Thursday, July 9, 2026

शिक्षा का स्वप्न और भारत का भविष्य: फुले, गांधी, टैगोर और अंबेडकर के आलोक में.....

शिक्षा का स्वप्न और भारत का भविष्य: फुले, गांधी, टैगोर और अंबेडकर के आलोक में

— प्रभात मिश्र

किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति उसके प्राकृतिक संसाधन नहीं, उसके शिक्षित और संवेदनशील नागरिक होते हैं। सभ्यताएँ युद्धों से नहीं, शिक्षा से आगे बढ़ती हैं। भारत का आधुनिक इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि जिन महापुरुषों ने समाज को नई दिशा दी, उन्होंने शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं माना, बल्कि मनुष्य की चेतना, स्वतंत्रता और सामाजिक परिवर्तन का आधार समझा। महात्मा ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर और डॉ. भीमराव अंबेडकर—इन सभी की शिक्षा-दृष्टि अलग-अलग थी, किंतु उनका लक्ष्य एक था—ऐसा भारत जहाँ शिक्षा हर व्यक्ति तक पहुँचे और मनुष्य को अधिक मानवीय बनाए।

उन्नीसवीं शताब्दी का भारत गहरे सामाजिक विभाजनों से जूझ रहा था। शिक्षा कुछ वर्गों तक सीमित थी और स्त्रियाँ तथा वंचित समुदाय उससे लगभग बाहर थे। ऐसे समय में महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा को सामाजिक क्रांति का माध्यम बनाया। सावित्रीबाई फुले ने जब लड़कियों के लिए विद्यालय खोला, तब उन्होंने केवल एक विद्यालय की स्थापना नहीं की, बल्कि भारतीय समाज की जड़ सोच को चुनौती दी। उन्होंने सिद्ध किया कि शिक्षा जन्म से नहीं, अधिकार से मिलनी चाहिए।

महात्मा गांधी की शिक्षा-दृष्टि का केंद्र था—जीवन। वे चाहते थे कि विद्यालय केवल परीक्षा पास करने वाले विद्यार्थी न बनाएँ, बल्कि श्रम, आत्मनिर्भरता, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व से युक्त नागरिक तैयार करें। उनकी 'नई तालीम' में हाथ, हृदय और मस्तिष्क—तीनों के संतुलित विकास पर बल था। गांधी मानते थे कि शिक्षा तभी सार्थक है जब वह व्यक्ति को समाज से जोड़े और उसे श्रम का सम्मान करना सिखाए।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शिक्षा को प्रकृति, कला और स्वतंत्र चिंतन से जोड़ा। उनके लिए विद्यालय चारदीवारी में कैद संस्था नहीं, बल्कि ऐसा जीवंत वातावरण था जहाँ बच्चा प्रश्न पूछ सके, कल्पना कर सके और जीवन को अनुभव कर सके। वे रटने वाली शिक्षा के विरोधी थे। उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के भीतर छिपी सृजनात्मकता को मुक्त करना है।

इन सभी विचारों के बीच डॉ. भीमराव अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि विशेष महत्व रखती है। उनके लिए शिक्षा सामाजिक न्याय का सबसे शक्तिशाली साधन थी। उन्होंने स्वयं भेदभाव और वंचना का जीवन देखा था। इसलिए वे जानते थे कि शिक्षा केवल रोजगार नहीं देती, वह मनुष्य को आत्मसम्मान देती है। उनका आह्वान—"शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो"—आज भी भारत के लोकतांत्रिक जीवन का प्रेरक मंत्र है।

अंबेडकर का विश्वास था कि कोई भी समाज तब तक समान नहीं हो सकता जब तक शिक्षा पर सबका समान अधिकार न हो। वे शिक्षा को संविधान में निहित समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की भावना का आधार मानते थे। यदि किसी बच्चे की शिक्षा उसकी जाति, गरीबी या सामाजिक स्थिति से प्रभावित होती है, तो लोकतंत्र अधूरा रह जाता है।

आज भारत नई शिक्षा नीति के माध्यम से समग्र, बहुभाषी, कौशल-आधारित और लचीली शिक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। यह स्वागतयोग्य है, किंतु यह भी आवश्यक है कि नीति का लाभ समाज के अंतिम बच्चे तक पहुँचे। तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल शिक्षा तभी सार्थक होंगी जब गाँव के सरकारी विद्यालय का बच्चा भी उसी आत्मविश्वास से उनका उपयोग कर सके, जिस आत्मविश्वास से महानगर का विद्यार्थी करता है।

हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती केवल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं, बल्कि मूल्यपरक शिक्षा है। सूचना का विस्फोट हो चुका है, लेकिन संवेदनशीलता का विस्तार नहीं हो पाया है। पढ़े-लिखे लोग भी हिंसा, घृणा, भ्रष्टाचार और असहिष्णुता के शिकार हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि शिक्षा ने ज्ञान तो दिया, किंतु विवेक नहीं। यही वह बिंदु है जहाँ गांधी की नैतिकता, टैगोर की सृजनात्मकता, फुले की समानता और अंबेडकर का सामाजिक न्याय एक-दूसरे से मिलते हैं।

सरकारी विद्यालय इस राष्ट्रीय स्वप्न के सबसे बड़े वाहक हैं। यहाँ भारत का वह बच्चा पढ़ता है जिसके पास संसाधन कम हैं, लेकिन सपने बड़े हैं। यदि इन विद्यालयों को सक्षम शिक्षक, आधुनिक संसाधन, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएँ और समाज का सहयोग मिले, तो यही बच्चे भारत की सबसे बड़ी शक्ति बनेंगे। शिक्षा का लोकतंत्रीकरण सरकारी विद्यालयों को सशक्त किए बिना संभव नहीं है।

आज आवश्यकता किसी एक महापुरुष की शिक्षा-दृष्टि को चुनने की नहीं, बल्कि इन सभी दृष्टियों के श्रेष्ठ तत्वों को अपनाने की है। फुले से समान अवसर, सावित्रीबाई से साहस, गांधी से नैतिकता, टैगोर से सृजनशीलता और अंबेडकर से सामाजिक न्याय—यदि भारतीय शिक्षा इन पाँच धाराओं का संगम बन सके, तो वह केवल कुशल पेशेवर नहीं, बल्कि श्रेष्ठ नागरिक तैयार करेगी।

भारत के भविष्य का निर्माण संसद में जितना होता है, उससे कहीं अधिक विद्यालय की कक्षा में होता है। एक शिक्षक की आवाज़, एक पुस्तक का स्पर्श और एक बच्चे का जागा हुआ आत्मविश्वास इतिहास की दिशा बदल सकता है। इसलिए शिक्षा पर किया गया प्रत्येक निवेश वास्तव में भारत के भविष्य पर किया गया निवेश है।

शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल सफल जीवन नहीं, बल्कि सार्थक जीवन है। जिस दिन भारत का प्रत्येक बच्चा बिना किसी भेदभाव के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, समान अवसर और सम्मानपूर्ण वातावरण प्राप्त करेगा, उसी दिन हम उन महापुरुषों के स्वप्न के अधिक निकट होंगे जिन्होंने शिक्षा को मानव मुक्ति का सबसे बड़ा साधन माना था।

Tuesday, July 7, 2026

सरकारी विद्यालय: भारत की आशाओं का आँगन

सरकारी विद्यालय: भारत की आशाओं का आँगन

— प्रभात मिश्र

किसी सुबह यदि आप किसी सरकारी विद्यालय के प्रांगण में खड़े हों, तो आपको वहाँ केवल बच्चों की आवाज़ें नहीं सुनाई देंगी; वहाँ आपको भारत का भविष्य बोलता हुआ दिखाई देगा। कोई बच्चा फटी हुई कॉपी में अक्षर बना रहा होगा, कोई प्रार्थना में पूरे मन से स्वर मिला रहा होगा, कोई अपने मित्र के साथ टिफिन बाँट रहा होगा और कोई अपने शिक्षक से कोई नया प्रश्न पूछने का साहस जुटा रहा होगा। देखने में यह सब सामान्य लगता है, किंतु वास्तव में यही वे छोटे-छोटे दृश्य हैं जिनसे एक बड़े राष्ट्र का चरित्र निर्मित होता है।

आज सरकारी विद्यालयों की चर्चा प्रायः आँकड़ों, योजनाओं और कमियों के संदर्भ में होती है। कभी भवनों की कमी का उल्लेख होता है, कभी शिक्षकों की संख्या का, तो कभी परीक्षा परिणामों का। इन चर्चाओं का अपना महत्व है, लेकिन एक प्रश्न बार-बार मन में उठता है—क्या हमने कभी उन बच्चों की आँखों में झाँकने का प्रयास किया है, जिनके लिए विद्यालय केवल पढ़ने की जगह नहीं, बल्कि जीवन बदलने की संभावना है?

भारत का संविधान प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार देता है। यह अधिकार केवल विद्यालय तक पहुँचने का नहीं, बल्कि गरिमा के साथ सीखने, सोचने और अपने व्यक्तित्व को विकसित करने का अधिकार है। सरकारी विद्यालय इसी संवैधानिक संकल्प के सबसे बड़े वाहक हैं। वे समाज के उस वर्ग तक शिक्षा पहुँचाते हैं, जहाँ शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, बल्कि पीढ़ियों की नियति बदलने का माध्यम बन जाती है।

सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे साधारण परिवारों से आते हैं। उनके माता-पिता मजदूर, किसान, रिक्शा चालक, घरेलू कामगार, छोटे दुकानदार या असंगठित क्षेत्र के कर्मी होते हैं। उनके पास संपत्ति कम होती है, लेकिन अपने बच्चों के भविष्य के लिए विश्वास बहुत बड़ा होता है। वे जानते हैं कि यदि उनका बच्चा पढ़ जाएगा, तो उसका जीवन उनसे बेहतर होगा। यही विश्वास हर सुबह बच्चे को विद्यालय तक ले आता है।

लेकिन शिक्षा का अर्थ केवल पुस्तकें पढ़ लेना नहीं है। यदि शिक्षा मनुष्य को अधिक संवेदनशील, अधिक ईमानदार और अधिक उत्तरदायी नहीं बनाती, तो वह अधूरी रह जाती है। आज समाज में ज्ञान की कमी से अधिक मूल्यों का संकट दिखाई देता है। तकनीक ने सूचना को सहज बना दिया है, परंतु विवेक और करुणा आज भी शिक्षक और विद्यालय ही सिखा सकते हैं।

मुझे अनेक बार सरकारी विद्यालयों के बच्चों के बीच बैठने का अवसर मिला है। मैंने देखा है कि जिन बच्चों के पास संसाधन सबसे कम होते हैं, उनके भीतर सीखने की ललक अक्सर सबसे अधिक होती है। एक नई पुस्तक उनके लिए उत्सव होती है, शिक्षक की एक प्रशंसा उन्हें कई दिनों तक प्रेरित करती है और विद्यालय का छोटा-सा सम्मान उन्हें जीवनभर याद रहता है। इन बच्चों को देखकर विश्वास होता है कि अभाव प्रतिभा को रोक नहीं सकता; अवसरों का अभाव अवश्य उसे धीमा कर देता है।

सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए। संसाधनों की सीमाओं, प्रशासनिक दायित्वों और अनेक चुनौतियों के बीच भी हजारों शिक्षक निष्ठा के साथ अपना कार्य कर रहे हैं। वे केवल पाठ्यपुस्तक नहीं पढ़ाते, बल्कि बच्चों के भीतर आत्मविश्वास जगाते हैं। कई बार वे शिक्षक से अधिक अभिभावक, मार्गदर्शक और मित्र बन जाते हैं। समाज को ऐसे शिक्षकों की कहानियाँ भी उतनी ही प्रमुखता से सुनानी चाहिए जितनी कमियों की चर्चा करता है।

शिक्षा का प्रश्न केवल सरकार का प्रश्न नहीं है। समाज यदि विद्यालयों से दूर रहेगा, तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। प्रत्येक शिक्षित नागरिक, प्रत्येक साहित्यकार, प्रत्येक उद्योगपति, प्रत्येक पूर्व विद्यार्थी और प्रत्येक सामाजिक संस्था यदि वर्ष में कुछ समय भी किसी सरकारी विद्यालय के बच्चों के साथ बिताए, उन्हें पुस्तकें दे, उनसे संवाद करे, उनकी प्रतिभा को मंच दे, तो परिवर्तन की गति कई गुना बढ़ सकती है। राष्ट्र निर्माण साझी जिम्मेदारी से ही संभव है।

हिंदी के महान साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि साहित्य वही है जो मनुष्य को सुंदर बनाए। यही बात शिक्षा पर भी लागू होती है। शिक्षा वही है जो मनुष्य को अधिक मानवीय बनाए। यदि विद्यालय से निकलने वाला विद्यार्थी केवल सफल है, किंतु संवेदनशील नहीं, तो शिक्षा अपने उद्देश्य में सफल नहीं कही जा सकती।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सरकारी विद्यालयों को केवल सहायता का विषय न मानें, बल्कि सम्मान का विषय बनाएँ। हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारत की लोकतांत्रिक आत्मा इन विद्यालयों में सबसे अधिक दिखाई देती है। यहाँ जाति, धर्म, भाषा और आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर बच्चे एक साथ बैठते हैं। यही वह संस्कार है जो भविष्य के भारत को मजबूत बनाता है।

जब किसी सरकारी विद्यालय का बच्चा डॉक्टर बनता है, शिक्षक बनता है, वैज्ञानिक बनता है, सैनिक बनता है या साहित्यकार बनता है, तब उसकी सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होती; वह पूरे समाज की सफलता होती है। इसलिए सरकारी विद्यालयों में किया गया प्रत्येक निवेश वास्तव में भारत के भविष्य में किया गया निवेश है।

हमें बच्चों को यह विश्वास देना होगा कि उनकी पहचान उनके परिवार की आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उनके सपनों, परिश्रम और चरित्र से बनेगी। जिस दिन सरकारी विद्यालय का प्रत्येक बच्चा यह महसूस करेगा कि पूरा समाज उसके साथ खड़ा है, उसी दिन भारत की शिक्षा व्यवस्था एक नए युग में प्रवेश करेगी।

सरकारी विद्यालयों की घंटी केवल कक्षाएँ आरंभ होने की सूचना नहीं देती; वह हमें यह भी याद दिलाती है कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया हर दिन, हर कक्षा और हर बच्चे के साथ आगे बढ़ रही है। उन बच्चों की आँखों में जो प्रकाश है, वही भारत के भविष्य का वास्तविक उजाला है। उस उजाले को सुरक्षित रखना ही हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।

Wednesday, July 24, 2024

शिवरानी देवी : प्रेमचंद घर में

शिवरानी देवी : प्रेमचंद घर में

रचना – ‘प्रेमचंद घर में ‘1944 ई, (जीवनी विधा)

रचनाकार – शिवरानी देवी

      * शिवरानी देवी ने ‘प्रेमचंद घर में’ नाम से प्रेमचंद की जीवनी लिखी। उन्होंने उनके व्यक्तित्व के उस हिस्से को उजागर किया जिससे लोग अनभिज्ञ थे।

      * प्रेमचंद ने अपनी पत्नी को हमेशा प्रेरित किया कि वे लिखें और सामाजिक कार्यं में भी बढ़ा-चढ़कर हिस्सा लें। अपनी पत्नी के प्रति प्रेमचंद के मन में अगाध प्रेम और सम्मान था।

      * जीवन के अंतिम क्षणों में भी उन्होंने साहित्य रचना का साथ नहीं छोड़ा था। पत्नी के प्रति उनका लागाव और भी बढ़ गया था।

      * प्रेमचंद की जीवनी उनके बेटे (अमृतराय) ने ‘कलम का सिपाही’ नाम से’ और मदन गोपाल ने ‘कलम के मजदूर’ नाम से लिखी, जिसमे लेखक की अपनी कल्पनाएँ भी शामिल की होगी।

      * शिवरानी देवी द्वारा लिखी गई इस जीवनी का हर घटना खरा सोना की तरह है, क्योंकि शिवरानी देवी ने उनके साथ उन पलों को खुद जिया और महसूस किया है।

      * प्रेमचंद के व्यक्तित्व की साफगोई को जिस तरह से उनकी पत्नी ने बयान किया है वह हिंदी साहित्य प्रेमियों के लिए पठनीय है।

      * शिवरानी देवी ने अनके साथ बिताए सुनहरे पलों को बड़े ही सहजता के साथ लिखा है उसे शायद ही अन्य साहित्यकार लिख पाता। उनके लेखन में भावनाओं का कहीं अभाव नहीं है और ना ही उनके प्रवाह में कोई कमी नजर आती है।

      * शिवरानी देवी को इस बात का मलाल रहा कि वे अपने पति की महानता को मरणोपरांत समझ पाई।

      * प्रेमचंद के पिता का नाम अजायबराय और माता का नाम आनंदी देवी था।

      * प्रेमचंद को उनके पिता मुंशी धनपत राय तथा चाचा ने मुंशी नबावराय नाम दिया था।

      * इन्होंने मर्यादा, हंस तथा जागरण पत्रिकाओं का संपादन किया

      * इनका पहला उपन्यास ‘प्रेम’ को माना जाता है। किन्तु इस पुस्तक के अनुसार      

      * इनका पहला उपन्यास ‘कृष्णा’ है जो 1905 ई. में ‘प्रयाग’ से छपा था।

      * दूसरा उपन्यास ‘प्रेमा’ को माना जाता है।

      * प्रेमचंद के दो बेटे श्रीपतराय (धुन्न) तथा अमृतराय (बन्नू) थे।

      * प्रेमचंद 1935 ई. में प्रगतिशील लेखक संघ के सभापति बने। उनहोंने महात्मा गाँधी के विचारों से प्रभावित होकर सेवा को मूल धर्म बनाया।

      * शिवरानी देवी ने प्रेमचंद के संपूर्ण जीवन को इस पुस्तक में 88 भागों में दिखया है।

      * पुस्तक की श्रद्धांजलि बनारसीदास चतुर्वेदी तथा आमुख शिवरानी देवी ने लिखा है।

      * हिंदी साहित्य में प्रेमचंद की एक जीवनी ‘प्रेमचंद घर में’ (1944 ई.) है।

      * दूसरी जीवनी उनके पुत्र अमृतराय ने ‘कलम का सिपाही’ (1962 ई.) लिखा था।

      * तीसरी जीवनी ‘कलम का मजदूर’ (1954 ई.) में श्री मदन गोपाल (1919 -2009 ई.) ने लिखी है। मूल पुस्तक अंग्रेजी में लिखी गई थी बाद में श्री मदन गोपाल ने हिंदी में अनुबाद किया।

      * प्रेमचंद की मृत्यु के बाद शिवरानी देवी का वह विलाप ह्रदय को छू लेता है कि जब-तक जो चीज हमारे पास रहती है तबतक हमें उसकी कद्र नहीं होती लेकिन वो हमसे ओझल हो जाए तो हमारा मन पछताता रहता है फिर हमारे पास दुःखी होने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता है।

Saturday, June 8, 2024

समास

हवन-सामग्री, नीलोत्पल, शताब्दी, महोदधि, दुतरफा, आनन्दाश्रम, राजदरबार, त्रिभुवन, देशहितैषी, शोभा निकेतन, कुछ - कुछ, अनाथालय, वस्तुतत्व, झाड़-झंखार, धरतीधकेल, बुद्धिहीन, चहल-पहल, पाश् र्वभूमि, हिमालय, डांट-फटकार, चतुर्भुज

संधि

शिवालिक, अन्तर्भूत, परमावश्यक, अन्तर्निरुद्ध, सद्गुण, दुर्जन, उल्लास, दोशोद्धार, सज्जन, अनाथालय, द्वन्द्वातीत, आविर्भाव, कुबेरोचित, निस्संदेह, नीरस, परमेश्वर, महात्मा, विचारोत्तेजक, संतोष, नीलोत्पल, महोदधि, संशोधित, रत्नाकर, संतुष्ट, कुटोल्लास, यद्यपि 

रचना के आधार पर

1 लड़के से तुम कल युवा पुरुष हो जाओगे। (संयुक्त वाक्य)
2 एक आदमी जिसकी पीठ पर बड़ा सा गट्ठर बंधा था, कलकते जा रहा था। (सरल वाक्य)
3 कृष्णानगर में तो कोई खास तब्दील नहीं आई।(प्रश्नवाचक) 
4 मेरा लड़का चिरागदीन तुमलोगों का दर्जी था। (मिश्र वाक्य)
5 मैं उठा और दो - तीन तमाचे और जड़ दिया। (सरल वाक्य)
6 दोनों भाई - बहिन पिता केे दोनों हाथ पकड़कर बड़ी खुशी के साथ जा रहे थे। (संयुक्त वाक्य में).
 मैंने अपने मन को काफी नसीहत दी(मिश्र वाक्य में)
8 सुंदर देई उदास होकर बड़े भाई को देखने लगी। (संयुक्त वाक्य में)
9 वास्तविक प्रेम करने का आत्मबल उनमें बिल्कुल नहीं है। (मिश्र वाक्य में)
10 जो कुर्सी थी मैं उस पर पांव लटकाएं बैठा था। (सरल वाक्य में)
11 ईश्वरी हार कर भी मुस्कराता रहता था। (मिश्र वाक्य में)
12 यह वो मस्जिद है जो ज्यों की त्यों खड़ी है। ( सरल वाक्य)
13 वे एक्टर हैं, नट हैं।  (संयुक्त वाक्य में)
14 साहब की उम्र कोई 11 साल की थी पर बहिन की उमर कोई छह सात वर्ष की होगी। (संयुक्त वाक्य में)
15 आज  नटी इमली का भारत मिलाप है।(निषेध वाचक वाक्य में)
16 स्टेशन पर कई आदमी हमारा स्वागत करने के लिए खड़े थे। (मिश्र वाक्य में) 
17 पर्वत शोभा-निकेतन होते है।( मिश्र वाक्य में) 
18 तब एकाएक मुझे भान हुआ मानो मेरे मस्तिष्क की संदुक में सचमुच आलू और भंटे भरे हुए है। (सरल वाक्य) 
19 उस नुक्कड़ पर सुक्खी भटियारिन की भट्टी थी, जहां अब वह पानवाला बैठा है। (संयुक्त वाक्य में) 
20 इस रवैये का असर टैंकनीक पर पड़ता है। (मिश्र वाक्य में) 
21 उसका धर्म यहीं तक सीमित है। (प्रश्नवाचक वाक्य में)
22 जो लोग खुशी से न देंगे उसकी जमीन छीननी पड़ेगी। (सरल वाक्य में)
23 मुझपर व्रजपात हो गया था। (निषेधवाचक वाक्य में)
24 तुम्हारा मकान उन्हीं दिनों जल गया था। ( मिश्र वाक्य में)
25 साढ़े सात साल पहले तू इतना - सा था। (प्रश्नवाचक)
26 यदि तुम अभी से देशी चीजें काम में लाओगे, तो मैं स्वदेश की बनी हुई कोई उत्तम चीज तुम्हें इनाम दूंगा। (सरल वाक्य में)
27 उनके इस अभिमत में बहुत कुछ सार है। (मिश्र वाक्य में) 
28 बूढ़े मुसलमान ने बच्चे को देने के लिए चो पैसा निकाला था, वह उसे वापस जेब में रख लिया। (सरल वाक्य में) 
29 कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहाया दिखते हैं, उनकी जड़े काफी गहरी पैठी होती हैं। (सरल वाक्य में) 
30 क्या उसका धर्म यहीं तक सीमित है? (निषेधवाचक वाक्य में) 

Wednesday, June 5, 2024

SSC JHT

1) किस क्रमांक में ई स्वर का सही उच्चारण स्थान है?
क) कण्ठ (ख)तालु (ग)ओष्ठ (घ) मूर्धा
2) हिंदी शब्द कोश में ज्ञान शब्द कहाँ मिलेगा?
क) 'ख' वर्ण वाले शब्दों के बाद  
(ख) वर्ण वाले शब्दों के बाद 
(ग) 'छ' वर्ण वाले शब्दों के बाद 
(घ) प्र' वर्ण वाले शब्दों के बाद
3) बहिरंग' शब्द में कौन सी संधि है- 
(क) व्यंजन संधि  ख) विसर्ग संधि  ग) गुण संधि
घ) दीर्घ संधि
4) किस क्रम में उचित संधि-विच्छेद नहीं है?
क) सम् + विधान ख) धनम्न+ जय ग)सम् + निधि
घ) दिक् + नाथ
5) इनमें से किस शब्द में विसर्ग संधि नहीं है? 
क) नींव ख) निर्दय ग) निडर घ)नीरोग
6) तथापि में कौन सा संधि है?
क) दीर्घ ख) वृद्धि ग) विसर्ग घ) गुण
7)किस क्रम में देशज शब्द है?
क) तमना ख) भोंदू ग)अग्नि घ) अक्षी
8) कौन सा शब्द देशज नहीं है- 
क) ढिवरी ख)पगड़ी ग)दौर घ) पुष्कर
9) परीक्षा' शब्द निम्नलिखित वर्गों में से किस वर्ग में आता है- क) तत्सम ख) तद्‌भव ग) देशज घ) विदेशज 
10) 'आदमी' किस भाषा का शब्द है-
क) फारसी ख)अरबी ग) तुर्की घ)पुर्तगाली
11) किस क्रमांक का शब्द तत्सम है?
क) सूरज ख) सूर ग)खेत घ)सूत्र
12) किस क्रमांक का शब्द तद्‌भव है?.
क) अंक ख)मिथुक ग) भगिनी घ)बाँसुरी
13) किंस क्रमांक का शब्द तद्‌भव है?
क) मातुल ख) मक्खी ग)मित्र  घ)मयूर
14) किस क्रमांक का शब्द तत्सम है? 
क) भाप ख) शक्कर ग) लक्ष घ) सींग 
15): उपेक्षा' का सही विलोम है-
क)तिरस्कार  ख)सम्मान ग)अपेक्षा घ)अपमान
16 'संकीर्ण' का सही विलोम है-
क) संकुचित ख) गहरा ग) संकुचन घ) विस्तीर्ण
17) 'मैं' विरोध से उतना डरता हूँ जितना कि-से, वाक्य में रेखांकित शब्द के सही विलोम का क्रमांक है
क) पक्ष ख) पक्षपात ग)सहमति घ) समर्थन 
18) "हमें भूलकर भी कठोर क्चन नहीं कहने चाहिए"वाक्य में रेखांकित शब्द के लिए विलोम शब्द है -
क) सरस ख)सरल ग) मृदु घ) उग्र
19) वक्र' शब्द का सही विलोम है- क) ऋजु ख)टेढ़ा ग)तिरछा घ)क्षुद्र 
20) किस क्रमांक का शब्द 'वर्ग' पर्यायवाची नहीं है?
क) द्युलोक ख) नाक गा विभावरी घ) सुरलोकं
21-लाघव - चिह्न का प्रयोग होता है-
उद्धरण के लिए बड़े अंश का संक्षिप्त रुप लिखने के लिए 
त्रुटि सुधार के लिए अभिवादन के लिए
22 हमारे बैल धर-उधर भटकते हुए पड़ोसियों के खेत में  जा पहुंचे वाक्यमें किस प्रकार की अशुद्धि है - 
पदक्रम  संज्ञा ग लिंग घ वचन
23 मेरी बात वह हंसी से टाल गया- वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है 
विभक्ति परसर्ग ग  कारक विच्छेद 
24 मुझे ईश्वर पर आत्मविश्वास है - वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है 
क  विशेषण क्रिया ग क्रिया विशेषण संज्ञा
25 इसमें समस्त प्राणी मात्र का कल्याण है - वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है 
प्र विशेषण विशेषण उत्तमावस्था पदक्रम 
26 वह निज में वहां जाना नहीं चाहता-
वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है 
संज्ञा सर्वनाम क्रिया समुच्चयबोधक
27 पगड़ी ओढ़ कर जाओ - वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है 
क्रिया ख कृ धातु संज्ञा भाववाचक संज्ञा
28 मैं उसे सब कुछ समझ लूंगा-वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है
क्रिया संयुक्त क्रिया नाम धातु प्रेरणार्थक क्रिया
29  एकमात्र दो उपाय है-वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है
क  क्रिया अव्यय अविकारी क्रिया- विशेषण
30 अगर वह आया तो मैं चला जाऊंगा-अर्थ के आधार पर वाक्य भेद बताइए
संकेतवाचक विधानवाचक  प्रश्नवाचक आज्ञार्थक 
31 भारत की राजधानी दिल्ली में एक करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं 
क संज्ञा पदबंध ख सर्वनाम पदबंध ग विशेषण पदबंध
क्रिया पदबंध
32 बालक रोता हुआ शनै: शनै: मां के पास पहुंचा
संज्ञा पदबंधविशेषण पदबंधक्रियापद पदबंध
क्रियाविशेषण
33 अधिकरण तत्पुरुष में-
पहले पद प्रधान होता हैदूसरा पद प्रधान होता है 
दोनों पद प्रधान होता हैप्रथम व तृतीय पद प्रधान होता है
34 शताब्दी शब्द में समास है-
क द्वंद ख दिगु ग कर्मधारय घ तत्पुरुष
35 अव्ययीभाव समास का उदाहरण है-
लव कुश ख भरपेट  त्रिभुवन  घ छात्रधारी
36 स्वर्ण घाट का विग्रह है 
स्वर्ण में घाट घाट में स्वर्णस्वर्ण का घाटस्वर्ण के लिए घाट
37 निम्नलिखित में से किस शब्द में समास और संधि दोनों है
  यज्ञशाला स्वधर्म ग जलोष्मा घ पंकज
38 व्यंजन संधि का उदाहरण है-
 क उद्यात परमौषध दुरुपयोग तपोवन
39 गुण संधि का उदाहरण है-
महर्षि पावक अभ्युदय मतैक्य

40. विसर्ग संधि का उदाहरण है -
क) हरिशचंद्र 
ख) हरिश्चंद्र
ग) हरीशचंद्र 
घ) दिनेशचंद्र 
41. सच्चिदानंद का विच्छेद  है -
क) सत्+चित्र+आनन्द 
ख) सच्चिद+ आनन्द
ग) सच्चि+ दामंद 
घ) सत्+चिद्+आनन्द
42. किस क्रमांक में सभी पर्यायवाची शब्द सही है -
क) सरस्वती, भारती ,शारदा ,कामिनी
ख) कुंरग, सारंग, मृग, कुंजर 
ग) बैकुंठ, देवलोक, सुरलोक, घुलोक
घ) मृगेंद्र, मृगपती, दंती, केसरी
43. निम्नलिखित में से कौन सा शब्द 'बाल' का पर्यायवाची है -
क) कच
ख) शिखी
ग) कुंतल 
घ) अलक
44. किस शब्द युग्मेंम  में सही अर्थ भेद नहीं है -
क) गोत्र- गोत्रा-वंश और पृथ्वी
ख) द्रव - द्रव्य - तरल पदार्थ और धन
ग) तप - ताप - तपस्या और गर्मी 
घ) जरा - ज़रा - थोड़ा और बुढ़ापा 
45. किस क्रमांक में 'सूत-सुत' शब्द - युग्म का सही अर्थ भेद है ?
क) सारथी - पुत्र
ख) घर - संसार
ग) घर - सुंदर
घ) घर - समुद्र
46. किस क्रमांक में 'भीति - भित्ति' शब्द - युग्म का सही अर्थ - भेद है -
क) डर - दीवार
ख) आकाश भय
ग) डर - नौकर
घ) धरती - भय
47. किस क्रमांक में 'कलश - कुलिश' शब्द - युग्म का सही अर्थ - भेद है-
क) घड़ा - कुटिल
ख)  घड़ा  - व्रज
ग) व्रज - कटोरा 
घ) लोटा अत्याचारी
48. 'आंधी के आम' मुहावरे का सही अर्थ है -
क) थोड़े दिन टिकने वाली वस्तु
ख) स्थिर रहना
ग) एक जगह बने रहना
घ) रुक जना
49. 'आकाश का फूल' मुहावरे का अर्थ है -
क) कठिन कार्य
ख) अप्राप्य वस्तु
ग) पर्वत जैसी कठोर वस्तु 
घ) अप्राप् र्य कार्य 
50. 'कपोल - कल्पित' होना मुहावरे का अर्थ है -
क) बनी बनाई बात
ख) बातों को न जाना ना
ग) मनगढ़ंत होना 
घ) शक करना
51. 'और का और होना' मुहावरे का सही अर्थ है-
क) विशेष परिवर्तन होना
ख) सत्ता बदलना
ग) राजा बदलना 
घ) सरकार बदलना
52. 'कढ़ी का - सा उबाल' मुहावरे का अर्थ है -
क) शीघ्र ही समाप्त हो जाने वाला जोश
ख) समाप्त होना
ग) शुरू होना
घ) शीघ्र समाप्त होना
53. 'कबहु निरामिष होय ना कागा' लोकोक्ति का अर्थ -
क) मित्र अपनी मित्रता नहीं छोड़ता
ख) दुष्ट अपने दुष्टता नहीं छोड़ता 
ग) गांव ना छोड़ना 
घ) दोस्ती ना छोड़ना
54. 'जंगल में मोर नाचा' किसने देखा लोकोक्ति का अर्थ-
क) प्रशंसा करना
ख) पुरस्कृत करना
ग) सराहना के बिना योग्यता का व्यर्थ हो जना
घ) पुरस्कार देकर प्रशंसा करना
55) गंगा गए तो गंगादास, जमुना जाए तो जमुनादास - लोकोक्ति का अर्थ है-
क) समझौतावादी ख) अत्यधिक मित्रता ग) अवसरवादी घ) घमंडी हो जाना
56) सावन हरे ने भादों सूखे :- लोकोक्ति का अर्थ है
क) गंगा की तरह बहना ख) शंकर भगवान
ग) सदा एक समान घ) वर्षा न होना
57) एक अकेला दो ग्यारह - लोकोक्ति का अर्थ -
क) सामाजिक संगठन ख) राजनीतिक पार्टी ग)सरकार 
घ) संगठन में ही शक्ति है।
58) जैसे नागनाथ वैसे साँपनाथ - लोकोक्ति का अर्थ है
क) लोगों का एक होना ख) दो भाई का एक होना ग) दोनों एक समान हुष्ट प्रवृति के होना। घ)दो पड़ोसी एक होना
59) श्रुति' शब्द का एक अर्थ, कान है, तो इसका दूसरा अर्थ है-
क) रामायण ख) वेद ग) पुराण घ)उपनिषद
60) पान शहद का एक अर्थ पत्ता होता है, तो इसका दूसरा अर्थ है- क) बेल ख)ताम्बूल  ग)वृक्ष  घ)कुंज
61)किस वर्ग में सभी शब्द अनेकार्थक है?
क) अंक, मधु, कीचि ख) वर्ण,पद,कारक  ग)अर्थ, हस्त, यूथप घ) तात, दुर्ग, भुजंग 
62) निम्न में से हंस का अर्थ नहीं है-
क) सूर्य ख) मराल ग)कमल घ)जीवात्मा
63) किस क्रम में शुरु वर्तनी नहीं है?
क) गरिष्ठ ख) तश्तरी ग) चारुताई घ) नीरव 
64) किस क्रम में शुद्ध शब्द है?
क) ज्योत्सना ख)तदोपरांत ग)झांसी घ) तनख़्‌वाह

Wednesday, May 29, 2024

पत्रकारिता

1 वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के उत्तर दीजिए :-
क ऑनलाइन उपलब्ध होने वाली दो साहित्यिक पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
ख पहल और वागर्थ पत्रिका कहां से प्रकाशित होती है।
ग हंस के संपादक कौन थे? इसका प्रकाशन किस वर्ष में होना आरंभ हुआ।
घ माधुरी पत्रिका कहाँ से प्रकाशित होती थी? इसके संपादक कौन थे।
ङ प्रभात खबर कोलकाता के संपादक कौन है?
च राजस्थान पत्रिका कोलकाता के संपादक का नाम बताएं
छ प्रभात खबर के प्रकाशक का नाम बताएं-
ज सन्मार्ग के संपादक है-
झ प्रतियोगिता दर्पण किस प्रकार की पत्रिका है।
ञ विशाल भारत के संपादक कौन है?

2-निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए :-

समकालीन साहित्यिक पत्रकारिता की मूल प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालिए। 
छायावाद युगीन साहित्यिक पत्रकारिता की  प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालिए। 
साहित्यिक पत्रकारिता में अनुवाद की भूमिका पर प्रकाश डालिए 
साहित्यिक पत्रकारिता की अवधारणा पर प्रकाश डालिए 


3-टिप्पणी लिखिए :-
कर्मवीर 
स्वदेश 
 ग बनारस अखवार 
 घ हिंदोस्थान
 ङ मतवाला