Wednesday, November 22, 2023

रविदास जयन्ती पर विशेष-- अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी

रविदास जयन्ती पर विशेष-- अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी


रविदास जयन्ती पर विशेष
अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी
निर्गुण भक्ति के दैदिप्तमान नक्षत्र संत शिरोमणि रविदास उर्फ रैदास रामानंद के शिष्य, कबीर के गुरु भाई और भक्ति की प्रकाष्ठा मीरा के अध्यात्मिक गुरु थे। मीरा बाई ने लिखा भी है- 
गुरु मिलीया रविदास जी दीनी ज्ञान की गुटकी
चोट लगी निजनाम हरी की महारे हिवरे खटकी।
15वीं शताब्दी में जब हमारा समाज अनेक विसंगतियों का बंदी था, इस महान संत, दर्शनशास्त्री, कवि, समाज-सुधारक ने एक ऐसा अलख जगाई जिसने आध्यात्मिक और सामाजिक परिवर्तन की लहर को गति प्रदान की।  उन्होंने अपनी अनेक रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान किया। इनकी रचनाओं की विशेषता लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग था, जिसका मानव धर्म और समाज पर अमिट प्रभाव पड़ता है। संत रैदास की वाणी विचार और धर्म की विभिन्न शाखाओं को जोड़ने वाला एक ऐसा सेतु  है । जो समाज जर्जर करने वाली छुआ-छूत, ऊँच-नीच, असमानता की बाधाओं को दूर कर बंधुत्व  में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। आप कहा करते थे-
आज दिवस लेऊँ बलिहारा ।
मेरे घर आया रामका प्यारा।।
आँगन बँगला भवन भयो पावन ।
हरिजन बैठे हरिजस गावन।।
करूँ डंडवत चरन पखारूँ।
तन-मन-धन उन उपरि वारूँ।।
कथा कहै अरु अरथ बिचारैं।
आप तरैं औरन को तारैं।।
कह रैदास मिलैं निज दासा ।
जनम जनमकै काटैं पासा।।
रविदास जी का दर्शन है-
जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।
रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।
हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।।
कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।
हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस।
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास।।
जातिवाद के आधार पर ईश्वर की भक्ति को रैदास ने सारहीन बताया और इस बात पर जोर दिया कि अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर नहीं बल्कि अपने आचरण तथा व्यवहार से मनुष्य महान होता है। 
गाइ गाइ अब का कहि गाऊँ।
गांवणहारा कौ निकटि बतांऊँ।। 
जब लग है या तन की आसा, तब लग करै पुकारा।
जब मन मिट्यौ आसा नहीं की, तब को गाँवणहारा।।
जब लग नदी न संमदि समावै, तब लग बढ़ै अहंकारा। 
tब मन मिल्यौ रांम सागर सूँ, तब यहु मिटी पुकारा।।
जब लग भगति मुकति की आसा, परम तत सुणि गावै।
जहाँ जहाँ आस धरत है यहु मन, तहाँ तहाँ कछू न पावै।।
छाड़ै आस निरास परंमपद, तब सुख सति करि होई।
कहै रैदास जासूँ और कहत हैं, परम तत अब सोई।।
अपने समय के ऐसे महान संत जिन्हें सर्वसमाज सम्मान देता था रविदास जी  के 41 पद सिक्खों के पांचवे गुरु अर्जन देव द्वारा संकलित गुरुग्रंथ साहिब में संकलित हैं। जिनका गायन  विभिन्न रागों में होता है। जिनका विवरण इस प्रकार से है-   राग जैतसारी, रामकली,  केदारा, भाईरऊ,बसंत, गुजारी  तथा रागा-सिरी में एक-एक  पद, मारु, बिलावल, गौंड में दो-दो पद, मलहार, सुही और धनसरी में तीन-तीन पद, गौरी में 5 पद,  असा में 6 पद और सोरथ में 7 पद।
निर्गुण भक्ति के उपासक रविदास जी ने राम के विभिन्न स्वरुपों यथा राम, रघुनाथ, राजा राम चन्द्र, कृष्णा, गोविन्द आदि के नामों का इस्तेमाल अपनी भावनाओं को उजागर करने के लिये किया।
राम मैं पूजा कहा चढ़ाऊँ।
फल अरु फूल अनूप न पाऊँ।।
थन तर दूध जो बछरू जुठारी ।
पुहुप भँवर जल मीन बिगारी।।
मलयागिर बेधियो भुअंगा।
विष अमृत दोउ एक संगा।।
मन ही पूजा मन ही धूप।
मन ही सेऊँ सहज सरूप।।
पूजा अरचा न जानूँ तेरी।
कह रैदास कवन गति मोरी।।
संत शिरोमणि रविदास जी महाराज ऐसी दुनिया बनाना चाहते थे जो बिना किसी दुख, दर्द, डर और भेदभाव, अभाव और अपमान से मुक्त होकर रहें। आप आड़म्बर की बजाय वास्तविक धर्म के पक्षधर थे। एक बार कुछ लोगों ने रविदास जी को गंगा में स्नान के लिए चलने को कहा लेकिन उन्होंने एक ग्राहक को दिये वचन को प्राथमिकता देना आवश्यक समझा। बार-बार आग्रह करने पर आपका मानना था- ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ अर्थात् शरीर से अधिक मन, बुद्धि और आत्मा कोे पवित्र होना चाहिए। अगर हमारी आत्मा और मानसिकता पवित्र और शुद्ध है तो हम कहीं भी नहाये, पवित्र है। अगर आत्मा मैली है तो गंगा स्नान भी व्यर्थ है। अश्पृश्यता के विरोधी संत रविदास जी ने लोगों को संदेश दिया कि ‘ईश्वर ने इंसान बनाया है न कि इंसान ने ईश्वर बनाया है।’ 
संत  रविदास जी के इस दर्शन से प्रभावित होकर अनेक  राजां और समृद्ध लोग उनके अनुयायी बनेे लेकिन वे किसी से भी किसी प्रकार का धन या उपहार नहीं स्वीकारते थे। एक दिन किसी सेठ ने एक कीमती पत्थर उन्हें देना चाहा लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया। इसके बावजूद वह यह कह कर छोडत्र गया कि बाद में ले जाऊंगा। कई वर्षों बाद जब वह लौटा तो पत्थर जस का तस रखा हुआ था। रविदास जी ने सभी को  धन के लालच से दूर रहने की सीख देते हुए कहा, ‘धन कभी स्थायी नहीं होता, आजीविका के लिये कड़ी मेहनत करो।’
यद्यपि जन्म वर्ष को लेकर अनेक मत है लेकिन यह तय है कि वह दिन माघ पूर्णिमा का ही था जब माता कालसा देवी और बाबा संतोख दास के घर रविदास ने अवतार लिया। उनके पिता जूतों का व्यापार और मरम्मत का कार्य करते थे। अपने बचपन से ही रविदास ने जातिगत विषमता को अनुभव कर उसके विरूद्ध बदलाव की ठानी। आपनेे सभी को बिना किसी  भेद-भेदभाव के प्रेम, शांति और भाईचारे से मिलजुल कर रहने की शिक्षा दी। अपने अध्यापन के आरंभिक दिनों में काशी में आपको कुछ  रुढिवादी लोगों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन उनके अध्यापक पंडित शारदानंद को रविदास के असामान्य प्रतिभाशाली और चमत्कारी व्यक्तित्व होने का अहसास हो गया था। उनका पुत्र  और रविदास मित्र बन गये। दोनों साथ-साथ खेला करते। एक शाम दोनो लुका-छिपी खेल रहे थे। बारी-बारी से दोनो छिपते तो दूसरा उसे ढ़ूंढता। जब रविदास  की बारी आई तो अंधेरा बढ़ जाने के कारण खेल रोकना पड़ा। अगली सुबह रविदास अपने मित्र की प्रतीक्षा करते रहे पर वह नहीं आया। जब वे उसके घर गये तो सभी को गुरुपुत्र के शव के पास बैठ रोते पाया। बालक रविदास ने शव के पास जाकर कहा, ‘उठो ये सोने का समय नहीं है दोस्त, ये तो लुका-छिपी खेलने का समय है।’ आश्चर्य कि वह उठ खड़ा हुआ। यह देख सभी चकित रह गये। ,
ईश्वरीय भक्ति और वैराग्य और  पारिवारिक व्यवसाय से नहीं जुड़ पाने से चितिंत रविदास जी के माता-पिता  ने बहुत कम आयु में ही उनका विवाह कर दिया। इसका भी जब बहुत प्रभाव नहीं पड़ा तो  क्षुब्ध होकर पिता ने बिना कोई मदद और पारिवारिक संपत्ति दिये उन्हें अलग कर दिया। इसके बाद से रविदास पारिवारिक सामाजिक मामलों से जुड़ गये। लेकिन अपने असली उद्देश्य यानि प्रभु भक्ति संग सामाजिक समरसता को कभी विस्मृत नहीं किया। समाज में उनकी महान प्राकृतिक शक्तियों और ईश्वर के प्रति उनकी सच्ची निष्ठा देखकर हर जाति और धर्म के लोगों पर प्रभाव पड़ा और वे उनके भक्त और अनुयायी बन गये। 
संत रविदास जी की चमत्कारिक शक्तियों के विषय में अनेक कथायें प्रचलित हैं। कहा जाता है कि एक बार एक व्यक्ति कुंभ स्नान के लिए जा रहा था। संत रविदास जी ने उसे एक सिक्का देते हुए कहा, ‘आप इसे  गंगा माता को ही देना।’ कुंभ स्नान के बाद घर लौटने से पूर्व उस व्यक्ति को रविदास जी के दिये सिक्के की याद हो आई। उसनेे नदी किनारे जाकर जोर से रविदास जी का भेजा सिक्का स्वीकार की बात कही तो गंगा माँ प्रकट होकर उसे स्वीकारा और उपहार के रूप में सोने के दो खूबसूरत कँगन उनके लिए  भेजे। लेकिन रास्ते में उसका मन बदल गया और उसने वे कंगन रविदास जी की बजाय बेचने के लिए बाजार में ले गया। सुनार होशियार था। वह समझ गया कि ये कंगन इसके नहीं हो सकते। उसने वे कँगन  रानी को देखने के लिए भेजे। रानी ने ठीक वैसे ही दो और कंगन लाने को कहा परंतु सुनार बना नहीं सका तब सब बात खुल गई। अंत में वे रविदास जी की शरण में गये तो उन्होंने चमड़ा भिगोने वाले अपने पात्र में हाथ डालकर ठीक वैसे ही अनेक और कंगन देकर उनकी जान बचाई। संत रविदास जी  इस दैवीय शक्ति ने राजा को भी उनका अनुयायी बना दिया।
इसी प्रकार कहा जाता है कि एक बार एक सेठ ने उनसे ज्ञान देने को कहा तो उन्होंने उसे मिट्टी के मैले से बत्रन में पानी देते हुए उसे पीने को कहा। धमंड से भरे उस सेठ ने उसे शुद्ध न समझते हुए पीने का दिखावा करते हुए उसे अपने कपड़ों पर गिरा लिया। कीमती कपड़ों पर लगे दाग छुड़ाने के दौरान गरीब धोबी ने उसे अपने कुष्ठ रोगी बालक को दे दिया। उस बालक ने मुंह से वे दाग छुडज्ञत्रने की कोशिश की तो कपड़ों में समाया वह पवित्र जल उसके अंदर पहुंचकर अमृत बन गया और उसका कुष्ठ ठीक हो गया। जबकि उस सेठ को घर बैठे कुष्ठ  हो गया। उसने योग्य अनुभवी योग्य वैद्यों खूब महंगे से महंगा उपचार कराया लेकिन स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती ही गई। अंत में उसने संत रविदास जी के पास जाकर अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी और फिर से वही जल ग्रहण कर ठीक हुआ।
मन की मैल को धोने को भक्ति बताते हुए रविदास जी कहते हैं-
कवन भगितते रहै प्यारो पाहुनो रे।
घर घर देखों मैं अजब अभावनो रे।।
मैला मैला कपड़ा केता एक धोऊँ ।
आवै आवै नींदहि कहाँलों सोऊँ।।
ज्यों ज्यों जोड़ै त्यों त्यों फाटै।
झूठै सबनि जरै उड़ि गये हाटै ।।
कह रैदास परौ जब लेख्यौ।
जोई जोई, कियो रे सोई सोई देख्यौ।।
इस महान संत की जयन्ती पर उन्हें शत-शत नमन करते हुए आओ हम उनके बताये मार्ग पर चलने का संकल्प ले।
अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी ।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी , जाकी अँग-अँग बास समानी ।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा , जैसे चितवत चंद चकोरा ।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती , जाकी जोति बरै दिन राती ।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा , जैसे सोनहिं मिलत सुहागा ।
प्रभु जी, तुम तुम स्वामी हम दासा , ऐसी भक्ति करै रैदासा

Tuesday, October 31, 2023

आषाढ़ का एक दिन


नाटक की ऐतिहासिकता:

      अपने दूसरे नाटक (“लहरों के राजहंस” 1963) की भूमिका में मोहन राकेश ने लिखा है- “मेघदूत पढ़ते समय मुझे लगा करता था कि वह कहानी निर्वासित यक्ष की उतनी नहीं है, जितनी स्वयं अपनी आत्मा से निर्वासित उस कवि की जिसने अपनी ही एक अपराध-अनुभूति को इस परिकल्पना में ढाल दिया हैं।”

      इस प्रकार मोहन राकेश जी ने कालिदास की इसी निहित अपराध-अनुभूति को आषाढ़ का एक दिन का आधार बनाया है। इससे यह स्पष्ट होता है, कि जो कालिदास मेघदूत लिखे है, उन्ही के ऊपर यह नाटक है। और उन्ही की भावनाओं और विचारों को लेकर मोहन राकेश जी ने इस नाटक को लिखा है।

  कालिदास की चर्चा स्कंदगुप्त नाटक में भी जयशंकर प्रसाद जी ने किया है। स्कंदगुप्त नाटक में जयशंकर प्रसाद जी ने स्कंदगुप्त पर अधिक ध्यान दया है वही आषाढ़ की एक दिन में कालिदास के ऊपर मोहन राकेश ने प्रकाश डाला है। ये वही कालिदास जी है जो मातृगुप्त के रूप में कश्मीर के शासक बने थे।

      जयशंकर प्रसाद के शब्दों में- (स्कंदगुप्त 1928 की भूमिका) में उन्होंने लिखा था। “मेरा अनुमान था कि मातृगुप्त कालिदास तो थे परन्तु द्वितीय और काव्यकर्ता कालिदास।” इस प्रकार हम कह सकते है कि ‘आषाढ़ का एक दिन’ ऐतिहासिक नाटक है   

नाटक के पात्र

कालिदास: कवि और नायक

अंबिका: गाँव की एक वृद्धा, मल्लिका की माँ  

मल्लिका: अंबिका की पुत्री, कालिदास की प्रेमिका  

दंतुल: राजगुरु

मातुल: कवि-मातुल

निक्षेप: गाँव का पुरुष

विलोम: गाँव का पुरुष

रंगीनी, संगिनी: दोनों नागरी

अनुस्वार, अनुनासिक: दोनों अधिकारी

प्रियंगुमंजरी: राजकराजकन्या, कवि-पत्नी

‘अषाढ़ के एक दिन’ नाटक का मुख्य बिंदु:

इस नाटक में मोहन राकेश जी ने भौतिक दर्शन और प्रवृति मार्ग और निवृति मार्ग के घनीभूत द्वंद्व का ही चित्रण किया है।

मोहन राकेश जी ने नाटक में यह दिखाया है कि जीवन में भोग कुछ समय के लिए आकृष्ट तो करता है किन्तु अंत में वह अपना महत्व खो देता है।

इस नाटक में इतिहास और कल्पना का सुन्दर समन्वय है। इस नाटक में तीन अंक और दृश्य भी तीन है।

आषाढ़ का एक दिन

आषाढ़ का एक दिन नाटक की कथानक:

      अषाढ़ का एक दिन नाटक की कथावस्तु संस्कृत के प्रसिद्ध कवि नाटककार कालिदास जो कश्मीर के शासक के रूप में मातृगुप्त के रूप में प्रसिद्ध हुए की कहानी है। मल्लिका और कालिदास के प्रेम को आधार बनाकर नाटककार मोहन राकेश जी ने यथार्थ और भावना के द्वंद्व को दिखाया है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि जीवन में भावना का स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण होता है, लेकिन जीवन तो यथार्थ में ही जीना होता है।

      यह एक त्रिखंडीय नाटक है। पहले खंड में युवक कालिदास हिमालय में स्थित अपने गाँव में शांतिपूर्ण जीवन गुजार रहें थे और अपनी कला को विकसित कर रहे थे। वहीँ पर उन्हें एक युवती मल्लिका के साथ प्रेम संबंध है। नाटक का दृश्य बदलता है, जब वहाँ से दूर उज्जयनी के कुछ दरबारी कालिदास से मिलते हैं और उसे सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार में चलने के लिए कहते हैं। कालिदास असमंजस में पड़ जाते हैं। एक तरफ उनका सुन्दर, शान्ति से भरा गाँव का जीवन है और दूसरी तरफ उज्जयनी के राजदरबार में प्रश्रय पाकर महानता पाने का अवसर। 

       कथा का आरंभ अषाढ़ के पहले दिन की वर्षा से होता है। मल्लिका कालिदास की भावनात्मक धरातल पर सच्चा और पवित्र प्रेम करती है। और वह उन्हें महान होते हुए भी देखना चाहती है। वह उन्हें उज्जयनी जाने की राय देती है। कालिदास भारी मन से उज्जयनी चले जाते हैं। उसकी माँ अंबिका कहती है कि जीवन में यथार्थ की पूर्ति भावना मात्र से नहीं हो सकती है। कालिदास उज्जयनी में राज कवि के रूप में बुलाये जाते हैं। आचार्य वररुचि उन्हें लेने के लिए आते हैं।

       नाटक के दूसरे खण्ड में पता चलता है कि कालिदास की कीर्ति बढ़ती जाती है। उनका विवाह राजकन्या प्रियंगु मंजरी से हो जाता है। गाँव में मल्लिका दुखी और अकेले रह रही थी। उनको काश्मीर का राजा बनाया जाता है। अब वे कालिदास से मातृगुप्त बन जाते है। कालिदास और प्रियंगु मंजरी कश्मीर जाते हैं। वहाँ वे मल्लिका के गाँव में आते हैं, लेकिन कालिदास मल्लिका से नहीं मिलते हैं प्रियंगुमंजरी ही मल्लिका के घर जाकर उससे मिलती है। वह मल्लिका से सहानुभूति जताती है और कहती है कि वह उसे अपने सखी बना लेगी और उसका विवाह किसी राजसेवक के साथ करवा देगी। मल्लिका साफ़ इनकार कर देती है।

       नाटक के तृतीय और अंतिम खण्ड में कालिदास गाँव में अकेले ही आता है। यह खबर मल्लिका को मिलती है कि कालिदास को कश्मीर का राज्यपाल बना दिया गया है लेकिन वह सबकुछ त्याग कर यहाँ आ गया है। समय का चक्र चलता है। मल्लिका की माँ की मृत्यु हो जाती है। मल्लिका की विवशता उसे ग्राम पुरुष विलोम के जाल में फ़सा देती है। निसहाय मल्लिका की शादी विलोम के साथ हो चुकी है और उसकी एक पुत्री है। कालिदास मल्लिका से मिलने आता है लेकिन मल्लिका के जीवन की इन सच्चाइयों को देख कालिदास निराश होकर चला जाता है। नाटक इसी जगह समाप्ति पर पहुँचता है।

       यह नाटक दर्शाता है कि कालिदास के महानता पाने के लिए कालिदास और माल्लिका को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। जब कालिदास मल्लिका को छोड़कर उज्जयनी में बस जाता है, तब उसकी ख्याति और उसका रुतवा तो बढ़ जाता है लेकिन उसकी सृजनशक्ति चली जाती है। उसकी पत्नी प्रियंगुमंजरी इस प्रयास में जुटी रहती है कि उज्जयनी में भी कालिदास के इर्द-गिर्द उसके गाँव जैसा ही वातावरण बना रहे, लेकिन वह स्वयं मल्लिका नहीं बन पाती है।

नाटक के अंत में जब कालिदास की मल्लिका से अंतिम बार बात होती है तब वह मानता है कि “तुम्हारे सामने जो आदमी खड़ा है, यह वह कालिदास नहीं है जिसे तुम जानती थी।”  

Monday, October 9, 2023

जो साथ न मेरा दे पाए, उनसे कब सूनी हुई डगर?

मृत्यु सत्य है ये जानते हुये भी हर व्यक्ति यहॉं रहने का पुरा व्यवस्था कर रहा है। कुछ चीजें सच में भगवान करते है श्रेय हमें मिल जाता है। मेरे मां - पिता को कैंसर था मौत कैंसर से हुई। एक कैंसर घर तोड़ देता है यहां दोनों को हो गया। बिमारी किसे हो, नहीं कहा जा सकता। दुर्गापूजा के समय ही मां को कैंसर हुआ है ये पता चला। पूजा को लेकर जितनी अच्छी स्मृतियाँ थी धूमिल हो गयी। पूजा के समय रोड़ बजार भरा-भरा रहता हो लेकिन अस्पताल खाली रहता है। प्रायः सभी डाक्टर घुमने बाहर चले जाते है। कोई अच्छा डाक्टर नहीं मिला। मां की परेशानी बढ़ती जा रही थी लेकिन हिम्मती थी। जो मेरी मां से मिले होंगे उसके हिम्मतीपन को जानते होंगे। कैंसर जैसे बड़ी बिमारी भी हमलोगों से छुपा कर रखी थी। खुद डाक्टर के पास जाती टेस्ट कराती और हमें कुछ नहीं बताती। मां को कैंसर है ये बात डायग्नोस्टिक सेंटर वाले एक मित्र ने बताया या बुरी तरह से फटकारते हुये कहा कि इतना व्यस्त हो कि मां को कैंसर है और उनके साथ कोई आता भी नहीं है।ये शब्द सुनने के बाद रोम रोम कांप गया। घर गया रिपोर्ट देखने लगा मां समझ गयी और रोने लगी। कैंसर उसका हिम्मत नहीं तोड़ पाया लेकिन संतान को तकलीफ होगा, यह बात उसे अंदर से तोड़ दिया। पिता के बिमारी और पैसे खर्च को जानती थी। उसका कष्ट बिमारी नहीं था उसको तकलीफ इस बात का था कि मेरे वजह से मेरे बच्चों को तकलीफ होगा। टाटा मेडिकल में भर्ती कराया गया नहीं बच पायी। तीन दिन में ही मर गयी। बहुत तकलीफ नहीं दी मरते हुये भी बचा गयी। टाटा से ही सफर शुरू हुआ। मां के मरने के बाद भी टाटा से रिश्ता रहा। भगवान ने निमित्त बना लिया मुझे.... इस बार भी कैंसर के लिये हमें बड़ा मदद मिला है और हम टाटा के साथ मिलकर मरीजों के लिये कुछ कर पायेंगे। भगवान को धन्यवाद.... इस लायक बनाने के लिये। मां के समय मेडिकल प्रबंधन को यह बात अच्छी लगी थी कि आपके साथ इतने लोग है। वो लोग आज भी है..... समाज में हम गिलहरी प्रयास कर रहें है.....दुख बीत जाने के बाद लोग समान्य जीवन में रम जाते है। उन्हें दूसरे के दुख से कोई लेना-देना नहीं रहता। 

धन की भाषा कल भी नहीं समझ पाता और आज भी नहीं। इसलिए बहुत जगह अनफिट हो जाता हूँ। अब लगता है कि प्रभु ने दुख नहीं दिया बल्कि हिम्मती बनाया है।

पूरे घटना क्रम को जब जब सोचता हू शिवमंगल सिंह की कविता याद आती है...... 

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,


उस-उस राही को धन्यवाद।

जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं,
सीमित पग-डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं।
दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रमाद
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
उस-उस राही को धन्यवाद।

साँसों पर अवलम्बित काया, जब चलते-चलते चूर हुई,
दो स्नेह-शब्द मिल गए, मिली नव स्फूर्ति, थकावट दूर हुई।
पथ के पहचाने छूट गए, पर साथ-साथ चल रही याद 
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
उस-उस राही को धन्यवाद।

जो साथ न मेरा दे पाए, उनसे कब सूनी हुई डगर?
मैं भी न चलूँ यदि तो भी क्या, राही मर लेकिन राह अमर।
इस पथ पर वे ही चलते हैं, जो चलने का पा गए स्वाद 
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
उस-उस राही को धन्यवाद।

कैसे चल पाता यदि न मिला होता मुझको आकुल अन्तर?
कैसे चल पाता यदि मिलते, चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर।
आभारी हूँ मैं उन सबका, दे गए व्यथा का जो प्रसाद 
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
उस-उस राही को धन्यवाद।

Thursday, September 28, 2023

मजदूरी और प्रेम

मजदूरी और प्रेम सरदार पूर्ण सिंह का एक प्रसिद्ध निबंध है जिसमें निरंतर कर्म करते रहने की प्रेरणा दी गई है। यह प्रेम प्रेरक निबंध है। इस निबंध में सर्वप्रथम लेखक ने हल चालने वाले किसान के जीवन को प्रस्तुत करते हुए उसे स्वभाव से साधु, त्यागी एवं तपस्वी बतलाया है। खेत उसकी यज्ञशाला है और वह अपने जीवन को तपाते हुए अपनी मेहनत के कणों को ही फसल के रूप में उगाता है। खेती ही उसके ईश्वरीय प्रेम का केन्द्र है। उसका सारा जीवन पत्ते-पत्ते, फूल एवं फल-फल में बिखरा हुआ है। खेती की हरियाली ही उसकी खुशी है। 

लेखक ने गडरिये के पवित्र जीवन का निरूपण करते हुए लिखा है कि किस तरह वह खुले आकाश में बैठा ऊन कातता रहता है और उनकी भेड़ें चरती रहती हैं। उसकी आँखों में प्रेम की लाली छाई रहती है और प्रकृति के स्वच्छ वातावरण में जीवन व्यतीत करता हुआ सदैव स्वस्थ रहता है। वह खुली प्रकृति में जीवन-यापन करता है। उसके बच्चे भी अत्यंत शुद्ध हृदय वाले हैं। लेखक ने ‘मजदूर की मजदूरी’ का उल्लेख करते हुए यह स्पष्ट किया है कि जो मजदूर कठिन परिश्रम करके सारे दिन काम करता है, उसे हम उसके परिश्रम के अनुकूल मजदूरी नहीं देते। यदि कोई अनाथ एवं विधवा स्त्री सारी रात बैठकर किसी कमीज को सीती है और सीते-सीते थक जाती है किंतु, पैसों के लोभ में सोती नहीं, अपितु उसे सी कर ही चैन की सांस लेती है, तो उसके इस अटूट परिश्रम की मजदूरी भला थोड़े पैसों से कैसे चुकाई जा सकती है? वास्तव में ऐसा परिश्रम प्रार्थना, संध्या या नमाज से कम नहीं है। मनुष्य के हाथ से बनी हुई वस्तुओं में निश्चय ही उसकी प्रमे मय पवित्र आत्मा निवास करती है। हाथ से जो परिश्रम किया जाता है, उसमें एक अद्भुत रस होता है, जीवन रहता है उसके हृदय का प्रेम रहता है, मन की पवित्रता रहती है, आभा एवं कान्ति रहती है। ‘मजदूरी और कला’ का निरूपण करते हुए लेखक ने मशीनों के प्रयोग की भर्त्सना की है और उन्हें मजदूरी की मजदूरी छीनने वाली बताया है। लेखक तो मशीनों के स्थान पर मजदूरी के हाथ से होने वाले काम को महत्व देता है, क्योंकि मशीने निकम्मा और अकर्मण्य बना देती है। हाथ से काम करने से मनुष्य सदैव परिश्रमी, उद्योग एवं पवित्र रहता है। 

मजदूरी और फकीरी का वर्णन करते हुए लेखक ने इन्हें मानव के विकास के लिए परमावश्यक बतालया है। बिना परिश्रमी के फकीरी व्यर्थ है और बुद्धि शिथिल पड़ जाती है। अतः किसी को भी भीख माँगना उचित नहीं, अपितु परिश्रम करके खाना चाहिए। ‘समाज का पालन करने वाली दूध की धारा’ का वर्णन करते हुए लेखक ने परिश्रम एवं हाथ से काम करने की प्रवृत्ति एक ऐसी पवित्र दूध की धारा बताया जो मानव के हृदय को पवित्र बनाती हुई इसे सच्चे ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। ‘पश्चिम सभ्यता के एक नये आदर्श’ का वर्णन करते हुए लेखक ने पाश्चात्य देशों में उस नये मोड़ की ओर संकेत किया है, जिसके फलस्वरूप पश्चिम में अब लोग मशीन की अपेक्षा मजदूरी को महत्व देने लगे हैं। मशीनों के कारण पजूंपति पनपा है और मजदूर दरिद्र हुआ है। अन्त में लेखक यही सलाह देता है कि जड़ मशीनों की पूजा छोड़कर सचेतन मजदूरों को गले लगाना चाहिए उन्हें महत्व देना चाहिए, क्योंकि इसी से मानव का कल्याण होगा और समाज समृद्ध होगा, खुशहाल होगा।

Wednesday, September 27, 2023

हिंदी गद्य के उद्भव और विकास

हिंदी गद्य के उद्भव और विकास

हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य पर भी पड़ा। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेज़ी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढ़ा और जीवन में बदलाव आने लगा। भावना के साथ-साथ विचारों को पर्याप्त प्रधानता मिली। पद्य के साथ-साथ गद्य का भी विकास हुआ और छापखाना के आते ही साहित्य के संसार में एक नयी क्रांति हुई।

      हिंदी गद्य के संबंध में आरंभ के विद्वान एकमत नहीं है। कुछ इसका आरंभ 10वीं शताब्दी मानते हैं तो कुछ 11वीं शताब्दी और कुछ 13वीं शताब्दी। राजस्थानी एवं ब्रज भाषा में हमें गद्य के प्राचीनतम प्रयोग मिलते हैं। राजस्थानी गद्य की समय सीमा 11वीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी तथा ब्रज गद्य की सीमा 14वीं शताब्दी से 16वीं शताब्दी तक मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि 10वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी के मध्य ही हिंदी गद्य की शुरुआत हुई थी। खड़ी बोली के प्रथम दर्शन अकबर के दरबारी कवि गंग द्वारा रचित ‘चंद छंद बरनन’ की महिमा में मिलता है।

हिंदी गद्य साहित्य का विकास-

      शैली की दृष्टि से साहित्य के दो भेद हैं- गद्य और पद्य। गद्य वाक्यबद्ध, विचारात्मक रचना है और पद्य छंदबद्ध/लयबद्ध भावात्मक रचना है। गद्य में बौद्धिक चेष्टाएँ और चिंतनशील मनःस्थितियाँ अपेक्षाकृत सुगमता से व्यक्त की जा सकती हैं, जबकि पद्य में भावपूर्ण मनःस्थितियों की अभिव्यक्ति सहज होती है। पद्य में संवेदना और कल्पना की प्रमुखता होती है और गद्य में विवेक की। इसी कारण पद्य को हृदय की भाषा और गद्य को मस्तिष्क की भाषा कहते हैं।

      ‘गद्य’ शब्द का उद्भव ‘गद्’ धातु के साथ ‘यत्’ प्रत्यय जोड़ने से हुआ है। ‘गद्’ का अर्थ है- बोलना, बताना या कहना। विषय और परिस्थिति के अनुरूप शब्दों का सही स्थान निर्धारण तथा वाक्यों की उचित योजना ही गद्य की उत्तम कसौटी है। इसलिए गद्य में अनेक विधाओं का समावेश है।

      गद्य की प्रमुख निम्नलिखित विधाएँ हैं- निबंध, नाटक, कहानी, संस्मरण, एकांकी, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, यात्रावृत्त, जीवनी, डायरी, पत्र, भेंटवार्ता आदि। आरंभ में अनेक विधाओं  को कहानी, निबंध आदि के साथ ही सम्मिलित कर लिया जाता था। किन्तु 19वीं शताब्दी के चौथे दशक से इनका स्वतंत्र अस्तित्व परिलक्षित होने लगा।


राष्ट्रभाषा के रूप में मानक हिन्दी खड़ी बोली का ही परिनिष्ठित रूप है। खड़ी बोली गद्य की प्रामाणिक रचनाएँ सत्रहवीं शताब्दी से प्राप्त होती है। इसका प्रमाण जटमल कृत “गोरा बादल” की कथा है। प्रारंभिक गद्य खड़ी बोली ब्रजभाषा से प्रभावित है। ब्रजभाषा के प्रभाव से मुक्त खड़ी बोली गद्य का आरम्भ उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ। खड़ी बोली गद्य का एक रूप “दक्खिनी गद्य” का है। मुस्लिम शासकों के समय, विशेषकर मोहम्मद तुगलक के शासन काल में अनेक उत्तर के मुसलमान दक्षिण में जाकर बस गए थे। ये अपने साथ उत्तर की खड़ी बोली को दक्षिण ले गए। इससे वहाँ “दक्खिनी हिन्दी” का विकास हुआ। दक्खिनी खड़ी बोली गद्य का प्रामाणिक रूप 1580 ई. से प्राप्त होता है। लगभग अठारहवीं सदी के मध्य काल से लेकर बीसवीं सदी के मध्य काल तक (सन् 1785 से 1843 ई.)।

खड़ी बोली गद्य के प्रारंभिक स्वरूप के उन्नयन में चार लेखकों का योगदान महत्त्वपूर्ण है- 

पंडित लल्लू लाल (सन् 1763-1825 ई.)

* ये फोर्ट विलियम कॉलेज में भाखा मुंशी पद पर नियुक्त थे। इन्होंने ‘भागवत’ के ‘दशम स्कंध’ की कथा के आधार पर ‘प्रेमसागर’ की रचना की।

* ये आगरा के गुजराती ब्राहमण थे। इसकी भाषा पर ब्रज का प्रभाव था।

द्विवेदी जी के शब्दों में- “इस ब्रजरंजित खड़ी बोली में भी वह सहज प्रभाव नहीं है जो सदासुखलाल की भाषा में है।” शुक्ल जी के दृष्टि में इनकी भाषा “नित्य व्यवहार के अनुकूल नहीं है। ये ‘उर्दू’ भाषा को ‘यामिनी’ भाषा कहते थे और उससे दूर रहने की सलाह देते थे। ग्रियर्सन के अनुसार ‘प्रेमसागर’ की भाषा हिंदी गद्य की स्टैंडर्ड बनी।

‘लालचंद्रिका’ की भूमिका में लल्लूलाल ने अपने ग्रंथ की भाषा के तीन भेद बताएँ हैं- ब्रज, खड़ीबोली और रेख्ते की बोली।

पंडित सदल मिश्र (सन् 1767-1848 ई.)

      ये बिहार के रहनेवाले थे। लल्लूलाल की तरह ये भी भाखा मुंशी पद पर थे। इन्होंने  ‘नासिकेतोपाख्यान’ की रचना की। ‘नासिकेतोपाख्यान’ पर ब्रज और भोजपुरी का प्रभाव है। किन्तु यह सीधे संस्कृत होने के कारण हिंदी के प्रकृति के अनुरूप है। शुक्ल जी ने इनकी भाषा को साफ़ सुथरी और व्यवहारोपयोगी कहा है। इनकी भाषा में पूर्वीपन और पंडिताऊपन है। आधुनिक हिंदी गद्य का जो आभास ‘सदासुखलाल’ और ‘सदल मिश्र’ की भाषा में दिखाई देता है उसी का आगे विकास हुआ।    


मुंशी सदासुखलाल ‘नियाज’ (सन् 1746-1824 ई.)

      मुंशी सदासुखलाल ने ‘विष्णु पुराण’ का अंश लेकर उसे खड़ी बोली में प्रस्तुत किया। इनकी भाषा शैली में पंडिताऊपन और वाक्य रचना पर फारसी शैली का प्रभाव था। ये फोर्ट विलियम कॉलेज के बाहर के लेखक थे। ये उर्दू और फ़ारसी के अच्छे लेखक और कवि थे। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार- “इनकी भाषा कुछ निखरी हुई और सुव्यवस्थित है, पर तत्कालीन प्रचलित पंडिताऊ प्रयोग भी इनमे मिल जाते हैं।” ‘सुखसागर’ के अतिरिक्त विष्णुपुराण के प्रसंगों के आधार पर मुंशी सदासुखलाल ने एक अपूर्ण ग्रंथ की भी रचना की थी। इनकी भाषा में ‘सहजता’ और ‘स्वाभाविकता’ है।

      मुंशी इंशा अल्ला खाँ (सन् 1735- 1818 ई.)

मुंशी इंशाअल्ला खाँ ने चटपटी हास्य प्रधान शैली में उदयभान चरित/ रानी केतकी की कहानी लिखी। कहानी लिखने का कारण स्पष्ट करते हुए मुंशी जी ने लिखा है- ‘एक दिन बैठे-बैठे यह ध्यान आया कि कोई ऐसी कहानी कहिए जिसमे हिंदवी छुट और किसी बोली का पुट न मिले, तब जाके मेरा जी फूल की कली के रूप में खिले। बाहर की बोली और गँवारी कुछ उसके बीच में न हो, बस जैसे भले लोग अच्छों से आपस में बोलते-चालते हैं, ज्यों का त्यों वही सब डौल रहे और छाँव किसी की न हो यह नहीं होने का।”

राजा शिवप्रसाद सितारे-ए-हिन्द (1823- 1895 ई.)

      राजा शिवप्रसाद ‘सितारे’ हिंदी विभाग में निरीक्षक के पद पर थे। ये हिंदी के प्रबल पक्षधर थे। इसलिए इसे ये पाठ्यक्रम की भाषा बनाना चाहते थे। चूकी उस समय साहित्य के पाठ्यक्रम के लिए कोई भी पुस्तक नहीं थी इसलिये उन्होंने स्वयं कोर्स की पुस्तकें लिखी और उसे हिंदी पाठ्यक्रमों में स्थान दिलवाया। इन्हीं के प्रयत्नों से शिक्षा जगत में हिंदी कोर्स की भाषा बनी। इसके बाद उन्होंने बनारस से ‘बनारस अखबार’ निकाला। इसी अखबार के द्वारा राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द ने हिंदी का प्रचार-प्रसार किया। ये हिंदी में विशुद्ध लेख लिखते थे। इन्होंने हिंदी कोर्स की पुस्तकों के लिए पंडित श्रीलाल और पंडित बंशीधर को भी इस कार्य के लिए प्रेरित किया। इसके अतिरिक्त इन्होंने ‘वीरसिंह का वृतांत’ आलसियों का कोड़ा जैसी रचनाओं का सृजन किया। इनकी गद्य भाषा प्रभावशाली और सरल थी। इसका उदहारण “राजा भोज का सपना” में इस प्रकार है- “वह कौन सा मनुष्य है जिसने महाप्रतापी राजा भोज का नाम न सुना हो। उनकी महिमा और कीर्ति तो सारे जगत में व्याप्त रही है। बड़े-बड़े महिपाल उनका नाम सुनते ही काँप उठते और बड़े-बड़े भूपति उसके पाँव पर अपना सिर नवाते।”  राजा जी उर्दू के पक्षपाती थे। उन्होंने 1864 ई. में “इतिहास तिमिर नाशक” ग्रंथ लिखा।

राजा लक्षमणसिंह (1887-1956 ई.)

      राजा लक्षमणसिंह आगरा के निवासी थे। इन्होंने हिंदी और उर्दू को दो भिन्न-भिन्न भाषाओँ के रूप में स्वीकार किया था। ये हिंदी उर्दू शब्दावली प्रधान गद्य भाषा का प्रयोग करते थे। राजा लक्षमणसिंह ने कालिदास के मेघदूतम, अभिज्ञान शाकुन्तलम् और रघुवंश का हिंदी अनुवाद किया। इन्होंने हिंदी गद्य विकास के लिए 1841 ई. में ‘प्रजा हितैसी’ पत्र भी संपादित और प्रकाशित किया। इनकी गद्य भाषा उत्कृष्ट थी। उदाहरण के लिए ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ का अनुदित गद्य है- “अनसूया (हौले प्रियबंदा से) सखी मैं तो इसी सोच विचार में हूँ। अब इससे कुछ पूछूँगी। (प्रकट) महात्मा तुम्हारे मधुर वचनों के विश्वास में आकार मेरा जी यह पूछने को चाहता है कि तुम किस राजवंश के भूषण हो और किस देश की पूजा को विरह में व्याकुल छोड़कर यहाँ पधारे हो? क्या कारण है? (हिंदी साहित्य का इतिहास- आचार्य रामचंद्र शुक्ल पृष्ठ-300)।

      राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द और राजा लक्षमण सिंह के अलावा और अनेक प्रतिभाशाली लेखकों ने हिंदी गद्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अनेक गद्य लेखकों ने अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किए और पाठ्य पुस्तकें लिखी। उनमे श्री मथुराप्रसाद मिश्र, श्री ब्रजवासी दास, श्री रामप्रसाद त्रिपाठी, श्री शिवशंकर, श्री बिहारीलाल चौबे, श्री काशीनाथ खत्री, श्री रामप्रसाद दूबे आदि प्रमुख थे। इसी समय स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ जैसे ग्रंथ की हिंदी गद्य में रचना कर हिन्दू धर्म की कुरीतियों को समाप्त किया। बाबू नवीन  चंद्रराय ने 1863-1880 ई. के मध्य हिंदी के विभन्न विषयों की पुस्तकें लिखी और लिखवाई। इसी तरह श्रद्धानंद फुल्लौरी ने सत्यमृत प्रवाह, आत्म चिकत्सा, तत्वदीपक, धर्मरक्षा, उपदेश संग्रह, आदि पुस्तकें लिखकर हिंदी गद्य के विकास में नयी दिशा प्रदान की।                

      इन लेखकों के कुछ समय पहले रामप्रसाद निरंजनी ने ‘भाषा योगवशिष्ठ’ में तथा मध्यप्रदेश के पं. दौलतराय साधु थे। उनहोंने अपनी रचनाओं में खड़ी बोली गद्य का प्रयोग किया था। इन्हीं दिनों ईसाई मिशनरी ने भी बाइवल का हिन्दी खड़ी बोली गद्य में अनुवाद कराकर हिन्दी गद्य के विकास में अपना योगदान दिया। किन्तु उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण तक हिन्दी गद्य का स्वरूप पूर्णतः परियोजित नहीं हो पाया था। उन्नीसवीं शताब्दी का द्वितीय एवं तृतीय चरण भारतीय सामाजिक एवं राष्ट्रीयता के जागरण का काल था। इस नवीन चेतना का अभ्युदय बंगाल से हुआ। यहीं से समाचार पत्रों के प्रकाशन का प्रारंभ हुआ। यह प्रदेश ब्रजभाषा से दूर था इसलिए नवीन चेतना को अभिव्यक्त करने का भार खड़ी बोली पद्य को वहन करना पड़ा। नवीन चेतना के इस जागरण काल में अनेक संस्थाओं का योगदान था। इनमें प्रमुख थीं- ब्रह्मसमाज, रामकृष्ण मिशन, प्रार्थना समाज, आर्यसमाज, थियोसाफिकल सोसायटी इत्यादि। इन संस्थाओं में विशेषकर आर्यसमाज ने अपने विचारों के प्रचार-प्रसार का माध्यम हिन्दी गद्य को बनाया।


हिंदी गद्य के विकास को सोपानों में विभक्त किया गया है-

भारतेंदु पूर्व युग (1800-1850 ई.)

भारतेंदु युग 1850-1900 ई.

द्विवेदी युग (1900-1920 ई.)

शुक्ल युग (1920-1936 ई.)

अद्यतन (1936 ई. से आजतक

भारतेन्दु पूर्व युग (1800 -1850 ई.)

      हिंदी में गद्य का विकास 19वीं शताब्दी के आसपास से माना जाता है विकास के इस काल में कलकाता फोर्ट विलियम कॉलेज की महत्वपूर्ण भूमिका रही इस कॉलेज के दो विद्वान लल्लूलाल तथा सदल मिश्र ने गिलक्रिस्ट के निर्देशन में प्रेमसागर तथा नासिकेतोपाख्यान नामक दो पुस्तके तैयार की। इसी समय सदासुख लाल ने सुखसागर तथा मुंशी इंशाअल्लाह ने रानी केतकी की कहाणी की रचना की। इन सभी ग्रंथों की भाषा में उस समय के प्रयोग में आने वाली खड़ी बोली को स्थान मिला। आधुनिक खड़ी बोली गद्य के विकास में विभिन्न धर्मों की पुस्तकों का खूब सहयोग रहा जिसमे ईसाई धर्म का भी सहयोग था। बंगाल के राजा राममोहन राय ने 1815 ई. में वेदांतसूत्र का हिंदी अनुवाद कर प्रकाशित करवाया इसके बाद उन्होंने 1829 ई. में बंगदूत नाम का पत्र हिंदी में निकाला। इसके पहले 1826 ई. में कानपुर के पंडित जुगलकिशोर हिंदी पहला समाचार पत्र उदंतमार्तंड कलकाता से निकाला। आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश हिंदी में लिखा।  

भारतेन्दु युग (1850 -1900 ई.)

      भारतेन्दु जी के पूर्व हिन्दी गद्य में दो शैलियाँ प्रचलित थीं। प्रथम राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद की 1823 से 1895 गद्य शैली थी। वे हिन्दी को नफीस बनाकर उसे उर्दू जैसा रूप प्रदान करने के पक्षधर थे। दूसरी शैली के प्रवर्तक राजा लक्ष्मणसिंह थे जो हिंदी को अधिकाधिक संस्कृतनिष्ठ करने के पक्षधर थे। भारतेंदु ने इन दोनों के बीच का मार्ग ग्रहण कर उसे हिंदी भाषा प्रदेशों की जनता के मनोनुकूल बनाया। लोक प्रचलित शब्दावली के प्रयोग के कारण भारतेन्दु जी का गद्य व्यावहारिक, सजीव, और प्रवाहपूर्ण है। बालकृष्ण भट्ट, पं. प्रताप नारायण मिश्र, राधाचरण गोस्वामी, बदरी नारायण चौधरी “प्रेमधन”, ठाकुर जगमोहन सिंह, राधाकृष्ण दास एवं किशोरी लाल गोस्वामी भारतेंदु जी के सहयोगी एवं समकालीन लेखक थे।

पं. बालकृष्ण भट्ट इलाहाबाद से “हिन्दी प्रदीप” नामक मासिक पत्र निकालते थे। उनकी शैली विनोदपूर्ण और चुटीली थी तथा इसमें व्यंग्य में सरसता के साथ मार्मिकता भी है। उन्होंने अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत तथा लोक भाषा के शब्द लिए। उनके निबंधों के विषय में विविधता थी। प्रतापनारायण मिश्र ने “ब्राम्हण” पत्रिका के माध्यम से हिन्दी गद्य साहित्य को समृद्ध करने का प्रयास किया। उन्होंने समाज सुधार एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान की दृष्टि से निबंध लिखे। चुलबुलापन, हास-परिहास, आत्मीयता और सहजता उनकी भाषा शैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं। बदरी नारायण चौधरी “प्रेंमधन” “आनंद कादम्बिनी” पत्रिका का संपादन करते थे। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ तथा शैली काव्यात्मक है। श्री राधाचरण गोस्वामी, ठाकुर जगमोहन सिंह ने सामयिक समस्याओं पर निबंध लिखे।

द्विवेदी युग (1900-1920 ई.)

      भारतेन्दु युग में हिंदी गद्य का स्वरूप काफी हद तक निखरा किंतु अभी भी उसमें परिष्कार परिमार्जन की आवश्यकता थी। यह कार्य द्विवेदी युग में पूरा हुआ। इस काल का नामकरण पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर किया गया। द्विवेदी जी ने “सरस्वती” के माध्यम से व्याकरणनिष्ठ, स्पष्ट एवं विचारपूर्ण गद्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। उन्होंने तत्कालीन भाषा का परिमार्जन कर उसे व्याकरण-सम्मत रूप प्रदान किया और साहित्यकारों को विविध विषयों पर लेखन के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित किया।

द्विवेदी युग के प्रमुख गद्यकारों में श्री माधव मिश्र, गोविंद नारायण मिश्र, ‘पद्मसिंह शर्मा, सरदारपूर्ण सिंह, बाबू श्यामसुंदर दास, मिश्र बंधु, बाबा भगवानदीन, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि हैं। इस काल में अनेक गंभीर निबंध, विवेचनापूर्ण आलोचनाएँ, कहानियाँ, उपन्यास तथा नाटक लिखे गये और इस प्रकार गद्य साहित्य के विविध रूपों का विकास हुआ।

      हिन्दी निबंध और आलोचना के क्षेत्र में बाबू श्यामसुंदर दास का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने “नागरी प्रचारिणी” सभा की स्थापना की तथा साहित्यिक, सांस्कृतिक भाषा एवं वैज्ञानिक विषयों पर निबंध लिखे। चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी ने अपनी पांडित्यपूर्ण व्यंग्य प्रधान शैली में निबंध और कहानियाँ लिखकर हिन्दी गद्य साहित्य को समृद्ध किया। सरस्वती के अतिरिक्त “प्रभा”, “मर्यादा”, “माधुरी”, “इन्दु”, “सुदर्शन”, “समालोचक”, आदि अन्य पत्रिकाओं में भी गद्य साहित्य के प्रचार एवं प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस युग के उत्तरार्ध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और बाबू गुलाबराय के आविर्भाव से हिंदी गद्य की विकासधारा को एक नई दिशा मिली।


शुक्ल युग (1920 – 1936 ई०)

      द्विवेदी युग नैतिक मूल्यों के आग्रह का युग था। जबकि इस युग में द्विवेदी युग की प्रतिक्रिया स्वरूप साहित्य में भाव-तरलता, कल्पना-प्रधानता और स्वच्छंद चेतना आदि भावनाओं का समावेश हुआ। परिणाम यह हुआ कि इस युग में रचित गद्य साहित्य अधिक कलात्मक, लाक्षणिक, कवित्वपूर्ण और अंतर्मुखी हो गया। इस युग के प्रमुख गद्यकारों में आचार्य रामचंद्र शुक्ल, बाबू गुलाबराय, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, रामकृष्ण दास, वियोगी हरि, डॉ. रघुवीर सिंह, शिवपूजन सहाय, वर्मा, पंत, निराला, नंददुलारे बाजपेयी, बेचन शर्मा ‘उग्र’ के नाम मुख्य हैं।

      आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने दो प्रकार के निबंध लिखे – ‘साहित्यिक’ एवं ‘मनोविकार’ संबंधी। उनके साहित्यिक निबंध भी दो वर्ग के हैं – ‘सैद्धांतिक’ तथा ‘व्यावहारिक’ समीक्षा से संबंधित। शुक्ल जी को युगांतकारी निबंधकार कहा जाता है। इसका श्रेय उनके मनोविकार संबंधी निबंधों को जाता है। गुलाबराय जी के कुछ निबंध साहित्यिक विषयों पर तथा कुछ सामान्य विषयों पर लिखे गए हैं। बख्शी जी के निबंध विचारात्मक, समीक्षात्मक तथा विवरणात्मक हैं।

अद्यतन युग (1936 से आजतक )

       इस काल में गद्य का चहुंमुखी विकास हुआ इस युग में मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित होकर लेखकों ने यथार्थवादी जीवन दर्शन को महत्व देना आरंभ किया। इस युग में साहित्यकारों की दो पीढ़ियाँ परिलक्षित की जा सकती हैं।

      प्रथम पीढ़ी उन साहित्यकारों की है जो स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व से लिखते आ रहे थे। इस पीढ़ी में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, शांतिप्रिय द्विवेदी, रामधारी सिंह दिनकर, यशपाल, उपेन्द्रनाथ अश्क, भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर, जैनेंद्र, अज्ञेय, रामवृक्ष बेनीपुरी, वासुदेव शरण अग्रवाल तथा भगवत शरण उपाध्याय आदि प्रमुख हैं।

      दूसरी पीढ़ी उन लेखकों की है जो स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद साहित्य सृजन में प्रवृत्त हुए हैं। इनमें श्री विद्या निवास मिश्र, हरिशंकर परसाई, कुबेरनाथ राय, फणीश्वरनाथ रेणु, धर्मवीर भारती, शिवप्रसाद सिंह के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। इस युग में हिन्दी गद्य साहित्य में नवीन कलात्मक गद्य विधाओं का विकास हुआ तथा उसे राष्ट्रीय गरिमा प्राप्त हुई। आज हिन्दी की यह स्थिति है कि उसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित मान्यता मिलने लगी है।


निष्कर्ष- हिंदी गद्य के विकास में भारतेंदु हरिश्चंद्र का विशेष योगदान है लेकिन भारतेंदु युग के पहले से ही हिंदी गद्य का आरंभ हो चूका था। आधुनिक काल हिंदी गद्य का सर्वांगीण विकास का काल है। इस युग में गद्य के सभी विधाओं का उद्भव हुआ। जिसके परिणाम स्वरुप हिंदी भाषा आज विश्व की भाषाओं में गिनी जाती है।



सरस्वती पत्रिका

 पत्रिका के संपादक/प्रकाशक – चिंतामणि घोष ने आरंभ करवाया।

सरस्वती पत्रिका की स्थापना वर्ष – 1900 ई.

सरस्वती पत्रिका के संपादक (मंडल)

      1. जनवरी 1900 ई से दिसंबर 1900 ई. तक

      सरस्वती पत्रिका के संपादक मंडल में 5 संपादक थे-

            जगन्नाथ दास रत्नाकर

            किशोरीलाल गोस्वामी 

            श्यामसुन्दर दास

            राधाकृष्ण दास

            कार्तिक प्रसाद खत्री

      2. जनवरी 1901 ई. से दिसंबर 1902 ई. तक श्यामसुंदर दास इन्होंने बिना             पारिश्रमिक लिए कार्य किया।

      3. जनवरी 1903 ई. से दिसंबर 1920 तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी रहे।          साहित्यकारों के अनुसार यह पत्रिका का स्वर्णिम काल माना जाता है। आचार्य       महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका के जरिए खड़ी बोली को नई ऊचाइयां            मिली।

      4. 1921 ई. से 1925 ई. तक पदुमलाल पुन्नालाल वक्शी रहे

      5. 1926 ई. से 1927 ई. तक देवीदत्त शुक्ल रहे

      6. नवंबर 1927 ई. से जुलाई 1928 ई. तक पदुमलाल पुन्नालाल वक्शी रहे

      7. जुलाई 1928 ई. से 1948 ई. तक देवीदत्त शुक्ल रहे


नोट: जुलाई 1928 ई. दिसंबर 1928 ई. तक आचार्य रामचंद्र शुक्ल संपादन           करते रहे।

      8. 1946 ई. में उमेशचन्द्र मिश्र को संपादक बनाया गया।1946 ई. में ही अचानक        उमेशचन्द्र मिश्र का निधन हो गया। अतः 1946 ई. से 1955 ई. तक पदुमलाल    पुन्नालाल वक्शी फिर से संपादक रहे।

      9. 1955 ई. से 1960 ई. तक देवीदयाल चतुर्वेदी रहे।

      10. 1960 ई. से 1980 ई. तक नारायण चतुर्वेदी रहे। 1980 ई. में सरस्वती पत्रिका        बंद हो गई। ऑक्टूबर 2020 ई. से इसे पुनः आरंभ किया। इसके वर्तमान               संपादक देवेंद्र शुक्ल और सहायक संपादक अनुपम परिहार है।

      11. वर्तमान में ‘सरस्वती’ पत्रिका त्रैमासिक पत्रिका है।

सरस्वती पत्रिका को किसने क्या कहा:

      आचार्य शुक्ल जी ने- “सरस्वती पत्रिका को ‘प्रारंभिक काल का विश्वकोश’ कहा है।”

      गुलाबराय के अनुसार -“मेरे बाल्यकाल की अतिरिक्त ज्ञान की एक मात्र साधिका है।”

      रामविलास शर्मा ने – हिंदी का जातीय पत्रिका और आदर्श पत्रिका कहा है।”

सरस्वती पत्रिका के संबंध में आलोचकों के कथन:

      सुनित्रनंदन पन्त के अनुसार- “सरस्वती निःसंदेह तब की हिंदी की सर्वश्रेष्ठ और उच्चकोटि की मासिक पत्रिका है।”

      मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में – “उस समय सरस्वती ही एक ऐसी पत्रिका थी जिसे भारत के सभी प्रांतों में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।”

      डॉ बच्चन सिंह के शब्दों में – “सरस्वती के माध्यम से द्विवेदी जी ने हिंदी साहित्य के गद्य और पद्य की विभाजक रेखा को मिटा दिया।