Monday, November 2, 2026

काशी : जहाँ तुलसी की भक्ति और मालवीय का राष्ट्रधर्म मिलता है

काशी : जहाँ तुलसी की भक्ति और मालवीय का राष्ट्रधर्म मिलता है

दो युगों के महापुरुष, एक नगरी और भारतीय संस्कृति के प्रति अटूट समर्पण

प्रभात मिश्र

भारत की सांस्कृतिक चेतना में काशी का स्थान केवल एक प्राचीन नगरी के रूप में नहीं, बल्कि आध्यात्मिकता, साहित्य, ज्ञान और राष्ट्रचिंतन के जीवंत केंद्र के रूप में रहा है। गंगा के तट पर बसी यह नगरी सदियों से भारतीय मन और मस्तिष्क को दिशा देती रही है। काशी की विशेषता यह है कि यहाँ भक्ति और ज्ञान, परंपरा और आधुनिकता तथा आध्यात्मिकता और राष्ट्रसेवा का अद्भुत संगम दिखाई देता है।

काशी की इसी सांस्कृतिक भूमि पर दो महान व्यक्तित्वों की स्मृतियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं—गोस्वामी तुलसीदास और महामना मदन मोहन मालवीय। दोनों अलग-अलग ऐतिहासिक कालों के महापुरुष थे, लेकिन भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी निष्ठा, लोकमंगल की भावना और समाज को दिशा देने का संकल्प उन्हें एक साझा सांस्कृतिक सूत्र में बाँधता है।

तुलसीदास ने रामभक्ति के माध्यम से भारतीय जनमानस को आत्मिक आधार प्रदान किया, वहीं मालवीय जी ने शिक्षा, संस्कृति और राष्ट्रसेवा के माध्यम से भारतीय समाज के पुनर्निर्माण का स्वप्न देखा। एक ने लोकभाषा में रामकथा को जन-जन तक पहुँचाया, दूसरे ने आधुनिक शिक्षा को भारतीय संस्कारों से जोड़ने का प्रयास किया।

तुलसीदास : काशी की आध्यात्मिक चेतना और लोकभाषा का गौरव

गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के ऐसे महाकवि हैं, जिनकी रचनाओं ने भारतीय समाज के धार्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। उनका जीवन और साहित्य काशी की आध्यात्मिक परंपरा से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।

तुलसीदास ने संस्कृत की विद्वत् परंपरा के बीच लोकभाषा को साहित्यिक प्रतिष्ठा प्रदान की। उनकी महान कृति रामचरितमानस ने रामकथा को जनसामान्य की भाषा में प्रस्तुत करके भारतीय समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँचाया।

तुलसीदास के लिए राम केवल आराध्य नहीं, बल्कि आदर्श जीवन, मर्यादा, करुणा और लोकमंगल के प्रतीक हैं। उनकी रचनाओं में भक्ति व्यक्तिगत मुक्ति का साधन होने के साथ-साथ सामाजिक सद्भाव और नैतिक चेतना का माध्यम भी बनती है।

काशी में तुलसीदास की साहित्यिक और आध्यात्मिक स्मृतियाँ आज भी जीवंत हैं। तुलसी घाट और संकटमोचन मंदिर जैसी परंपराएँ इस नगरी के धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन में उनके प्रभाव की स्मृति को बनाए रखती हैं।

तुलसीदास की रामभक्ति का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उन्होंने साहित्य को जनजीवन से जोड़ा। उनकी भाषा में लोक की सहजता है, भावों में गहराई और विचारों में व्यापकता। यही कारण है कि रामचरितमानस आज भी भारतीय परिवारों, धार्मिक आयोजनों और सांस्कृतिक परंपराओं का अभिन्न हिस्सा है।

महामना मालवीय : काशी और राष्ट्रनिर्माण का स्वप्न

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय आधुनिक भारत के उन महान व्यक्तित्वों में हैं, जिन्होंने शिक्षा, राष्ट्रवाद, पत्रकारिता और सामाजिक चेतना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

मालवीय जी का काशी से संबंध केवल निवास या कर्मभूमि का नहीं था, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक और शैक्षणिक स्वप्न का था। उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के माध्यम से ऐसी शिक्षा व्यवस्था की कल्पना की, जिसमें आधुनिक विज्ञान और भारतीय संस्कृति का समन्वय हो।

1916 में स्थापित काशी हिंदू विश्वविद्यालय भारतीय शिक्षा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है। मालवीय जी का उद्देश्य केवल एक विश्वविद्यालय स्थापित करना नहीं था, बल्कि ऐसी पीढ़ी का निर्माण करना था जो ज्ञान, चरित्र, राष्ट्रप्रेम और सामाजिक दायित्व के प्रति सजग हो।

उनकी दृष्टि में शिक्षा का अर्थ केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं था। शिक्षा व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण, नैतिक विकास और राष्ट्र की सेवा का माध्यम भी थी। इसी कारण वे भारतीय परंपरा और आधुनिक ज्ञान के बीच संतुलन स्थापित करने के पक्षधर थे।

मालवीय जी का राष्ट्रप्रेम किसी संकीर्ण राजनीतिक दृष्टिकोण तक सीमित नहीं था। उनके लिए राष्ट्रसेवा सामाजिक उत्थान, शिक्षा का प्रसार, सांस्कृतिक गौरव और मानवीय मूल्यों की स्थापना से जुड़ी थी।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय आज भी उनके इस महान स्वप्न का प्रतीक है। इसके परिसर में भारतीय संस्कृति, आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और राष्ट्रीय चेतना का समन्वय दिखाई देता है।

तुलसी और मालवीय : दो युग, एक सांस्कृतिक दृष्टि

तुलसीदास और मालवीय जी के जीवनकाल में कई शताब्दियों का अंतर है। दोनों के बीच प्रत्यक्ष व्यक्तिगत संबंध नहीं था, लेकिन उनके विचारों और कार्यों में भारतीय संस्कृति के प्रति गहरा समर्पण दिखाई देता है।

तुलसीदास ने रामकथा के माध्यम से लोकजीवन को नैतिक और आध्यात्मिक दिशा प्रदान की। मालवीय जी ने शिक्षा के माध्यम से समाज को ज्ञान, आत्मविश्वास और राष्ट्रनिर्माण की प्रेरणा दी।

तुलसीदास का साहित्य जनभाषा की शक्ति का प्रमाण है। मालवीय जी का शैक्षणिक प्रयास भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा के समन्वय का उदाहरण है।

दोनों की दृष्टि में मनुष्य और समाज का कल्याण महत्वपूर्ण था। तुलसीदास ने भक्ति और मर्यादा के माध्यम से लोकमंगल का संदेश दिया, जबकि मालवीय जी ने शिक्षा और राष्ट्रसेवा के माध्यम से सामाजिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया।

इस प्रकार काशी की भूमि पर तुलसी की रामभक्ति और मालवीय का राष्ट्रप्रेम भारतीय संस्कृति के दो महत्वपूर्ण आयामों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

काशी : परंपरा और आधुनिकता का संगम

काशी की विशेषता यह है कि यहाँ अतीत केवल स्मृति बनकर नहीं रहता, बल्कि वर्तमान को भी प्रभावित करता है। तुलसीदास की रामभक्ति आज भी धार्मिक और साहित्यिक जीवन में प्रेरणा देती है, जबकि मालवीय जी की शैक्षणिक दृष्टि आज भी भारतीय शिक्षा के लिए प्रासंगिक बनी हुई है।

यह नगरी हमें बताती है कि संस्कृति का वास्तविक अर्थ केवल अपनी परंपराओं पर गर्व करना नहीं, बल्कि उन परंपराओं से प्रेरणा लेकर वर्तमान और भविष्य का निर्माण करना है।

काशी के घाटों पर आध्यात्मिकता की अनुभूति होती है, मंदिरों में आस्था का स्वर सुनाई देता है और विश्वविद्यालय के परिसर में ज्ञान तथा राष्ट्रनिर्माण की चेतना दिखाई देती है। यही काशी की विशिष्टता है।

निष्कर्ष

बनारस को तुलसी और मालवीय के प्रेम का केंद्र कहना वस्तुतः उस सांस्कृतिक चेतना को स्वीकार करना है, जिसने भारतीय समाज को भक्ति, ज्ञान, शिक्षा और राष्ट्रसेवा के विभिन्न आयाम प्रदान किए।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामभक्ति के माध्यम से भारतीय जनमानस को आध्यात्मिक और नैतिक आधार दिया। महामना मदन मोहन मालवीय ने शिक्षा और राष्ट्रसेवा के माध्यम से भारतीय समाज को आधुनिक युग में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

दोनों महापुरुषों की विरासत हमें यह संदेश देती है कि साहित्य, शिक्षा और संस्कृति का अंतिम उद्देश्य मानव जीवन को बेहतर बनाना है।

काशी की गंगा आज भी अविरल बह रही है। उसके घाटों पर तुलसी की भक्ति की स्मृतियाँ हैं और उसके शैक्षणिक परिसर में मालवीय के राष्ट्रनिर्माण के स्वप्न की प्रतिध्वनि सुनाई देती है।

काशी केवल एक नगरी नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का वह केंद्र है, जहाँ तुलसी की भक्ति और मालवीय का राष्ट्रधर्म मिलकर संस्कृति, ज्ञान और लोकमंगल की अखंड परंपरा का निर्माण करते हैं।

संदर्भ एवं अध्ययन-सामग्री

  1. गोस्वामी तुलसीदास — रामचरितमानस।
  2. गोस्वामी तुलसीदास — विनयपत्रिका।
  3. मदन मोहन मालवीय — जीवन, विचार एवं शैक्षणिक योगदान संबंधी साहित्य।
  4. काशी हिंदू विश्वविद्यालय — स्थापना इतिहास एवं महामना मालवीय के विचार।
  5. रामचंद्र शुक्ल — हिंदी साहित्य का इतिहास।

बनारस : हिंदी साहित्य का गढ़ और नवजागरण की ऐतिहासिक भूमि


हिंदी भाषा के विकास, साहित्यिक चेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण में काशी की भूमिका

प्रभात मिश्र

भारतीय साहित्यिक परंपरा में बनारस अर्थात् काशी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। यह नगरी सदियों से धर्म, दर्शन, ज्ञान और संस्कृति का केंद्र रही है। किंतु बनारस की पहचान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। आधुनिक हिंदी साहित्य के विकास, भाषा के मानकीकरण, साहित्यिक पत्रकारिता, नाट्य परंपरा और सामाजिक चेतना के निर्माण में भी इस नगरी ने उल्लेखनीय योगदान दिया है। हिंदी साहित्य के इतिहास का अध्ययन करते समय बनारस को केवल साहित्यकारों की कर्मभूमि के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे सांस्कृतिक केंद्र के रूप में देखना आवश्यक है, जहाँ भाषा, समाज, राजनीति और साहित्य का परस्पर संवाद विकसित हुआ।

प्राचीन ज्ञान परंपरा से आधुनिक साहित्य तक

काशी की साहित्यिक प्रतिष्ठा आधुनिक काल से बहुत पहले स्थापित हो चुकी थी। संस्कृत अध्ययन, दर्शन, धार्मिक विमर्श और शास्त्रार्थ की परंपराओं ने इस नगरी को ज्ञान का महत्वपूर्ण केंद्र बनाया। मध्यकाल में भक्ति आंदोलन के प्रभाव से कबीर और तुलसीदास जैसे साहित्यकारों की रचनात्मक चेतना काशी और उसके सांस्कृतिक परिवेश से जुड़ी रही।

कबीर ने सामाजिक रूढ़ियों और धार्मिक आडंबरों पर प्रश्न उठाए, वहीं तुलसीदास ने लोकभाषा के माध्यम से रामकथा को व्यापक जनसमुदाय तक पहुँचाया। इस परंपरा का महत्व इसलिए भी है कि काशी में साहित्य केवल अभिजात वर्ग की बौद्धिक गतिविधि नहीं रहा, बल्कि लोकभाषा, धार्मिक अभिव्यक्ति और सामाजिक संवाद के माध्यम से जनजीवन से भी जुड़ा रहा। यही व्यापक सांस्कृतिक आधार आगे चलकर आधुनिक हिंदी साहित्य के विकास में सहायक बना।

हिंदी नवजागरण और भारतेंदु हरिश्चंद्र

उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्ध हिंदी साहित्य के इतिहास में परिवर्तनकारी काल माना जाता है। औपनिवेशिक शासन, आधुनिक शिक्षा, मुद्रण तकनीक और नए सामाजिक विचारों के प्रभाव से भारतीय भाषाओं में आधुनिक साहित्यिक चेतना विकसित हो रही थी। बनारस इस परिवर्तन का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा।

इस दौर में भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885) का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक कहा जाता है। उन्होंने साहित्य को सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने का प्रयास किया। उनकी रचनाओं में देश की आर्थिक स्थिति, सामाजिक विसंगतियाँ, राजनीतिक पराधीनता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की आकांक्षा अभिव्यक्त हुई।[1]

भारतेंदु का साहित्यिक योगदान केवल कविता और नाटक तक सीमित नहीं था। वे पत्रकार, संपादक, नाटककार और सामाजिक विचारक भी थे। ‘कविवचनसुधा’ तथा ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने हिंदी साहित्य और पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान की। उनके प्रयासों से हिंदी गद्य, नाटक और साहित्यिक पत्रकारिता को आधुनिक स्वरूप प्राप्त करने में सहायता मिली।

भारतेंदु की साहित्यिक दृष्टि की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि उन्होंने परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद स्थापित किया। वे आधुनिक साहित्यिक विधाओं के प्रति सजग थे, लेकिन भारतीय काव्य परंपरा से भी गहरा संबंध रखते थे। उनके साहित्य में ब्रजभाषा, खड़ी बोली और अन्य भाषाई प्रभावों का समन्वय दिखाई देता है।

उनकी प्रसिद्ध कृति ‘भारत-दुर्दशा’ में तत्कालीन भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर गंभीर चिंता व्यक्त हुई है। नाटक का यह स्वर हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना के विकास का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

“हा हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई॥”

यह पंक्ति केवल एक साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि औपनिवेशिक भारत की पीड़ा और आत्मचिंतन का स्वर है।[2]

नागरी प्रचारिणी सभा : भाषा आंदोलन और साहित्यिक संस्थागत विकास

बनारस को हिंदी साहित्य का गढ़ बनाने में साहित्यिक संस्थाओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। इनमें नागरी प्रचारिणी सभा का विशेष स्थान है।

नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना 16 जुलाई 1893 को वाराणसी में हुई। इसके संस्थापकों में श्यामसुंदर दास, रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह प्रमुख थे। इसका उद्देश्य देवनागरी लिपि के प्रचार, हिंदी भाषा के विकास, साहित्यिक सामग्री के संरक्षण और हिंदी के अध्ययन-अध्यापन को प्रोत्साहित करना था।[3]

इस संस्था ने पुराने ग्रंथों और पांडुलिपियों की खोज, संपादन तथा प्रकाशन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। हिंदी शब्दकोश निर्माण, व्याकरण, साहित्यिक आलोचना और ऐतिहासिक ग्रंथों के संरक्षण में भी इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।

नागरी प्रचारिणी सभा का योगदान केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि भाषाई और सामाजिक भी था। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हिंदी और देवनागरी लिपि के पक्ष में चल रहे आंदोलन को इस संस्था ने संगठित स्वर दिया। हिंदी को शिक्षा, प्रशासन और सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित करने के प्रयासों में सभा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हालाँकि, हिंदी के विकास का यह इतिहास केवल एक सरल भाषाई यात्रा नहीं था। हिंदी और उर्दू के संबंध, विभिन्न बोलियों की साहित्यिक प्रतिष्ठा तथा भाषा की मानक पहचान को लेकर उस समय व्यापक बहसें भी हुईं। शोधकर्ताओं ने इस आंदोलन के सामाजिक और राजनीतिक पक्षों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है।[4]

साहित्यिक पत्रकारिता और मुद्रण संस्कृति

आधुनिक हिंदी साहित्य के विकास में मुद्रण संस्कृति और साहित्यिक पत्रकारिता की भूमिका निर्णायक रही। बनारस में उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान अनेक पत्र-पत्रिकाओं और प्रकाशन गतिविधियों ने हिंदी के नए पाठक वर्ग के निर्माण में योगदान दिया।

भारतेंदु हरिश्चंद्र के समय साहित्यिक पत्रकारिता केवल समाचार प्रसारण का माध्यम नहीं थी, बल्कि सामाजिक सुधार, राष्ट्रीय चेतना और भाषा विकास का उपकरण भी थी। पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से साहित्यकारों ने नए विचारों को व्यापक समाज तक पहुँचाया।

मुद्रण संस्कृति ने साहित्य को मौखिक और सीमित पाठकीय परंपरा से बाहर निकालकर व्यापक सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश कराया। इससे साहित्यिक बहसों, सामाजिक प्रश्नों और भाषा संबंधी विचारों को नया मंच मिला। बनारस की प्रकाशन परंपरा ने हिंदी साहित्य को इस परिवर्तन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बनारस और आधुनिक हिंदी गद्य

आधुनिक हिंदी गद्य के विकास में बनारस का योगदान बहुआयामी रहा है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी गद्य को सामाजिक विषयों, राष्ट्रीय चिंतन और आधुनिक साहित्यिक अभिव्यक्ति से जोड़ा। उनके बाद हिंदी आलोचना, निबंध, पत्रकारिता और कथा-साहित्य के विकास में अनेक साहित्यकारों ने योगदान दिया।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन और आलोचना को व्यवस्थित तथा ऐतिहासिक आधार प्रदान किया। उनकी आलोचनात्मक दृष्टि ने साहित्य को समाज, इतिहास और मानवीय संवेदना के संदर्भ में देखने की परंपरा को मजबूत किया।

प्रेमचंद का बनारस से गहरा संबंध रहा। उनके साहित्य में भारतीय समाज, ग्रामीण जीवन, आर्थिक विषमता और मानवीय संघर्षों का यथार्थ चित्रण मिलता है। जयशंकर प्रसाद ने कविता, नाटक और कथा-साहित्य के माध्यम से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। इन साहित्यकारों की रचनात्मक उपस्थिति ने बनारस को हिंदी साहित्य की प्रमुख सांस्कृतिक भूमि के रूप में प्रतिष्ठित किया।

साहित्य, लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना

बनारस की साहित्यिक पहचान का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसकी लोक-सांस्कृतिक परंपरा है। यहाँ साहित्य का संबंध केवल लिखित ग्रंथों से नहीं, बल्कि लोकगीतों, संगीत, नाट्य परंपराओं, उत्सवों और जनभाषा से भी रहा है।

काशी की सांस्कृतिक संरचना में भोजपुरी, अवधी, ब्रजभाषा, खड़ी बोली और उर्दू सहित अनेक भाषाई तथा साहित्यिक परंपराओं का प्रभाव दिखाई देता है। इस बहुभाषिक परिवेश ने साहित्यिक अभिव्यक्ति को विविधता प्रदान की।

बनारस के साहित्यिक इतिहास को समझते समय लोकनाट्य और लोकप्रिय सांस्कृतिक परंपराओं की उपेक्षा नहीं की जा सकती। आधुनिक हिंदी नाटक के विकास पर हुए शोध में यह प्रश्न उठाया गया है कि भारतेंदु के नाट्य योगदान को समझने के लिए तत्कालीन लोकप्रिय रंगमंच और लोकनाट्य परंपराओं का अध्ययन भी आवश्यक है।[5]

इस दृष्टि से बनारस का साहित्यिक इतिहास केवल प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपलब्धियों का इतिहास नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक वर्गों, भाषाई समुदायों और सांस्कृतिक परंपराओं के परस्पर संवाद का इतिहास भी है।

वर्तमान संदर्भ में बनारस की साहित्यिक प्रासंगिकता

आज बनारस अपनी ऐतिहासिक साहित्यिक विरासत के साथ आधुनिक शैक्षणिक और शोध संस्थानों के कारण भी महत्वपूर्ण है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ तथा अन्य शैक्षणिक संस्थान हिंदी भाषा, साहित्य, इतिहास और संस्कृति के अध्ययन को आगे बढ़ा रहे हैं।

समकालीन समय में हिंदी साहित्य के सामने भाषा की बदलती प्रकृति, डिजिटल माध्यमों का विस्तार, पाठकीयता में परिवर्तन और नई पीढ़ी की साहित्यिक रुचियों जैसे प्रश्न उपस्थित हैं। ऐसे समय में बनारस की साहित्यिक परंपरा का अध्ययन हमें यह समझने में सहायता करता है कि भाषा का विकास केवल साहित्यकारों के प्रयासों से नहीं, बल्कि सामाजिक संस्थाओं, पाठकों, प्रकाशकों और सांस्कृतिक आंदोलनों के संयुक्त योगदान से होता है।

निष्कर्ष

बनारस को हिंदी साहित्य का गढ़ कहना केवल भावनात्मक विशेषण नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आधारों पर स्थापित एक महत्वपूर्ण तथ्य है। हिंदी नवजागरण, भारतेंदु हरिश्चंद्र की साहित्यिक गतिविधियों, नागरी प्रचारिणी सभा के भाषाई प्रयासों, साहित्यिक पत्रकारिता और आधुनिक हिंदी आलोचना के विकास में इस नगरी की भूमिका उल्लेखनीय रही है।

काशी की साहित्यिक विरासत हमें यह भी सिखाती है कि भाषा का इतिहास समाज के इतिहास से अलग नहीं होता। साहित्य अपने समय की सामाजिक चेतना, राजनीतिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करता है।

इसलिए बनारस को हिंदी साहित्य का गढ़ मानने का अर्थ केवल उसके गौरवशाली अतीत का स्मरण करना नहीं, बल्कि उस साहित्यिक चेतना को समझना भी है जिसने हिंदी को आधुनिक स्वरूप प्रदान करने में योगदान दिया। गंगा के तट पर स्थित यह नगरी आज भी हिंदी साहित्य की परंपरा, विचार और सृजनशीलता के बीच एक जीवंत सेतु बनी हुई है।


संदर्भ एवं ग्रंथ-सूची

  1. Vasudha Dalmia, The Nationalization of Hindu Traditions: Bharatendu Harischandra and Nineteenth-Century Banaras, Oxford University Press, 1997.
  2. भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारत-दुर्दशा, मूल नाटक। डिजिटल पाठ: हिंदी समय।
  3. नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी — संस्था का इतिहास एवं हिंदी भाषा-साहित्य संबंधी कार्य।
  4. Christopher R. King, The Nagari Pracharini Sabha of Benares, 1893–1914: A Study in the Social and Political History of the Hindi Language, University of Wisconsin, 1974.
  5. Kathryn Hansen, “The Birth of Hindi Drama in Banaras, 1868–1885,” Culture and Power in Banaras: Community, Performance, and Environment, 1800–1980.

ऑनलाइन शोध-स्रोत

Friday, October 23, 2026

प्रशांत भैया: यादों में हमेशा ज़िंदा रहेंगे आप!

प्रशांत भैया: यादों में हमेशा ज़िंदा रहेंगे आप!





विद्यार्थी जीवन की कितनी मधुर स्मृतियाँ जुड़ी हैं प्रशांत भैया के साथ! उनका साथ हमें विशेष बनाता था। उनकी वाक्पटुता, निडरता और बेबाक अंदाज़ उन्हें सबसे अलग बनाता था। वे किसी से डरते नहीं थे, सचमुच करेजा के धनी व्यक्ति थे।

उनकी वजह से हम अक्सर खबरों में बने रहते थे। एक अलग ही भौकाल था। लोग कहते थे, “प्रभात को बोलो, प्रभात खबर में छपवा देगा!” और इस बात के पीछे प्रशांत भैया का साथ और उनका पत्रकारिता जगत में प्रभाव था।

एम.ए. के दिनों में मैंने सबसे अधिक समय प्रशांत भैया के साथ बिताया। गंगाघाट हमारी पसंदीदा जगह हुआ करती थी। वहीं से ब्रेड टोस्ट खाने की आदत लगी। आज भी गंगाघाट की यादों के साथ ब्रेड टोस्ट का स्वाद और प्रशांत भैया का चेहरा आँखों के सामने आ जाता है।

प्रशांत भैया बहुत से लोगों के चहेते थे। उनके मुँह से भोजपुरी सुनना और उनका अपने खास अंदाज़ में गालियाँ देना भी अच्छा लगता था। उनके साथ रहने पर कभी पैसों की चिंता नहीं होती थी। वे साथ होते थे तो लगता था कि सब संभल जाएगा।

प्रेसीडेंसी के दिनों में एक आंदोलन के दौरान उनसे घनिष्ठता बढ़ी। उस आंदोलन ने एक बात बहुत अच्छी तरह सिखा दी कि आंदोलन में सामने दिखाई देने वाले और सचमुच साथ खड़े रहने वाले लोगों में बहुत अंतर होता है। उस दौर में यह भी महसूस हुआ कि हिंदी वाले संवेदना पर लिखना और बोलना तो जानते हैं, लेकिन हर किसी के भीतर संवेदना नहीं होती। प्रशांत भैया उन विरले लोगों में थे, जिनके भीतर संवेदना थी। वे जरूरतमंदों के लिए खड़े होते थे। दूसरों के दुःख को समझना और उनके लिए कुछ करना उनके स्वभाव का हिस्सा था।

शायद समाज की विडंबना ही है कि जो व्यक्ति बाहर के लोगों के लिए बेहद प्रिय होता है, उसे कभी-कभी अपने ही घर में निकम्मा कहा जाता है। लेकिन किसी व्यक्ति की असली पहचान उसके अपनों के बीच नहीं, बल्कि उन लोगों के दिलों में होती है, जिनके लिए वह खड़ा रहा हो।

जिस प्रशांत भैया से मैं अन्नपूर्णा कराने के लिए जिद किया करता था, आज उन्हीं प्रशांत भैया के नाम पर अन्नपूर्णा कराना पड़ रहा है। समय का यह बदलाव मन को भीतर तक झकझोर देता है। कभी जिनके साथ बैठकर भोजन की बातें होती थीं, आज उन्हीं की स्मृति में जरूरतमंदों को भोजन कराना पड़ रहा है। मन यह स्वीकार ही नहीं कर पाता कि प्रशांत भैया अब हमारे बीच नहीं हैं।

प्रशांत भैया, आपने अपनी जिंदगी अपने अंदाज़ में जी। निडर होकर, बेबाक होकर और जरूरतमंदों के साथ खड़े होकर। आपकी हँसी, आपकी भोजपुरी, आपका बेबाक अंदाज़, गंगाघाट की वे शामें और विद्यार्थी जीवन की अनगिनत स्मृतियाँ हमेशा हमारे साथ रहेंगी।

आपके जाने से जीवन का एक ऐसा अध्याय बंद हो गया, जिसे हम बार-बार पढ़ना चाहेंगे, लेकिन अब उसे जी नहीं पाएँगे।

प्रशांत भैया, आपकी यादों में हम रहें या न रहें, लेकिन हमारी यादों में आप हमेशा रहेंगे।

आपकी कमी हमेशा खलेगी, भैया!

Thursday, July 9, 2026

शिक्षा का स्वप्न और भारत का भविष्य: फुले, गांधी, टैगोर और अंबेडकर के आलोक में.....

शिक्षा का स्वप्न और भारत का भविष्य: फुले, गांधी, टैगोर और अंबेडकर के आलोक में

— प्रभात मिश्र

किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति उसके प्राकृतिक संसाधन नहीं, उसके शिक्षित और संवेदनशील नागरिक होते हैं। सभ्यताएँ युद्धों से नहीं, शिक्षा से आगे बढ़ती हैं। भारत का आधुनिक इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि जिन महापुरुषों ने समाज को नई दिशा दी, उन्होंने शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं माना, बल्कि मनुष्य की चेतना, स्वतंत्रता और सामाजिक परिवर्तन का आधार समझा। महात्मा ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर और डॉ. भीमराव अंबेडकर—इन सभी की शिक्षा-दृष्टि अलग-अलग थी, किंतु उनका लक्ष्य एक था—ऐसा भारत जहाँ शिक्षा हर व्यक्ति तक पहुँचे और मनुष्य को अधिक मानवीय बनाए।

उन्नीसवीं शताब्दी का भारत गहरे सामाजिक विभाजनों से जूझ रहा था। शिक्षा कुछ वर्गों तक सीमित थी और स्त्रियाँ तथा वंचित समुदाय उससे लगभग बाहर थे। ऐसे समय में महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा को सामाजिक क्रांति का माध्यम बनाया। सावित्रीबाई फुले ने जब लड़कियों के लिए विद्यालय खोला, तब उन्होंने केवल एक विद्यालय की स्थापना नहीं की, बल्कि भारतीय समाज की जड़ सोच को चुनौती दी। उन्होंने सिद्ध किया कि शिक्षा जन्म से नहीं, अधिकार से मिलनी चाहिए।

महात्मा गांधी की शिक्षा-दृष्टि का केंद्र था—जीवन। वे चाहते थे कि विद्यालय केवल परीक्षा पास करने वाले विद्यार्थी न बनाएँ, बल्कि श्रम, आत्मनिर्भरता, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व से युक्त नागरिक तैयार करें। उनकी 'नई तालीम' में हाथ, हृदय और मस्तिष्क—तीनों के संतुलित विकास पर बल था। गांधी मानते थे कि शिक्षा तभी सार्थक है जब वह व्यक्ति को समाज से जोड़े और उसे श्रम का सम्मान करना सिखाए।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शिक्षा को प्रकृति, कला और स्वतंत्र चिंतन से जोड़ा। उनके लिए विद्यालय चारदीवारी में कैद संस्था नहीं, बल्कि ऐसा जीवंत वातावरण था जहाँ बच्चा प्रश्न पूछ सके, कल्पना कर सके और जीवन को अनुभव कर सके। वे रटने वाली शिक्षा के विरोधी थे। उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के भीतर छिपी सृजनात्मकता को मुक्त करना है।

इन सभी विचारों के बीच डॉ. भीमराव अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि विशेष महत्व रखती है। उनके लिए शिक्षा सामाजिक न्याय का सबसे शक्तिशाली साधन थी। उन्होंने स्वयं भेदभाव और वंचना का जीवन देखा था। इसलिए वे जानते थे कि शिक्षा केवल रोजगार नहीं देती, वह मनुष्य को आत्मसम्मान देती है। उनका आह्वान—"शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो"—आज भी भारत के लोकतांत्रिक जीवन का प्रेरक मंत्र है।

अंबेडकर का विश्वास था कि कोई भी समाज तब तक समान नहीं हो सकता जब तक शिक्षा पर सबका समान अधिकार न हो। वे शिक्षा को संविधान में निहित समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की भावना का आधार मानते थे। यदि किसी बच्चे की शिक्षा उसकी जाति, गरीबी या सामाजिक स्थिति से प्रभावित होती है, तो लोकतंत्र अधूरा रह जाता है।

आज भारत नई शिक्षा नीति के माध्यम से समग्र, बहुभाषी, कौशल-आधारित और लचीली शिक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। यह स्वागतयोग्य है, किंतु यह भी आवश्यक है कि नीति का लाभ समाज के अंतिम बच्चे तक पहुँचे। तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल शिक्षा तभी सार्थक होंगी जब गाँव के सरकारी विद्यालय का बच्चा भी उसी आत्मविश्वास से उनका उपयोग कर सके, जिस आत्मविश्वास से महानगर का विद्यार्थी करता है।

हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती केवल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं, बल्कि मूल्यपरक शिक्षा है। सूचना का विस्फोट हो चुका है, लेकिन संवेदनशीलता का विस्तार नहीं हो पाया है। पढ़े-लिखे लोग भी हिंसा, घृणा, भ्रष्टाचार और असहिष्णुता के शिकार हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि शिक्षा ने ज्ञान तो दिया, किंतु विवेक नहीं। यही वह बिंदु है जहाँ गांधी की नैतिकता, टैगोर की सृजनात्मकता, फुले की समानता और अंबेडकर का सामाजिक न्याय एक-दूसरे से मिलते हैं।

सरकारी विद्यालय इस राष्ट्रीय स्वप्न के सबसे बड़े वाहक हैं। यहाँ भारत का वह बच्चा पढ़ता है जिसके पास संसाधन कम हैं, लेकिन सपने बड़े हैं। यदि इन विद्यालयों को सक्षम शिक्षक, आधुनिक संसाधन, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएँ और समाज का सहयोग मिले, तो यही बच्चे भारत की सबसे बड़ी शक्ति बनेंगे। शिक्षा का लोकतंत्रीकरण सरकारी विद्यालयों को सशक्त किए बिना संभव नहीं है।

आज आवश्यकता किसी एक महापुरुष की शिक्षा-दृष्टि को चुनने की नहीं, बल्कि इन सभी दृष्टियों के श्रेष्ठ तत्वों को अपनाने की है। फुले से समान अवसर, सावित्रीबाई से साहस, गांधी से नैतिकता, टैगोर से सृजनशीलता और अंबेडकर से सामाजिक न्याय—यदि भारतीय शिक्षा इन पाँच धाराओं का संगम बन सके, तो वह केवल कुशल पेशेवर नहीं, बल्कि श्रेष्ठ नागरिक तैयार करेगी।

भारत के भविष्य का निर्माण संसद में जितना होता है, उससे कहीं अधिक विद्यालय की कक्षा में होता है। एक शिक्षक की आवाज़, एक पुस्तक का स्पर्श और एक बच्चे का जागा हुआ आत्मविश्वास इतिहास की दिशा बदल सकता है। इसलिए शिक्षा पर किया गया प्रत्येक निवेश वास्तव में भारत के भविष्य पर किया गया निवेश है।

शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल सफल जीवन नहीं, बल्कि सार्थक जीवन है। जिस दिन भारत का प्रत्येक बच्चा बिना किसी भेदभाव के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, समान अवसर और सम्मानपूर्ण वातावरण प्राप्त करेगा, उसी दिन हम उन महापुरुषों के स्वप्न के अधिक निकट होंगे जिन्होंने शिक्षा को मानव मुक्ति का सबसे बड़ा साधन माना था।

Tuesday, July 7, 2026

सरकारी विद्यालय: भारत की आशाओं का आँगन

सरकारी विद्यालय: भारत की आशाओं का आँगन

— प्रभात मिश्र

किसी सुबह यदि आप किसी सरकारी विद्यालय के प्रांगण में खड़े हों, तो आपको वहाँ केवल बच्चों की आवाज़ें नहीं सुनाई देंगी; वहाँ आपको भारत का भविष्य बोलता हुआ दिखाई देगा। कोई बच्चा फटी हुई कॉपी में अक्षर बना रहा होगा, कोई प्रार्थना में पूरे मन से स्वर मिला रहा होगा, कोई अपने मित्र के साथ टिफिन बाँट रहा होगा और कोई अपने शिक्षक से कोई नया प्रश्न पूछने का साहस जुटा रहा होगा। देखने में यह सब सामान्य लगता है, किंतु वास्तव में यही वे छोटे-छोटे दृश्य हैं जिनसे एक बड़े राष्ट्र का चरित्र निर्मित होता है।

आज सरकारी विद्यालयों की चर्चा प्रायः आँकड़ों, योजनाओं और कमियों के संदर्भ में होती है। कभी भवनों की कमी का उल्लेख होता है, कभी शिक्षकों की संख्या का, तो कभी परीक्षा परिणामों का। इन चर्चाओं का अपना महत्व है, लेकिन एक प्रश्न बार-बार मन में उठता है—क्या हमने कभी उन बच्चों की आँखों में झाँकने का प्रयास किया है, जिनके लिए विद्यालय केवल पढ़ने की जगह नहीं, बल्कि जीवन बदलने की संभावना है?

भारत का संविधान प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार देता है। यह अधिकार केवल विद्यालय तक पहुँचने का नहीं, बल्कि गरिमा के साथ सीखने, सोचने और अपने व्यक्तित्व को विकसित करने का अधिकार है। सरकारी विद्यालय इसी संवैधानिक संकल्प के सबसे बड़े वाहक हैं। वे समाज के उस वर्ग तक शिक्षा पहुँचाते हैं, जहाँ शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, बल्कि पीढ़ियों की नियति बदलने का माध्यम बन जाती है।

सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे साधारण परिवारों से आते हैं। उनके माता-पिता मजदूर, किसान, रिक्शा चालक, घरेलू कामगार, छोटे दुकानदार या असंगठित क्षेत्र के कर्मी होते हैं। उनके पास संपत्ति कम होती है, लेकिन अपने बच्चों के भविष्य के लिए विश्वास बहुत बड़ा होता है। वे जानते हैं कि यदि उनका बच्चा पढ़ जाएगा, तो उसका जीवन उनसे बेहतर होगा। यही विश्वास हर सुबह बच्चे को विद्यालय तक ले आता है।

लेकिन शिक्षा का अर्थ केवल पुस्तकें पढ़ लेना नहीं है। यदि शिक्षा मनुष्य को अधिक संवेदनशील, अधिक ईमानदार और अधिक उत्तरदायी नहीं बनाती, तो वह अधूरी रह जाती है। आज समाज में ज्ञान की कमी से अधिक मूल्यों का संकट दिखाई देता है। तकनीक ने सूचना को सहज बना दिया है, परंतु विवेक और करुणा आज भी शिक्षक और विद्यालय ही सिखा सकते हैं।

मुझे अनेक बार सरकारी विद्यालयों के बच्चों के बीच बैठने का अवसर मिला है। मैंने देखा है कि जिन बच्चों के पास संसाधन सबसे कम होते हैं, उनके भीतर सीखने की ललक अक्सर सबसे अधिक होती है। एक नई पुस्तक उनके लिए उत्सव होती है, शिक्षक की एक प्रशंसा उन्हें कई दिनों तक प्रेरित करती है और विद्यालय का छोटा-सा सम्मान उन्हें जीवनभर याद रहता है। इन बच्चों को देखकर विश्वास होता है कि अभाव प्रतिभा को रोक नहीं सकता; अवसरों का अभाव अवश्य उसे धीमा कर देता है।

सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए। संसाधनों की सीमाओं, प्रशासनिक दायित्वों और अनेक चुनौतियों के बीच भी हजारों शिक्षक निष्ठा के साथ अपना कार्य कर रहे हैं। वे केवल पाठ्यपुस्तक नहीं पढ़ाते, बल्कि बच्चों के भीतर आत्मविश्वास जगाते हैं। कई बार वे शिक्षक से अधिक अभिभावक, मार्गदर्शक और मित्र बन जाते हैं। समाज को ऐसे शिक्षकों की कहानियाँ भी उतनी ही प्रमुखता से सुनानी चाहिए जितनी कमियों की चर्चा करता है।

शिक्षा का प्रश्न केवल सरकार का प्रश्न नहीं है। समाज यदि विद्यालयों से दूर रहेगा, तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। प्रत्येक शिक्षित नागरिक, प्रत्येक साहित्यकार, प्रत्येक उद्योगपति, प्रत्येक पूर्व विद्यार्थी और प्रत्येक सामाजिक संस्था यदि वर्ष में कुछ समय भी किसी सरकारी विद्यालय के बच्चों के साथ बिताए, उन्हें पुस्तकें दे, उनसे संवाद करे, उनकी प्रतिभा को मंच दे, तो परिवर्तन की गति कई गुना बढ़ सकती है। राष्ट्र निर्माण साझी जिम्मेदारी से ही संभव है।

हिंदी के महान साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि साहित्य वही है जो मनुष्य को सुंदर बनाए। यही बात शिक्षा पर भी लागू होती है। शिक्षा वही है जो मनुष्य को अधिक मानवीय बनाए। यदि विद्यालय से निकलने वाला विद्यार्थी केवल सफल है, किंतु संवेदनशील नहीं, तो शिक्षा अपने उद्देश्य में सफल नहीं कही जा सकती।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सरकारी विद्यालयों को केवल सहायता का विषय न मानें, बल्कि सम्मान का विषय बनाएँ। हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारत की लोकतांत्रिक आत्मा इन विद्यालयों में सबसे अधिक दिखाई देती है। यहाँ जाति, धर्म, भाषा और आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर बच्चे एक साथ बैठते हैं। यही वह संस्कार है जो भविष्य के भारत को मजबूत बनाता है।

जब किसी सरकारी विद्यालय का बच्चा डॉक्टर बनता है, शिक्षक बनता है, वैज्ञानिक बनता है, सैनिक बनता है या साहित्यकार बनता है, तब उसकी सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होती; वह पूरे समाज की सफलता होती है। इसलिए सरकारी विद्यालयों में किया गया प्रत्येक निवेश वास्तव में भारत के भविष्य में किया गया निवेश है।

हमें बच्चों को यह विश्वास देना होगा कि उनकी पहचान उनके परिवार की आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उनके सपनों, परिश्रम और चरित्र से बनेगी। जिस दिन सरकारी विद्यालय का प्रत्येक बच्चा यह महसूस करेगा कि पूरा समाज उसके साथ खड़ा है, उसी दिन भारत की शिक्षा व्यवस्था एक नए युग में प्रवेश करेगी।

सरकारी विद्यालयों की घंटी केवल कक्षाएँ आरंभ होने की सूचना नहीं देती; वह हमें यह भी याद दिलाती है कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया हर दिन, हर कक्षा और हर बच्चे के साथ आगे बढ़ रही है। उन बच्चों की आँखों में जो प्रकाश है, वही भारत के भविष्य का वास्तविक उजाला है। उस उजाले को सुरक्षित रखना ही हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।

Wednesday, July 24, 2024

शिवरानी देवी : प्रेमचंद घर में

शिवरानी देवी : प्रेमचंद घर में

रचना – ‘प्रेमचंद घर में ‘1944 ई, (जीवनी विधा)

रचनाकार – शिवरानी देवी

      * शिवरानी देवी ने ‘प्रेमचंद घर में’ नाम से प्रेमचंद की जीवनी लिखी। उन्होंने उनके व्यक्तित्व के उस हिस्से को उजागर किया जिससे लोग अनभिज्ञ थे।

      * प्रेमचंद ने अपनी पत्नी को हमेशा प्रेरित किया कि वे लिखें और सामाजिक कार्यं में भी बढ़ा-चढ़कर हिस्सा लें। अपनी पत्नी के प्रति प्रेमचंद के मन में अगाध प्रेम और सम्मान था।

      * जीवन के अंतिम क्षणों में भी उन्होंने साहित्य रचना का साथ नहीं छोड़ा था। पत्नी के प्रति उनका लागाव और भी बढ़ गया था।

      * प्रेमचंद की जीवनी उनके बेटे (अमृतराय) ने ‘कलम का सिपाही’ नाम से’ और मदन गोपाल ने ‘कलम के मजदूर’ नाम से लिखी, जिसमे लेखक की अपनी कल्पनाएँ भी शामिल की होगी।

      * शिवरानी देवी द्वारा लिखी गई इस जीवनी का हर घटना खरा सोना की तरह है, क्योंकि शिवरानी देवी ने उनके साथ उन पलों को खुद जिया और महसूस किया है।

      * प्रेमचंद के व्यक्तित्व की साफगोई को जिस तरह से उनकी पत्नी ने बयान किया है वह हिंदी साहित्य प्रेमियों के लिए पठनीय है।

      * शिवरानी देवी ने अनके साथ बिताए सुनहरे पलों को बड़े ही सहजता के साथ लिखा है उसे शायद ही अन्य साहित्यकार लिख पाता। उनके लेखन में भावनाओं का कहीं अभाव नहीं है और ना ही उनके प्रवाह में कोई कमी नजर आती है।

      * शिवरानी देवी को इस बात का मलाल रहा कि वे अपने पति की महानता को मरणोपरांत समझ पाई।

      * प्रेमचंद के पिता का नाम अजायबराय और माता का नाम आनंदी देवी था।

      * प्रेमचंद को उनके पिता मुंशी धनपत राय तथा चाचा ने मुंशी नबावराय नाम दिया था।

      * इन्होंने मर्यादा, हंस तथा जागरण पत्रिकाओं का संपादन किया

      * इनका पहला उपन्यास ‘प्रेम’ को माना जाता है। किन्तु इस पुस्तक के अनुसार      

      * इनका पहला उपन्यास ‘कृष्णा’ है जो 1905 ई. में ‘प्रयाग’ से छपा था।

      * दूसरा उपन्यास ‘प्रेमा’ को माना जाता है।

      * प्रेमचंद के दो बेटे श्रीपतराय (धुन्न) तथा अमृतराय (बन्नू) थे।

      * प्रेमचंद 1935 ई. में प्रगतिशील लेखक संघ के सभापति बने। उनहोंने महात्मा गाँधी के विचारों से प्रभावित होकर सेवा को मूल धर्म बनाया।

      * शिवरानी देवी ने प्रेमचंद के संपूर्ण जीवन को इस पुस्तक में 88 भागों में दिखया है।

      * पुस्तक की श्रद्धांजलि बनारसीदास चतुर्वेदी तथा आमुख शिवरानी देवी ने लिखा है।

      * हिंदी साहित्य में प्रेमचंद की एक जीवनी ‘प्रेमचंद घर में’ (1944 ई.) है।

      * दूसरी जीवनी उनके पुत्र अमृतराय ने ‘कलम का सिपाही’ (1962 ई.) लिखा था।

      * तीसरी जीवनी ‘कलम का मजदूर’ (1954 ई.) में श्री मदन गोपाल (1919 -2009 ई.) ने लिखी है। मूल पुस्तक अंग्रेजी में लिखी गई थी बाद में श्री मदन गोपाल ने हिंदी में अनुबाद किया।

      * प्रेमचंद की मृत्यु के बाद शिवरानी देवी का वह विलाप ह्रदय को छू लेता है कि जब-तक जो चीज हमारे पास रहती है तबतक हमें उसकी कद्र नहीं होती लेकिन वो हमसे ओझल हो जाए तो हमारा मन पछताता रहता है फिर हमारे पास दुःखी होने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता है।

Saturday, June 8, 2024

समास

हवन-सामग्री, नीलोत्पल, शताब्दी, महोदधि, दुतरफा, आनन्दाश्रम, राजदरबार, त्रिभुवन, देशहितैषी, शोभा निकेतन, कुछ - कुछ, अनाथालय, वस्तुतत्व, झाड़-झंखार, धरतीधकेल, बुद्धिहीन, चहल-पहल, पाश् र्वभूमि, हिमालय, डांट-फटकार, चतुर्भुज

संधि

शिवालिक, अन्तर्भूत, परमावश्यक, अन्तर्निरुद्ध, सद्गुण, दुर्जन, उल्लास, दोशोद्धार, सज्जन, अनाथालय, द्वन्द्वातीत, आविर्भाव, कुबेरोचित, निस्संदेह, नीरस, परमेश्वर, महात्मा, विचारोत्तेजक, संतोष, नीलोत्पल, महोदधि, संशोधित, रत्नाकर, संतुष्ट, कुटोल्लास, यद्यपि