सरकारी विद्यालय: भारत की आशाओं का आँगन
— प्रभात मिश्र
किसी सुबह यदि आप किसी सरकारी विद्यालय के प्रांगण में खड़े हों, तो आपको वहाँ केवल बच्चों की आवाज़ें नहीं सुनाई देंगी; वहाँ आपको भारत का भविष्य बोलता हुआ दिखाई देगा। कोई बच्चा फटी हुई कॉपी में अक्षर बना रहा होगा, कोई प्रार्थना में पूरे मन से स्वर मिला रहा होगा, कोई अपने मित्र के साथ टिफिन बाँट रहा होगा और कोई अपने शिक्षक से कोई नया प्रश्न पूछने का साहस जुटा रहा होगा। देखने में यह सब सामान्य लगता है, किंतु वास्तव में यही वे छोटे-छोटे दृश्य हैं जिनसे एक बड़े राष्ट्र का चरित्र निर्मित होता है।
आज सरकारी विद्यालयों की चर्चा प्रायः आँकड़ों, योजनाओं और कमियों के संदर्भ में होती है। कभी भवनों की कमी का उल्लेख होता है, कभी शिक्षकों की संख्या का, तो कभी परीक्षा परिणामों का। इन चर्चाओं का अपना महत्व है, लेकिन एक प्रश्न बार-बार मन में उठता है—क्या हमने कभी उन बच्चों की आँखों में झाँकने का प्रयास किया है, जिनके लिए विद्यालय केवल पढ़ने की जगह नहीं, बल्कि जीवन बदलने की संभावना है?
भारत का संविधान प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार देता है। यह अधिकार केवल विद्यालय तक पहुँचने का नहीं, बल्कि गरिमा के साथ सीखने, सोचने और अपने व्यक्तित्व को विकसित करने का अधिकार है। सरकारी विद्यालय इसी संवैधानिक संकल्प के सबसे बड़े वाहक हैं। वे समाज के उस वर्ग तक शिक्षा पहुँचाते हैं, जहाँ शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, बल्कि पीढ़ियों की नियति बदलने का माध्यम बन जाती है।
सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे साधारण परिवारों से आते हैं। उनके माता-पिता मजदूर, किसान, रिक्शा चालक, घरेलू कामगार, छोटे दुकानदार या असंगठित क्षेत्र के कर्मी होते हैं। उनके पास संपत्ति कम होती है, लेकिन अपने बच्चों के भविष्य के लिए विश्वास बहुत बड़ा होता है। वे जानते हैं कि यदि उनका बच्चा पढ़ जाएगा, तो उसका जीवन उनसे बेहतर होगा। यही विश्वास हर सुबह बच्चे को विद्यालय तक ले आता है।
लेकिन शिक्षा का अर्थ केवल पुस्तकें पढ़ लेना नहीं है। यदि शिक्षा मनुष्य को अधिक संवेदनशील, अधिक ईमानदार और अधिक उत्तरदायी नहीं बनाती, तो वह अधूरी रह जाती है। आज समाज में ज्ञान की कमी से अधिक मूल्यों का संकट दिखाई देता है। तकनीक ने सूचना को सहज बना दिया है, परंतु विवेक और करुणा आज भी शिक्षक और विद्यालय ही सिखा सकते हैं।
मुझे अनेक बार सरकारी विद्यालयों के बच्चों के बीच बैठने का अवसर मिला है। मैंने देखा है कि जिन बच्चों के पास संसाधन सबसे कम होते हैं, उनके भीतर सीखने की ललक अक्सर सबसे अधिक होती है। एक नई पुस्तक उनके लिए उत्सव होती है, शिक्षक की एक प्रशंसा उन्हें कई दिनों तक प्रेरित करती है और विद्यालय का छोटा-सा सम्मान उन्हें जीवनभर याद रहता है। इन बच्चों को देखकर विश्वास होता है कि अभाव प्रतिभा को रोक नहीं सकता; अवसरों का अभाव अवश्य उसे धीमा कर देता है।
सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए। संसाधनों की सीमाओं, प्रशासनिक दायित्वों और अनेक चुनौतियों के बीच भी हजारों शिक्षक निष्ठा के साथ अपना कार्य कर रहे हैं। वे केवल पाठ्यपुस्तक नहीं पढ़ाते, बल्कि बच्चों के भीतर आत्मविश्वास जगाते हैं। कई बार वे शिक्षक से अधिक अभिभावक, मार्गदर्शक और मित्र बन जाते हैं। समाज को ऐसे शिक्षकों की कहानियाँ भी उतनी ही प्रमुखता से सुनानी चाहिए जितनी कमियों की चर्चा करता है।
शिक्षा का प्रश्न केवल सरकार का प्रश्न नहीं है। समाज यदि विद्यालयों से दूर रहेगा, तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। प्रत्येक शिक्षित नागरिक, प्रत्येक साहित्यकार, प्रत्येक उद्योगपति, प्रत्येक पूर्व विद्यार्थी और प्रत्येक सामाजिक संस्था यदि वर्ष में कुछ समय भी किसी सरकारी विद्यालय के बच्चों के साथ बिताए, उन्हें पुस्तकें दे, उनसे संवाद करे, उनकी प्रतिभा को मंच दे, तो परिवर्तन की गति कई गुना बढ़ सकती है। राष्ट्र निर्माण साझी जिम्मेदारी से ही संभव है।
हिंदी के महान साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि साहित्य वही है जो मनुष्य को सुंदर बनाए। यही बात शिक्षा पर भी लागू होती है। शिक्षा वही है जो मनुष्य को अधिक मानवीय बनाए। यदि विद्यालय से निकलने वाला विद्यार्थी केवल सफल है, किंतु संवेदनशील नहीं, तो शिक्षा अपने उद्देश्य में सफल नहीं कही जा सकती।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सरकारी विद्यालयों को केवल सहायता का विषय न मानें, बल्कि सम्मान का विषय बनाएँ। हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारत की लोकतांत्रिक आत्मा इन विद्यालयों में सबसे अधिक दिखाई देती है। यहाँ जाति, धर्म, भाषा और आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर बच्चे एक साथ बैठते हैं। यही वह संस्कार है जो भविष्य के भारत को मजबूत बनाता है।
जब किसी सरकारी विद्यालय का बच्चा डॉक्टर बनता है, शिक्षक बनता है, वैज्ञानिक बनता है, सैनिक बनता है या साहित्यकार बनता है, तब उसकी सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होती; वह पूरे समाज की सफलता होती है। इसलिए सरकारी विद्यालयों में किया गया प्रत्येक निवेश वास्तव में भारत के भविष्य में किया गया निवेश है।
हमें बच्चों को यह विश्वास देना होगा कि उनकी पहचान उनके परिवार की आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उनके सपनों, परिश्रम और चरित्र से बनेगी। जिस दिन सरकारी विद्यालय का प्रत्येक बच्चा यह महसूस करेगा कि पूरा समाज उसके साथ खड़ा है, उसी दिन भारत की शिक्षा व्यवस्था एक नए युग में प्रवेश करेगी।
सरकारी विद्यालयों की घंटी केवल कक्षाएँ आरंभ होने की सूचना नहीं देती; वह हमें यह भी याद दिलाती है कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया हर दिन, हर कक्षा और हर बच्चे के साथ आगे बढ़ रही है। उन बच्चों की आँखों में जो प्रकाश है, वही भारत के भविष्य का वास्तविक उजाला है। उस उजाले को सुरक्षित रखना ही हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।
No comments:
Post a Comment