय   दोहिनी   दै   दै   री   मैया।
तात   दुहन   सीखन   कह्यौ   मोहि   धोरी   गैया।।
अटपटे   आसन   बैठिकै   गोधन   कर   लीनो।
धार   अनत   ही   देखि   कै   ब्रजपति   हँस   दीनो।।
घर   घर   तै   आई   सबै   देखनु   ब्रज   नारी।
चितै   चोरचित   हरिलियो   हँसी   गोप - बिहारी।। 
जब   बालक   कृष्ण   गो - चारण   के   लिए   वन   में   जाने   लगे   हैं ,  तब   उनके   लिए   ‘ छाक ’   की   तैयारी   करती   हुई   माता   यशोदा   का   प्रेम   कितना   उमड़ने   लगता   है -
जोरति   छाक   प्रेम   सों   भैया।
ग्वालनि   बोलि   लए   अधजेंवत   उठि   धाय   छोउ   भैया।।
भूखे   गए   आजु   दोउ   मैया   आपहि   बोलि   मंगाई।
सब   माखन   साजो   दधि   मीठो   मधु   मेवा   पकवान।।
‘ सूर ’   स्याम   को   छाक   पठावति   कहति   ग्वाल   सों   जान।। 

वात्सल्य   का   वियोग - पक्ष

सूर   ने   शृंगार   रस   की   भाँति   वात्सल्य   के   वियोग   पक्ष   का   भी   अत्यंत   हृदयद्रावक   चित्रण   किया   है।   यथा -
1. श्रीकृष्ण   के   मथुरा - गमन   पर  -
वियोग   वात्सल्य   की   सबसे   सुंदर   झलक   श्रीकृष्ण   के   मथुरा - गमन   पर   अंकित   की   गई   है।   श्रीकृष्ण   के   मथुरा   जाने   का   समाचार   पाते   ही   माता   यशोदा   के   हृदय   में   वात्सल्य   का   स्त्रोत   इस   तरह   उमड़   पड़ता   है   और   माता   का   रोम - रोम   यह   पुकार   उठता   है -
है   कोई   ब्रज   में   हितु   हमारो ,  चलत   गोपालहि   राखै।
कहा   करे   मेरे   छगन   मगन   को ,  नृप   मधुपुरी   बुलायौ।
सुफलक   सुत   मेरे   प्राण   हनन   को   काल   रूप   होई   आयौ।। 
2. मथुरा   से   नंद   के   अकेले   लौटने   पर
सूर   ने   यशोदा   के   मातृ - हृदय   की   वात्सल्यमयी   झाँकी   तन्मयता   के   साथ   अंकित   की   है ,  जिस   समय   नंद   अकेले   ही   मथुरा   से   लौटते   हैं   और   माता   यशोदा   उन्हें   द्वार   पर   अकेला   खड़ा   देखकर   क्षोभ   के   मारे   आकुल   हो   उठती   है।   उस   क्षण   माता   यशोदा   का   हृदय   से   वात्सल्य   रस   फूट   पड़ता   है।   वे   अपने   प्रिय   पुत्र   के   अभाव   में   एक   सहज   टीस ,  स्वाभाविक   व्याकुलता   तथा   व्यथा   से   परिपूर्ण   होकर   अपने   पति   नंद   को   फटकार   उठती   है -
जसुदा   कान्हा   कान्ह   के   बूझै।
फूटि   न   गई   तुम्हारी   चारों   कैसे   मारग   सूझै।।
छांडि   स्नेह   चले   मथुरा ,  कत   दौरिन   चीर   गह्यौ।
फाटि   न   गई   वज्र   की   छाती ,  कत   यह   सूल   सह्यौ।। 
3. श्रीकृष्ण   के   मथुरा   में   ही   निवास   करने   पर
वियोग   वात्सल्य   की   हृदयद्रावक   झाँकी   सूर   ने   उस   समय   अंकित   की   है ,  जिस   समय   श्रीकृष्ण   अनेक   बुलावा   भेजने   पर   भी   मधुरा   से   गोकुल   नहीं   आते   और   माता   अपने   पुत्र   के   योग्य   रुचिकर   वस्तुओं   को   नित्य   अपने   सामने   रखी   हुई   देखती   है।   उस   समय   माता   के   हृदय   में   कितनी   पीड़ा   होती   है ,  कितनी   टीस   उठती   है   और   उसके   उद्गारों   में   वियोग   वात्सल्य   उमड़ता   दिखाई   देता   है -
जद्यपि    मन   समुझावत   लोग।
सूल   होत   नवनीत   देखि ,  मेरे   मोहन   के   मुख   जोग।।
माता - यशोदा   रात - दिन   पागल - सी   रहती   है।   उसे   ब्रज   काटने   को   दौड़ता   है।   उसे   नित्य   प्रति   अपने   लड़ेते   लाल   के   खान - पान ,  रहन - सहन   आदि   की   चिंता   सताती   है।   यथा -
निसि   बासर   छतियाँ   ले   लाऊँ ,  बालक   लीला   गाऊँ।
वैसे   भाग   बहुरि   कब   ह्वै   हैं ,  मोहन   गोद   खिलाऊँ।। 
अपनी   वियोगपूर्ण   वात्सल्य   पीड़ा   से   व्याकुल   होकर   देवकी   से   कहती   है -
संदेसों   देवकी   सौं   कहियौ।
हौं   तो   धाय   तुम्हारे   सुत   की ,  दया   करत   ही   रहियौ।
प्रात   होत   मेरे   लाल   लडैते ,  माखन   रोटी   भावै।
जोई   जोई   मांगत   सोई   सोई   देती ,  क्रम   क्रम   करि   कै   हाते।
सूर   पथिक   सुनि   मोहि   रैन - दिन   बढ्यो   रहत   उर   सोच।। 
इस   प्रकार   वात्सल्य   का   बड़ा   ही   हृदयहारी   वर्णन   सूर   ने   किया   है   जिसमें   बालोचित   चेष्टाओं   एवं   क्रीड़ाओं   के   अतिरिक्त   मातृ - हृदय   की   भावुकता   की   मनोरम   अभिव्यक्ति   हुई   है।   वस्तुतः   सूरदास   के   उक्त   वात्सल्य   वर्णन   में   तन्मयता   है ,  स्वाभाविकता   है ,  मनोवैज्ञानिकता   है ,  सहज   आकर्षण   है।   वास्तव   में   सूरदास   बाल - प्रकृति   एवं   बाल   मनोवृत्तियों   के   कुशल   चितेरे   हैं।   यह   निर्विवाद   सत्य   है   कि   सूरदास   वात्सल्य   के   सर्वश्रेष्ठ   कवि   हैं।

Wednesday, November 15, 2017

सन्त काव्य धारा

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने निर्गुण संत काव्य धारा को निर्गुणज्ञानाश्रयी शाखा नाम दिया । आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी इसेनिर्गुण भक्ति साहित्य कहते हैं । रामकुमार वर्मा केवल संत-काव्यनाम से संबोधित करते हैं । संत शब्द से आशय उस व्यक्ति से है, जिसने सत परम तत्व का साक्षात्कार कर लिया हो । साधारणत: ईश्चर-उन्मुख किसी भी सज्जन को संत कहते हैं, लेकिन वस्तुत: संत वही है जिसने परम सत्य का साक्षात्कार कर लिया और उसनिराकार सत्य में सदैव तल्लीन रहता हो । स्पष्टत: संतों ने धर्मअथवा साधना की शास्त्रीय ढ़ंग से व्याख्या या परिभाषा नहीं कीहै । संत पहले संत थे बाद में कवि । उनके मुख से जो शब्दनिकले वे सहज काव्य रूप में प्रकट हुए । आज की चर्चा हमइसी संत काव्य की सामान्य प्रवृत्तियों (विशेषताओं) को लेकरकर रहें हैं :-

निर्गुण ईश्वर : संतों की अनुभूति में ईश्वर निर्गुण, निराकार और विराट है । स्पष्टत: ईश्वर के सगुण रूप का खंडन होता है । कबीर के अनुसार :- दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना । राम नाम का मरम है आना ।। संतों का ईश्वर घट-घट व्यापी है, जिसके द्वार सभी वर्णों और जातियों के लिए खुले हैं । निर्गुण राम जपहु रे भाई ? अविगत की गति लिखी न जाई । 

1 बहुदेववाद या अवतारवाद का विरोध :- संतों ने बहुदेववाद तथा अवतारवाद की धारणा का खंडन किया है । इनकी वाणी में एकेश्वरवाद का संदेश है : अक्षयपुरुष इक पेड़ है निरंजन वाकी डार । त्रिदेवा शाखा भये, पात भया संसार ।। वस्तुत: संतों का लक्ष्य सगुण और निर्गुण से परे स्व-सत्ता की अनुभुति है । फिर भी सगुण उपासकों की तरह उन्होंने अपने प्रियतम (परम सत्ता) को राम, कृष्ण, गोविन्द, केशव आदि नामों से पुकारा है ।

2 सद्-गुरु का महत्व :- संत कवियों ने ब्रह्म की प्राप्ति के लिए सद्-गुरु को सर्वोच्च स्थान पर रखा है । राम की कृपा तभी संभव है, जब गुरु की कृपा होती है । कबीर गुरु को गोविंद से भी महत्वपूर्ण मानते हुए कहते हैं :- गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय । बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो बताय ।। 

3 माया से सावधान रहने का उपदेश : सभी संतों की वाणी में माया से सावधान रहने का उपदेश मिलता है । इन्होंने माया का अस्तित्व स्वीकार किया है । इनकी दृष्टि में माया के दो रूप हैं : एक सत्य माया, जो ईश्वर प्राप्ति में सहायक है; दूसरी मिथ्या-माया जो ईश्वर से विमुख रहती है । उनका कहना था - माया महाठगिनी हम जानी । कबीर माया के संबंध में कहते हैं : कबीर माया मोहिनी, मोहे जाँण-सुजांण । भागां ही छूटे नहीं, भरि-भरि मारै बाण ।। 

4 गृहस्थी धर्म में बाधक नहीं : प्राय: सभी संत पारिवारिक जीवन व्यतीत करते थे । वे आत्मशुद्धि और व्यक्तिगत साधना पर बल देते थे तथा शुद्ध मानव धर्म के प्रतिपादक थे । इस प्रकार एक ओर सभी संत भक्ति आंदोलन के उन्नायक थे, वहीं दूसरी ओर वे समाज-सुधारक भी थे ।

5 नारी के प्रति दृष्टिकोण : यद्यपि सभी संतों ने वैवाहिक जीवन जीया । लेकिन फिर भी इनके वचनों में नारी को माया का रूप माना गया है । कनक और कामिनी को वे बंधनस्वरूप मानते हैं । कबीर के वचनों में : नारी की झाई परत, अँधा होत भुजंग । कबिरा तिन की कहा गति नित नारी संग ।। किंतु पतिव्रता नारी की मुक्त कंठ से प्रशंसा भी करते हैं । पतिव्रता नारी की तरह साधक की भी अपने प्रिय के प्रति अटूट निष्ठा और अन्यों के प्रति विरक्ति होती है ।

6रहस्यवाद : इन्होंने ईश्वर को पति रूप में और आत्मा को को पत्नी रूप में चित्रित कर अलौकिक प्रेम की अभिव्यंजना की है, जिसे रहस्यवाद की संज्ञा दी जाती है । संतों ने प्रणय के संयोग और वियोग दोनों ही अवस्थाओं को लिया है । उनके विरह में मीरा के विरह जैसी विरह-वेदना है । कबीर आदि संतों ने विरहिणी आत्मा की विरह-व्यथा की मार्मिक अभिव्यंजना की है ।
7 बाह्य आडम्बरों का विरोध : सभी संत कवियों ने रुढ़ियों, मिथ्या आडम्बरों और अंध-विश्वासों का घोर विरोध किया है । मूर्ति-पूजा, तीर्थ-व्रत, रोजा-नमाज़, हवन-यज्ञ और पशु-बलि आदि बाह्य कर्मकांडों, आडम्बरों का उन्होंने डटकर विरोध किया है ।

8जातिपाति के भेद-भाव से मुक्ति : सभी संत कवियों ने मनुष्य को समान माना है और कोई भी भगवत-प्राप्ति कर सकता है । जाति-पाँति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई, आदि भावनाएँ इसी विचार की पौषक हैं । इस प्रकार संत साहित्य लोक-कल्याणकारी है ।

9प्रभाव : सिद्धौ और नाथ-पंथ के हठयोग, शंकर के अद्वैतवाद और सूफी-कवियों की प्रेम साधना का प्रभाव संतों की वाणी में दिखाई पड़ता है ।पंथों का उदय : प्राय: सभी संत निम्न जातियों में पैदा हुए । उनके प्रभाववश उनके पीछे निम्न वर्ण के लोगों ने उनके नाम से पंथ चला लिए; जैसे - कबीर-पंथ, दादू-पंथ आदि ।
भजन और नाम स्मरण : संतों की वाणी में नाम स्मरण प्रभु मिलन का सर्वोत्तम मार्ग है ।

10भाषा-शैली : प्राय: सभी संत अशिक्षित थे । इसलिए बोलचाल की भाषा को ही अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया । धर्म-प्रचार हेतु वे भ्रमण करते रहते थे । जिस कारण उनकी भाषा में विभिन्न प्रान्तीय शब्दों का प्रयोग हुआ । इन्हीं कारणों से इनकी भाषा सधुक्कड़ी या बेमेल खिचड़ी हो गई, जिसमें अवधी, ब्रजभाषा, खड़ी बोली, पूर्वी-हिंदी, फारसी, अरबी, संस्कृत, राजस्थानी और पंजाबी भाषाओं का मेल है । साथ ही प्रतीकों और उलटबासियों की शैलियों का प्रयोग बहुतायत हुआ, जिससे भाषा में दुरुहता बढ़ी । संत काव्य मुक्तक रूप में ही अधिक प्राप्त होता है । संतों के शब्द गीतिकाव्य के सभी तत्वों- भावात्मकता, संगीतात्मकता, संक्षिप्तता, वैयक्तिकता आदि से युक्त हैं । उपदेशात्मक पदों में माधुर्य के स्थान पर बौद्धिकता अवश्य है । इन्होंने साखी, दोहा और चौपाई शैली का प्रयोग किया है ।

11 छंद : संतों ने अधिकतर सधुक्कड़ी छंद का प्रयोग किया है । इनमें साखी और सबद प्रमुख हैं । साखी दोहा छंद है जबकि सबद पदों का वाचक है । संतों के सबद राग-रागिनियों में गाए जा सकते हैं । कबीर ने इनके अलावा रमैनी का भी प्रयोग किया है, जिसमें सात चौपाइयों के बाद एक दोहा आता है । इसके अतिरिक्त चौपाई, कवित्त, सवैया, सार, वसंत आदि छंदों का भी प्रयोग दिखाई पड़ता है ।अलंकार : संतों की वाणी सहज है । वह कोई साहित्यिक चेष्टा का परिणाम नहीं है । फिर भी उसमें स्वत: अलंकार-योजना हो गई है । उपमा, रूपक संतों के प्रिय अलंकार हैं । इसके अतिरिक्त विशेषोक्ति, विरोधाभास, अनुप्रास, यमक आदि का भी प्रयोग इनकी वाणी में मिल जाता है । उदाहरणार्थ : पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात । देखत ही छिप जाएगा ज्यों तारा परभात ।। (उपमा) नैनन की करि कोठरी पुतली पलंग विछाय । पलकों की चिक डारिकै पिय को लिया रिझाय ।। (रूपक)
रस : संत काव्य में भक्तिपरक उक्तियों में मुख्यत: शांत रस का प्रयोग हुआ है । ईश्वर भक्ति एवं संसार-विमुखता का भाव होने के कारण निर्वेद स्थायीभाव है । रहस्यवाद के अंतर्गत श्रृंगार-रस का चित्रण है, जिसमें संयोग की अपेक्षा वियोग-पक्ष अधिक प्रबल है । विरही को कहीं भी सुख नहीं : कबीर बिछड्या राम सूँ । ना सुख धूप न छाँह । जहां कहीं ईश्वर की विशालता का वर्णन है, वहाँ अद्भूत रस है, सुंदरदास ने स्त्री के शरीर का बीभत्स चित्रण किया है ।

Saturday, November 4, 2017

बाबा नागार्जुन

बाबा नागार्जुन को भावबोध और कविता के मिज़ाज के स्तर पर सबसे अधिक निराला और कबीर के साथ जोड़कर देखा गया है. वैसे, यदि जरा और व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य-परंपरा ही जीवंत रूप में उपस्थित देखी जा सकती है. उनका कवि-व्यक्तित्व कालिदास और विद्यापति जैसे कई कालजयी कवियों के रचना-संसार के गहन अवगाहन, बौद्ध एवं मार्क्सवाद जैसे बहुजनोन्मुख दर्शन के व्यावहारिक अनुगमन तथा सबसे बढ़कर अपने समय और परिवेश की समस्याओं, चिन्ताओं एवं संघर्षों से प्रत्यक्ष जुड़ाव तथा लोकसंस्कृति एवं लोकहृदय की गहरी पहचान से निर्मित है. उनका ‘यात्रीपन’ भारतीय मानस एवं विषय-वस्तु को समग्र और सच्चे रूप में समझने का साधन रहा है. मैथिली, हिन्दी और संस्कृत के अलावा पालि, प्राकृत, बांग्ला, सिंहली, तिब्बती आदि अनेकानेक भाषाओं का ज्ञान भी उनके लिए इसी उद्देश्य में सहायक रहा है. उनका गतिशील, सक्रिय और प्रतिबद्ध सुदीर्घ जीवन उनके काव्य में जीवंत रूप से प्रतिध्वनित-प्रतिबिंबित है. नागार्जुन सही अर्थों में भारतीय मिट्टी से बने आधुनिकतम कवि हैं.बाबा नागार्जुन ने जब लिखना शुरू किया था तब हिन्दी साहित्य में छायावाद उस चरमोत्कर्ष पर था, जहाँ से अचानक तेज ढलान शुरू हो जाती है, और जब उन्होंने लिखना बंद किया तब काव्य जगत में सभी प्रकार के वादों के अंत का दौर चल रहा था. बाबा अपने जीवन और सर्जन के लंबे कालखंड में चले सभी राजनीतिक एवं साहित्यिक वादों के साक्षी रहे, कुछ से संबद्ध भी हुए, पर आबद्ध वह किसी से नहीं रहे. उनके राजनीतिक ‘विचलनों’ की खूब चर्चा भी हुई. पर कहने की जरूरत नहीं कि उनके ये तथाकथित ‘विचलन’ न सिर्फ जायज थे बल्कि जरूरी भी थे. वह जनता की व्यापक राजनीतिक आकांक्षा से जुड़े कवि थे, न कि मात्र राजनीतिक पार्टियों के संकीर्ण दायरे में आबद्ध सुविधाजीवी कामरेड. कोई राजनीतिक पार्टी जब जनता की राजनीतिक आकांक्षा की पूर्ति के मार्ग से विचलित हो जाए तो उस राजनीतिक पार्टी से ‘विचलित’ हो जाना विवेक का सूचक है, न कि ‘विपथन’ का. प्रो. मैनेजर पांडेय ने सही टिप्पणी की है किएक जनकवि के रूप में नागार्जुन खुद को जनता के प्रति जवाबदेह समझते हैं, किसी राजनीतिक दल के प्रति नहीं. इसलिए जब वे साफ ढंग से सच कहते हैं तो कई बार वामपंथी दलों के राजनीतिक और साहित्यिक नेताओं को भी नाराज करते हैं. जो लोग राजनीति और साहित्य में सुविधा के सहारे जीते हैं वे दुविधा की भाषा बोलते हैं. नागार्जुन की दृष्टि में कोई दुविधा नहीं है…..यही कारण है कि खतरनाक सच साफ बोलने का वे खतरा उठाते हैं.अपनी एक कविता “प्रतिबद्ध हूँ” में उन्होंने दो टूक लहजे में अपनी दृष्टि को स्पष्ट किया है-प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ-
बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त-
संकुचित ‘स्व’ की आपाधापी के निषेधार्थ
अविवेकी भीड़ की ‘भेड़िया-धसान’ के खिलाफ
अंध-बधिर ‘व्यक्तियों’ को सही राह बतलाने के लिए
अपने आप को भी ‘व्यामोह’ से बारंबार उबारने की खातिर
प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ!नागार्जुन का संपूर्ण काव्य-संसार इस बात का प्रमाण है कि उनकी यह प्रतिबद्धता हमेशा स्थिर और अक्षुण्ण रही, भले ही उन्हें विचलन के आरोपों से लगातार नवाजा जाता रहा. उनके समय में छायावाद, प्रगतिवाद, हालावाद, प्रयोगवाद, नयी कविता, अकविता, जनवादी कविता और नवगीत आदि जैसे कई काव्य-आंदोलन चले और उनमें से ज्यादातर कुछ काल तक सरगर्मी दिखाने के बाद चलते बने. पर बाबा की कविता इनमें से किसी ‘चौखटे’ में अँट कर नहीं रही, बल्कि हर ‘चौखटे’ को तोड़कर आगे का रास्ता दिखाती रही. उनके काव्य के केन्द्र में कोई ‘वाद’ नहीं रहा, बजाय इसके वह हमेशा अपने काव्य-सरोकार ‘जन’ से ग्रहण करते रहे. उन्होंने किसी बँधी-बँधायी लीक का निर्वाह नहीं किया, बल्कि अपने काव्य के लिए स्वयं की लीक का निर्माण किया. इसीलिए बदलते हुए भावबोध के बदलते धरातल के साथ नागार्जुन को विगत सात दशकों की अपनी काव्य-यात्रा के दौरान अपनी कविता का बुनियादी भाव-धरातल बदलने की जरूरत महसूस नहीं हुई. “पछाड़ दिया मेरे आस्तिक ने” जैसी कविता में ‘बाबा का काव्यात्मक डेविएशन’ भी सामान्य जनोचित है और असल में, वही उस कविता के विशिष्ट सौंदर्य का आधार भी है. उनकी वर्ष 1939 में प्रकाशित आरंभिक दिनों की एक कविता ‘उनको प्रणाम’ में जो भाव-बोध है, वह वर्ष 1998 में प्रकाशित उनके अंतिम दिनों की कविता ‘अपने खेत में’ के भाव-बोध से बुनियादी तौर पर समान है. आज इन दोनों कविताओं को एक साथ पढ़ने पर, यदि उनके प्रकाशन का वर्ष मालूम न हो तो यह पहचानना मुश्किल होगा कि उनके रचनाकाल के बीच तकरीबन साठ वर्षों का फासला है. जरा इन दोनों कविताओं की एक-एक बानगी देखें-जो नहीं हो सके पूर्ण-काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम
जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर-चूर!
– उनको प्रणाम!और ‘अपने खेत में’ कविता का यह अंश देखें-अपने खेत में हल चला रहा हूँ
इन दिनों बुआई चल रही है
इर्द-गिर्द की घटनाएँ ही
मेरे लिए बीज जुटाती हैं
हाँ, बीज में घुन लगा हो तो
अंकुर कैसे निकलेंगे!
जाहिर है
बाजारू बीजों की
निर्मम छँटाई करूँगा
खाद और उर्वरक और
सिंचाई के साधनों में भी
पहले से जियादा ही
चौकसी बरतनी है
मकबूल फिदा हुसैन की
चौंकाऊ या बाजारू टेकनीक
हमारी खेती को चौपट
कर देगी!
जी, आप
अपने रूमाल में
गाँठ बाँध लो, बिल्कुल!!बाबा की कविताएँ अपने समय के समग्र परिदृश्य की जीवंत एवं प्रामाणिक दस्तावेज हैं. उदय प्रकाश ने सही संकेत किया है कि बाबा नागार्जुन की कविताएँ प्रख्यात इतिहास चिंतक डी.डी. कोसांबी की इस प्रस्थापना का कि ‘इतिहास लेखन के लिए काव्यात्मक प्रमाणों को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए’ अपवाद सिद्ध होती हैं. वह कहते हैं कि ‘हम उनकी रचनाओं के प्रमाणों से अपने देश और समाज के पिछले कई दशकों के इतिहास का पुनर्लेखन कर सकते हैं.’ कहने की जरूरत नहीं कि इस तरह का दावा बीसवीं सदी के किसी भी दूसरे हिन्दी कवि के संबंध में नहीं किया जा सकता, स्वयं निराला के संबंध में भी निश्चिंत होकर नहीं. बाबा को अपनी बात कहने के लिए कभी आड़ की जरूरत नहीं पड़ी और उन्होंने जो कुछ कहा है उसका संदर्भ सीधे-सीधे वर्तमान से लिया है. उनकी कविता कोई बात घुमाकर नहीं कहती, बल्कि सीधे-सहज ढंग से कह जाती है. उनके अलावा, आधुनिक हिन्दी साहित्य में इस तरह की विशेषता केवल गद्य-विधा के दो शीर्षस्थ लेखकों, आजादी से पूर्व के दौर में प्रेमचन्द और आजादी के बाद के दौर में हरिशंकर परसाई, में रेखांकित की जा सकती है. बाबा की कविताओं में यह खासियत इसीलिए भी आई है कि उनका काव्य-संघर्ष उनके जीवन-संघर्ष से तदाकार है और दोनों के बीच किसी ‘अबूझ-सी पहेली’ का पर्दा नहीं लटका है मुक्तिबोध की कविताओं के विचार-धरातल की तरह. उनका संघर्ष अंतर्द्वंद्व, कसमसाहट और अनिश्चितता भरा संघर्ष नहीं है, बल्कि खुले मैदान का, निर्द्वन्द्व, आर-पार का खुला संघर्ष है और इस संघर्ष के समूचे घटनाक्रम को बाबा मानो अपनी डायरी की तरह अपनी कविताओं में दर्ज करते गए हैं.बाबा ने अपनी कविताओं का भाव-धरातल सदा सहज और प्रत्यक्ष यथार्थ रखा, वह यथार्थ जिससे समाज का आम आदमी रोज जूझता है. यह भाव-धरातल एक ऐसा धरातल है जो नाना प्रकार के काव्य-आंदोलनों से उपजते भाव-बोधों के अस्थिर धरातल की तुलना में स्थायी और अधिक महत्वपूर्ण है. हालाँकि उनकी कविताओं की ‘तात्कालिकता’ के कारण उसे अखबारी कविता कहकर खारिज करने की कोशिशें भी हुई हैं, लेकिन असल में, यदि एजरा पाउंड के शब्दों में कहें तो नागार्जुन की कविता ऐसी ख़बर (news) है जो हमेशा ताज़ा (new) ही रहती है. वह अखबारी ख़बर की तरह कभी बासी नहीं होती. उनकी कविता के इस ‘टटकेपन’ का कारण बकौल नामवर सिंह ‘व्यंग्य की विदग्धता’ है. नामवर सिंह कहते हैं-व्यंग्य की इस विदग्धता ने ही नागार्जुन की अनेक तात्कालिक कविताओं को कालजयी बना दिया है, जिसके कारण वे कभी बासी नहीं हुईं और अब भी तात्कालिक बनी हुई हैं…..इसलिए यह निर्विवाद है कि कबीर के बाद हिन्दी कविता में नागार्जुन से बड़ा व्यंग्यकार अभी तक कोई नहीं हुआ. नागार्जुन के काव्य में व्यक्तियों के इतने व्यंग्यचित्र हैं कि उनका एक विशाल अलबम तैयार किया जा सकता है.दरअसल, नागार्जुन की कविताओं को अख़बारी कविता कहने वाले शायद यह समझ ही नहीं पाते कि उनकी तात्कालिकता में ही उनके कालजयी होने का राज छिपा हुआ है और वह राज यह है कि तात्कालिकता को ही उन कविताओं में रचनात्मकता का सबसे बड़ा हथियार बनाया गया है. उनकी कई प्रसिद्ध कविताएँ जैसे कि ‘इंदुजी,इंदुजी क्या हुआ आपको‘, ‘आओ रानी, हम ढोएंगेपालकी‘, ‘अब तो बंद करो हे देवी यह चुनाव काप्रहसन‘ और ‘तीन दिन, तीन रात‘ आदि इसका बेहतरीन प्रमाण हैं. असल में, बात यह है कि नागार्जुन की कविता, जैसा कि कई अन्य महान रचनाकारों की रचनाओं के संबंध में भी कहा गया है, आम पाठकों के लिए सहज है, मगर विद्वान आलोचकों के लिए उलझन में डालने वाली हैं. ये कविताएँ जिनको संबोधित हैं उनको तो झट से समझ में आ जाती हैं, पर कविता के स्वनिर्मित प्रतिमानों से लैस पूर्वग्रही आलोचकों को वह कविता ही नहीं लगती. ऐसे आलोचक उनकी कविताओं को अपनी सुविधा के लिए तात्कालिक राजनीति संबंधी, प्रकृति संबंधी और सौंदर्य-बोध संबंधी आदि जैसे कई खाँचों में बाँट देते हैं और उनमें से कुछ को स्वीकार करके बाकी को खारिज कर देना चाहते हैं. वे उनकी सभी प्रकार की कविताओं की एक सर्वसामान्य भावभूमि की तलाश ही नहीं कर पाते, क्योंकि उनकी आँखों पर स्वनिर्मित प्रतिमानों से बने पूर्वग्रह की पट्टी बँधी होती है.बाबा के लिए कवि-कर्म कोई आभिजात्य शौक नहीं, बल्कि ‘खेत में हल चलाने’ जैसा है. वह कविता को रोटी की तरह जीवन के लिए अनिवार्य मानते हैं. उनके लिए सर्जन और अर्जन में भेद नहीं है. इसलिए उनकी कविता राजनीति, प्रकृति और संस्कृति, तीनों को समान भाव से अपना उपजीव्य बनाती है. उनकी प्रेम और प्रकृति संबंधी कविताएँ उसी तरह भारतीय जनचेतना से जुड़ती हैं जिस तरह से उनकी राजनीतिक कविताएँ. बाबा नागार्जुन, कई अर्थों में, एक साथ सरल और बीहड़, दोनों तरह के कवि हैं. यह विलक्षणता भी कुछ हद तक निराला के अलावा बीसवीं सदी के शायद ही किसी अन्य हिन्दी कवि में मिलेगी! उनकी बीहड़ कवि-दृष्टि रोजमर्रा के ही उन दृश्यों-प्रसंगों के जरिए वहाँ तक स्वाभाविक रूप से पहुँच जाती है, जहाँ दूसरे कवियों की कल्पना-दृष्टि पहुँचने से पहले ही उलझ कर रह जाए! उनकी एक कविता ‘पैने दाँतोंवाली’ की ये पंक्तियाँ देखिए-धूप में पसरकर लेटी है
मोटी-तगड़ी, अधेड़, मादा सुअर…
जमना-किनारे
मखमली दूबों पर
पूस की गुनगुनी धूप में
पसरकर लेटी है
वह भी तो मादरे हिंद की बेटी है
भरे-पूरे बारह थनोंवाली!यों, बीहड़ता कई दूसरे कवियों में भी है, पर इतनी स्वाभाविक कहीं नहीं है. यह नागार्जुन के कवि-मानस में ही संभव है जहाँ सरलता और बीहड़ता, दोनों एक-दूसरे के इतने साथ-साथ उपस्थित हैं. इसी के साथ उनकी एक और विशेषता भी उल्लेखनीय है, जिसे डॉ. रामविलास शर्मा ने सही शब्दों में रेखांकित करते हुए कहा है-नागार्जुन ने लोकप्रियता और कलात्मक सौंदर्य के संतुलन और सामंजस्य की समस्या को जितनी सफलता से हल किया है, उतनी सफलता से बहुत कम कवि-हिन्दी से भिन्न भाषाओं में भी-हल कर पाए हैं.बाबा की कविताओं की लोकप्रियता का तो कहना ही क्या! बाबा उन विरले कवियों में से हैं जो एक साथ कवि-सम्मेलन के मंचों पर भी तालियाँ बटोरते रहे और गंभीर आलोचकों से भी समादृत होते रहे. बाबा के इस जादुई कमाल के बारे में खुद उन्हीं की जुबानी यह दिलचस्प उद्धरण सुनिए-कवि-सम्मेलनों में बहुत जमते हैं हम. समझ गए ना? बहुत विकट काम है कवि-सम्मेलन में कविता सुनाना. बड़े-बड़ों को, तुम्हारा, क्या कहते हैं, हूट कर दिया जाता है. हम कभी हूट नहीं हुए. हर तरह का माल रहता है, हमारे पास. यह नहीं जमेगा, वह जमेगा. काका-मामा सबकी छुट्टी कर देते हैं हम….. समझ गए ना?उनकी एक अत्यंत प्रसिद्ध कविता ‘अकाल और उसके बाद’ लोकप्रियता और कलात्मक सौंदर्य के मणिकांचन संयोग का एक उल्लेखनीय उदाहरण है.कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त.
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन के ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद.इस तरह की बाबा की दर्जनों खूबसूरत कविताएँ हैं जो इस दृष्टि से उनके समकालीन तमाम कवियों की कविताओं से विशिष्ट कही जा सकती हैं. कलात्मक सौंदर्य की कविताएँ शमशेर ने भी खूब लिखी हैं, पर वे लोकप्रिय नहीं हैं. लोकप्रिय कविताएँ धूमिल की भी हैं पर उनमें कलात्मक सौंदर्य का वह स्तर नहीं है जो नागार्जुन की कविताओं में है. बाबा की कविताओं में आखिर यह विलक्षण विशेषता आती कहाँ से है? दरअसल, बाबा की प्राय: सभी कविताएँ संवाद की कविताएँ हैं और यह संवाद भी एकहरा और सपाट नहीं है. वह हजार-हजार तरह से संवाद करते हैं अपनी कविताओं में. आज कविता के संदर्भ में संप्रेषण की जिस समस्या पर इतनी चिंता जताई जा रही है, वैसी कोई समस्या बाबा की कविताओं को व्यापती ही नहीं. सुप्रसिद्ध समकालीन कवि केदारनाथ सिंह स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं:
स्वाधीनता के बाद के कवियों में यह विशेषता केवल नागार्जुन के यहाँ दिखाई पड़ती है….यह बात दूसरे प्रगतिशील कवियों के संदर्भ में नहीं कही जा सकती.बाबा की कविताओं की इसी विशेषता के एक अन्य कारण की चर्चा करते हुए केदारनाथ सिंह कहते हैं कि बाबा अपनी कविताओं में ‘बहुत से लोकप्रिय काव्य-रूपों को अपनाते हैं और उन्हें सीधे जनता के बीच से ले आते हैं.’ उनकी ‘मंत्र कविता’ देहातों में झाड़-फूँक करके उपचार करने वाले ओझा की शैली में है.ओं भैरो, भैरो, भैरो, ओं बजरंगबली
ओं बंदूक का टोटा, पिस्तौल की नली
ओं डालर, ओं रूबल, ओं पाउंड
ओं साउंड, ओं साउंड, ओं साउंडओम् ओम् ओम्
ओम् धरती, धरती, धरती, व्योम् व्योम व्योम्
ओं अष्टधातुओं की ईंटों के भट्ठे
ओं महामहिम, महामहो, उल्लू के पट्ठे
ओं दुर्गा दुर्गा दुर्गा तारा तारा तारा
ओं इसी पेट के अंदर समा जाए सर्वहारा
हरि: ओं तत्सत् हरि: ओं तत्सत्भाषा पर बाबा का गज़ब अधिकार है। देसी बोली के ठेठ शब्दों से लेकर संस्कृतनिष्ठ शास्त्रीय पदावली तक उनकी भाषा के अनेकों स्तर हैं। उन्होंने तो हिन्दी के अलावा मैथिली, बांग्ला और संस्कृत में अलग से बहुत लिखा है। जैसा पहले भाव-बोध के संदर्भ में कहा गया, वैसे ही भाषा की दृष्टि से भी यह कहा जा सकता है कि बाबा की कविताओं में कबीर से लेकर धूमिल तक की पूरी हिन्दी काव्य-परंपरा एक साथ जीवंत है। बाबा ने छंद से भी परहेज नहीं किया, बल्कि उसका अपनी कविताओं में क्रांतिकारी ढंग से इस्तेमाल करके दिखा दिया। बाबा की कविताओं की लोकप्रियता का एक आधार उनके द्वारा किया गया छंदों का सधा हुआ चमत्कारिक प्रयोग भी है। उनकी मशहूर कविता “आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी” की ये पंक्तियाँ देखिए:यह तो नई–नई दिल्ली है, दिल में इसे उतार लो
एक बात कह दूँ मलका, थोड़ी–सी लाज उधार लो
बापू को मत छेड़ो, अपने पुरखों से उपहार लो
जय ब्रिटेन की जय हो इस कलिकाल की!
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
रफ़ू करेंगे फटे–पुराने जाल की!
यही हुई है राय जवाहरलाल की!
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!नागार्जुन की भाषा और उनके छंद मौके के अनुरूप बड़े कलात्मक ढंग से बदल जाया करते हैं। यदि हम अज्ञेय, शमशेर या मुक्तिबोध की कविताओं को देखें तो उनमें भाषा इस कदर बदलती नहीं है। ये कवि अपने प्रयोग प्रतीकों और बिम्बों के स्तर पर करते हैं, भाषा की जमीन के स्तर पर नहीं। उनके समकालीन कवि त्रिलोचन शास्त्री ने मुक्तिबोध और नागार्जुन की कविताओं की तुलना करते हुए एक बार कहा था-मुक्तिबोध की कविताओं का अनुवाद अंग्रेजी या यूरोपकी दूसरी भाषाओं में करना ज्यादा आसान है, क्योंकिउसकी भाषा भले भारतीय है, पर उसमें मानसिकताका प्रभाव पश्चिम से आता है; लेकिन नागार्जुन कीकविताओं का यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद बहुतकठिन होगा। यदि ऐसी कोशिश भी हो तो तीन–चारपंक्तियों के अनुवाद के बाद ‘फुटनोट‘ से पूरा पन्नाभरना पड़ेगा।यही असल में बाबा की कविताओं के ठेठ भारतीय और मौलिक धरातल की पहचान है, जो उन्हें अपने समकालीन दौर के कई प्रमुख कवियों-जैसे अज्ञेय, शमशेर और मुक्तिबोध से अलग भाव-भूमि पर प्रतिष्ठित करता है। इसी से जुड़ी एक बात और। ये कवि मुख्य रूप से साहित्य के आंदोलनों से, वह भी पश्चिम-प्रेरित आंदोलनों से प्रभावित होकर कविता करते रहे, जबकि नागार्जुन भारतीय जनता के आंदोलनों से प्रेरित और प्रभावित होकर, या यों कहें कि उनमें शामिल होकर कविता करते रहे हैं। बाबा भले ही वामपंथी विचारधारा से जुड़े थे, परंतु उनकी यह विचारधारा भी नितांत रूप से भारतीय जनाकांक्षा से जुड़ी हुई थी। यही कारण है कि वर्ष 1962 और 1975 में जब अधिकांश भारतीय ‘कम्यूनिस्ट’ रहस्यमय चुप्पी साधकर बैठे रहे थे, तब बाबा ने उग्र जनप्रतिक्रिया को अपनी कविताओं के माध्यम से स्वर दिया था। इन्हीं मौकों पर बाबा ने ‘‘पुत्र हूँ भारत माता का”, ‘‘और कुछ नहीं, हिन्दुस्तानी हूँ महज”, ‘’क्रांति तुम्हारी तुम्हें मुबारक”, ‘’कम्युनिज्म के पंडे”, “कट्टर कामरेड उवाच” तथा “इन्दुजी, इन्दुजी क्या हुआ आपको” जैसी कविताएँ लिखी थीं।बाबा की कविताओं की भाव-भूमि प्रयोगवादी और नई कविता की भाव-भूमि से काफी भिन्न है, क्योंकि इन प्रवृत्तियों की ज्यादातर कविताएँ समाज-निरपेक्ष और आत्मपरक हैं, जबकि बाबा की कविताएँ समाज-सापेक्ष और जनोन्मुख हैं। उनके समकालीन कवियों की रचनाओं के संदर्भ में देखने पर यह बात ज्यादा साफ तौर पर समझ में आती है कि बाबा की कविता का बदलते भाव-बोध के बदलते धरातल के साथ किस तरह का रिश्ता रहा है, अर्थात् यह उन सबसे किस हद तक जुड़ती है और किस हद तक अलग होती है।अज्ञेय और शमशेर जैसे कवियों की रचनाएँ कलावादी (art for art’s sake) भाव-भूमि पर प्रतिष्ठित हैं, जबकि नागार्जुन की कविताएँ जीवनवादी (art for life’s sake) भाव-भूमि पर। यह अंतर इन दोनों तरह की कविताओं के कथ्य, शिल्प और भाषा-तीनों स्तर पर देखा जा सकता है। निराला की उत्तरवर्ती दौर वाली कुछ कविताएँ, जैसे ‘कुकुरमुत्ता’ और ‘तोड़ती पत्थर’ भी जनवादी भाव-भूमि के करीब हैं। दोनों का मूल स्वर प्रगतिशील चेतना से सरोकार रखता है। निराला जहाँ खत्म करते हैं, बाबा वहाँ से शुरू करते हैं।रघुवीर सहाय और श्रीकांत वर्मा की कविताओं की भाव-भूमि बुनियादी रूप से बाबा की कविताओं से भिन्न है और यह भिन्नता मूलत: प्रतिबद्धता एवं सरोकार से संबंधित है। फिर भी, इन तीनों कवियों की काव्य-चेतना के बीच एक अंतर्संबंध भी है, जिसे रेखांकित करते हुए इब्बार रब्बी कहते हैं-वह समाज जो आदमी का शोषण कर रहा है, उसकीमानसिकता को उजागर करते हैं अप्रत्यक्ष रूप सेश्रीकांत वर्मा; उसके स्रोतों की पोल खोलते हैं रघुवीरसहाय; और उससे लड़ना सिखाते हैं नागार्जुन।इस अंतर और अंतर्संबंध को इससे भी बेहतर ढंग से समझने के लिए इन तीनों कवियों का वर्ष 1975 के ‘आपातकाल’ के प्रति नजरिया देखना महत्वपूर्ण होगा। श्रीकांत वर्मा आपातकाल के पक्ष में खड़े थे; रघुवीर सहाय ‘हँसो, हँसो जल्दी हँसो’ जैसी कविताओं के माध्यम से सांकेतिक प्रतिवाद कर रहे थे; जबकि बाबा नागार्जुन न सिर्फ तीखे तेवर वाली कविताएँ लिखकर, बल्कि स्वयं आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेकर और जेल की सज़ा भुगतकर आपातकाल का विरोध कर रहे थे। इसी तरह यदि हम मुक्तिबोध की कविता से बाबा की कविताओं की तुलना करें तो पाते हैं कि मुक्तिबोध की कविता गहन विचारशीलता और स्वातंत्र्योत्तर भारत के मध्यवर्गीय चरित्र में निहित सुविधाजीविता और आदर्शवादिता के बीच के अंतर्द्वन्द्व की कविता है, जिसमें आम आदमी का संघर्ष आत्मसंघर्ष के रूप में है। मुक्तिबोध अपने समय के संघर्षों से सैद्धांतिक स्तर पर जुड़ते हैं, दार्शनिक अंदाज में। जबकि नागार्जुन की कविता ‘अनुभवजन्य भावावेग से प्रेरित’ है और आत्म-संघर्ष की बजाय खुले संघर्ष के स्वर में है। वह अपने समय के संघर्षों से व्यावहारिक धरातल पर जुड़ते हैं, एक सक्रिय योद्धा की तरह।बाबा की कविताएँ सौंदर्य के भाव-बोध और भाषा-शैली आदि के स्तर पर सबसे अधिक केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन शास्त्री की कविताओं की भाव-भूमि के करीब हैं। इन तीनों कवियों के बुनियादी संस्कार और सरोकार काफी हद तक एक जैसे हैं और इसी वजह से तीनों एक धारा के कवि माने जाते हैं। फिर भी, बाबा की कविताएँ बाबा की कविताएँ हैं और वे केदार एवं त्रिलोचन की कविताओं की तुलना में अपनी अलग छाप छोड़ती हैं।मुझे उनकी एक कविता ‘बादल को घिरते देखा है’ स्कूल के दिनों से याद है। कुछ पंक्तियाँ सुनिए:अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।
छोटे–छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहीन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादलों को घिरते देखा है।
तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ–आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त–मधुर बिसतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।उनका मैथिली गीत, “श्यामघटा, सित बीजुरि-रेह” भी मुझे अति प्रिय है:श्याम घटा, सित बीजुरि–रेह
अमृत टघार राहु अवलेह
फाँक इजोतक तिमिरक थार
निबिड़ विपिन अति पातर धार
दारिद उर लछमी जनु हार
लोहक चादरि चानिक तार
देखल रहि रहि तड़ित–विलास
जुगुलकिशोरक उन्मद रास