Wednesday, September 27, 2023

कबीर

कबीर एक धर्मोपदेशक, समाज-सुधारक योगी और कवि के साथ-साथ महान भक्त भी थे।

‘कबीर’ फारसी का शब्द है। कबीर का अर्थ ‘महान’ˎहोता है।

  • कबीर का जन्म विक्रमी संवत् 1455 में काशी नामक स्थान पर हुआ था।
  • वि०स० को ई० में बदलने के लिए 57 से घटाने पर कबीर का जन्म 1398 ई० में हुआ था। (यह प्रमाणित है)
  • कबीर की एक रचना है “कबीर चरित्र बोध” (इसके रचनाकार अज्ञात है) इस रचना का प्रकाशन डॉ० श्यामसुंदर दास ने नागरी प्रचारिणी सभा-काशी से करवाया था। उसी ‘कबीर चरित्र बोध’ में एक दोहा मिलता है।

“संवत् चौदह सौ पचपन साल गये, चंद्रवार इक ठाठ भये।

 जेठ सुदी बरसायत को, पूर्णमासी प्रकट भये।।

  • कबीर नीरू और नीमा जुलाहा दम्पति के संतान थे। इन्होने ही कबीर का पालन-पोषण किया था।
  • डॉ रामकुमार वर्मा, डॉ गोविंद त्रिगुनायक, डॉ पीतांबर बडथ्वाल, डॉ सतनाम सिंह ने कबीर का जन्म स्थान ‘मगहर’ माना है।
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डॉ श्याम सुंदर दास, आचार्य परशुराम चतुर्वेदी, प्रभाकर माचवे एवं स्वयं कबीरदास जी ने भी अपना जन्म स्थान काशी माना है। जन्म से संबंधित कबीर का एक पद है-

“काशी में हम प्रकट भये रामानंद चेताये।”

  • सिक्ख धर्म के गुरुग्रंथ साहब में भी कबीरदास जी के वाणी को स्थान मिला है।

कबीर का जन्म काल विभिन्न विद्वानों के अनुसार:

  • ‘बिल’ ने इनका जन्मकाल 1490 ई माना है।
  • ‘फर्कुहर’ ने 1400-1518 ई माना है।
  • ‘मेकालिफ’ ने 1300-1420 माना है।
  • ‘बेसकत’ और ‘स्मिथ’ ने 1440 से 1580 माना है।
  • ‘हंटर’ ने 1300-1400 माना है।
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डॉ रामकुमार वर्मा, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और श्यामसुंदर दास इन चारों ने कबीरदास जी का जन्म 1398-1518 माना है। (सर्वमान्य है)

कबीर का निधन- 1518 ई० में हुआ था। भक्तमाल की टीका में एक पद मिलाता है। ‘भक्तमाल’ नाभादास की रचना है।


संवत् पंद्रह सौ पिचहत्तर कियो मगहर को गौण

 माघ सुदी एकादशी रत्यौ पौन में पौन।”

“जो काशी मरे मोख पावही रामहि कौन निहोरा”

  • यह पद ‘कबीर परचई’ में मिलता है, जिसकी रचना ‘अनंतदास’ ने किया था।
  • कबीरदास के गुरु ‘रामानंद’ थे। स्वयं कबीर ने माना है। (सर्वमान्य है)
  • मुस्लिम विद्वानों के अनुसार- इनके गुरु ‘शेख तकी’ हैं।
  • कबीर सिकंदर लोदी के समकालीन थे। उनपर सिकंदर लोदी के द्वारा किए गए अत्याचारों का वर्णन किया गया है। (1488-1517) के समकालीन लोदी ने उनपर अत्याचार किया था। इसका वर्णन स्वयं कबीर ने भी साखी के ‘राग गौड़’ के पद में किया है।
  • कबीर हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल के निर्गुण काव्य धारा के ज्ञानश्रयी (संत काव्यधारा के) कवि थे।
  • कबीरदास जी की रचनाएँ: अधिकांश विद्वान् कबीर की एक ही रचना ‘बीजक’ को मानते हैं। बीजक के पदों का संकलन कबीर के शिष्य धर्मदास ने किया था।

डॉ नगेन्द्र के अनुसार- “कबीर के कुल 63 रचनाएँ माना है, जिसमे प्रकाशित रचनाओं की संख्या 43 मानी है। इनमे 43 में से मुख्य रचनाएँ है- ‘अनुराग सागर’, ‘विवेक सागर’, ‘मुहम्मद बोध’, ‘हंस मुक्तावली’, ‘ज्ञान सागर’, ‘ब्रहम निरूपण’, ‘रक्षाबोध की रमैनी’, ‘विचार माला’, ‘कबीर गोरख गोष्टी’। इनमे 20 रचनाएँ अप्रकाशित है।

कबीर की पत्नी का नाम लोई था इनकी दो संताने थी। कमाल और कमाली। कमाल उदण्डप प्रवृति का नास्तिक था। कबीर के शिष्यों का कथन था-

“बूड़ा वंश कबीर का उत्पन्न भयो कमाल।”

डॉ रामकुमार वर्मा ने इनकी दूसरी पत्नी का उल्लेख किया है, जिसका नाम रमजनिया था। इनके भी दो बच्चे थे। निहाल और निहाली। कमाली कृष्ण भक्त थी। (लेकिन इससे कोई भी विद्वान सहमत नही है)। कबीर पढ़े-लिखे थे या अनपढ़, स्वयं कबीर ने अपने आपको अनपढ़ कहा है। उन्होंने स्वयं कहा है-


“कागद मसि छुयो नहीं कलम गहि नहि हाथ।”

साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल, श्यामसुंदर दास, गुलाब राय, पीतांबरदत्त बडथ्वाल भी इन्हें अनपढ़ मानते हैं। (नागरी प्रचारिणी सभा- काशी) हजारी प्रसाद द्विवेदी, नंददुलारे वाजपेयी, गणपति चंद्र गुप्त, मिश्र बंधु, ग्रियर्सन, नामवर सिंह ने भी कबीर को अनपढ़ ही  माना है।

  • कबीर ने मांस भक्षण निषेध, वैष्णवी दया का भाव रखना रामानंद से ग्रहण किया।
  • हठयोग साधना प्रणाली का ग्रहण नाथ पंथियों से किया।
  • मायावाद और अद्वैतवाद कबीर ने शंकराचार्य से ग्रहण किया।
  • प्रेमसाधना का मार्ग उन्होंने सूफी कवियों से ग्रहण किया।
  • मूर्ति पूजा, तीर्थ स्थान का विरोध कबीर ने मुस्लिम सरियत (कानून) से ग्रहण किया।
  • ज्ञान की बातें और ज्ञान मार्ग, हिंदू धर्म शास्त्रों और कुछ शंकराचार्य से ग्रहण किया।
  • कबीर की रचना बीजक है। इसका संकलन धर्मदास ने किया। बीजक के तीन भाग हैं।

साखी- ‘साखी’ साक्षी शब्द का (तद्भव) बदला हुआ रूप है। जिसका अर्थ होता है ‘प्रत्यक्ष ज्ञान’ अथार्त जो ज्ञान सबको दिखाई दे। ‘साक्षी’ के 59 भाग हैं। पहला अंग ‘गुरुदेव को भंग’ है और अंतिम ‘अबिहड़ को अंग’ है।

शबद- इसके 23 भाग हैं। यह गेय पद है। इसमें उपदेशात्मक के स्थान पर भाव की प्रधानता होती है। इसमें योगसाधना और कीर्तन संबंधी बातें हैं। भाषा ब्रज /पुरबी बोली है।

रमैनी– इसके 47 भाग हैं। यह चौपाई छन्द में लिखी गई है। इसमें कबीर के दार्शनिक विचार हैं। आत्मा, परमात्मा, मोह, माया आदि क्या है?

कबीर एकेश्वरवादी थे। उनके पद में एकेश्वरवाद का समर्थन है।

उन्होंने कहा है-

“भाई रे दोई जगदीश्वर कहाँ ते आया, कहुं कौनें भरमाया।”


“पाणी ही ते हिम भया, हिम है गया विलाय।

 जो कुछ था सोई भया, अब कुछ कहा न जाए।”

 “हम तौ एक एक करी जाना। दोई कहै तिन्हीं को दोगज जिन नाहिंन पहिचाना।”

 कबीर ने मूर्ति पूजा का विरोध किया है। वे कहते हैं –

“पाहन पूजै हरि मिलै तो मैं पूजू पहार तातै ये चाकी भली पिस खाय संसार।”

कबीर ने अजान का विरोध किया है वे कहते हैं-

“काकड़ पाथर जोरी के मस्जिद लई चुनाय,

ता चढ़ी मुल्ला बांग दे का बहरा भय खुदाय।”

अद्वेतवाद- “जल में कुंभ-कुंभ में जल है, बाहिर भीतर पानी।

फुट कुंभ जल जलहि समाना, यह तथ कथ्यों गियानी।।’

कबीर में विरह की व्याकुलता थी। वे कहते हैं –

“आँखड़ियाँ झाई पड़ी, पंथ निहार निहारी। जिभड़ियाँ छाला पड़या नाम पुकारि पुकारि।।”

“लाली मेरी लाल की जित देखूँ तित लाल, लाली देखन मैं चली मैं भी हो गई लाल।।”

कबीर ने माया का विरोध किया है-

“माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवै पडंत।

कहै कबीर गुर ग्यान थै, एक आध उनरंत।।”

कबीर ने अहिंसा और पशु बलि का विरोध किया है। वे कहते हैं –

“दिन भर रोजा रखत हैं रात हनन है गाय।


यह तो खून वह बंदगी, कैसे सुखी खुदाय।।”

कबीर ने अवतारवाद का खंडन किया है। वे कहते हैं –

“दशरथ सूत तिहुँ लोक बखाना। राम नाम का मर्म न आना।”

कबीर ने निराकार ईश्वर की उपासना किया है। वे कहते है-

“जाके मुँह माया नहीं, नाहीं रूप कुरूप।

पुहुप बास ते पातरा ऐसा तत्व अनूप।।”

देहि माह विदेह है, साहब सुरति सरूप।

अनत लोक में रमि रहा जाकैं रंग न रूप।।”

कबीर रहस्यवादी थे। वे कहते हैं –

“दुलहिनी गावहु मंगलाचार। हम घरि आए हो राजाराम भरतार।

तन रस करि मैं मन रात करि हौं, पंचतत्त बाराती।

रामदेव संगि लै हौं, मैं जोबन मैं माती।।”

कबीर ने शास्त्रीय ज्ञान का परिहास (मजाक) किया है। वे कहते हैं –

“तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आखिन की देखी।”

कबीर पर बौद्ध धर्म के महायान शाखा का प्रभाव था। वे कहते हैं –

“पानी के रे बुदबुदा, अस माणुस की जात।

 एक दिन छिप जाएगा,ज्यों तारा प्रभात।।”

कबीर ने नारी के केवल कामिनी रूप का निंदन किया है। वे कहते हैं –

“जा नारी की झांई परत अंधा होत भुजंग।

कबीरा तिन की कौन गति, जो नित नारी को संग।।”

“नागिन के तो दोय फन, नारी के फन बीस।

जाका डसा न फिर जीये, मरि है बिसबा बीस।।”

कबीर ने ईश्वर की तुलना में गुरु को उच्च स्थान दिया है वे कहते हैं –

“गुरु गोबिंद दोनों खड़े काके लागू पाँय,

बलोहारी गुरु आपनो गोबिंद दिया बताए।।”

कबीर की भाषा: ब्रज, पंजाबी, खड़ीबोली, अरबी और फ़ारसी इन पाँचों भाषाओं के शब्द     

मिलते हैं।

  • श्यामसुंदर दास ने कबीर की भाषा को ‘पंचमेल खिचड़ी’ कहा है।
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कबीर की भाषा को ‘साधुक्कड़ी’ भाषा कहा है।
  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को ‘भाषा का डिक्टेटर’ कहा है।
  • बाबुराम सक्सेना ने कबीर को अवधी भाषा के प्रथम संत कवि’ कहा है।
  • बासुदेव सिंह के अनुसार भाषा की दृष्टि से कबीर ‘सच्चे लोकनायक’ थे।

डॉ उदयनारायण तिवारी के अनुसार- “वास्तव में कबीर की मातृभाषा बनारसी बोली थी, जो भोजपुरी का विस्तृत रूप था। “नागरी प्रचारिणी सभा काशी से प्रकाशित ‘कबीर ग्रंथावली’ की भूमिका में श्याम सुन्दरदास के आधार पर कबीर की भाषा का निर्णय करना टेढ़ी खीर है क्योंकि वह खिचड़ी है।”

कबीर के विषय में विद्वानों के विशेष कथन:

  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार- “प्रतिभा उनमे बड़ी प्रखर थी।”
  • आचार्य हजारी प्रसाद द्वेदी के शब्दों में- “वे नृसिंह की साक्षात प्रतिमूर्ति थे।”
  • बीजक का संपादन ‘कबीर ग्रंथावली’ के नाम से श्यामसुंदर दास जी ने किया। यह  काशी नागरी प्रचारिणी सभा काशी से प्रकाशित हुआ। (यह सबसे प्रामाणिक मानी जाती है)

Tuesday, September 19, 2023

महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण


महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण


द्विवेदी जी ने 1903-1920 ई. तक ‘सरस्वती’ का संपादन किया। इसी के माध्यम से उनहोंने नवजागरण के संबंध में अपने विचारों को आगे बढ़ाया।

      ‘सरस्वती’ हिंदी नवजागरण की एक सशक्त पत्रिका के रूप में स्थापित हुई। महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने सरस्वती पत्रिका के माध्यम से भारतीयों में राजनीतिक चेतना जाग्रत करने का अथक प्रयास किया। अनेक कवियों, लेखकों, साहित्यकारों को देश प्रेम पर कविताएँ, लेख, आलेख आदि लिखने के लिए आमंत्रित किया। ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक के रूप में द्विवेदी जी ने कवियों, लेखकों में राजनीतिक चेतना की अलख जगायी जिसने समस्त जनमानस में क्रांति का परिवेश तैयार किया। वे पहले राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने ब्रिटिश शासन का खुलकर विरोध किया। इसका प्रमाण उनकी पुस्तक ‘संपत्तिशास्त्र’ में मिलता है। इस पुस्तक के द्वारा उन्होंने अंग्रेजों की अर्थनीति के पीछे उनके झूठ को उजागर किया। यह सितंबर 1917 ई. की ‘सरस्वती’ में ‘भारतवर्ष का कर्ज’ लेख में उन्होंने लिखा है।      

      हिंदी भाषा के व्याकरण को स्थिर रूप देकर द्विवेदी जी ने नवजागरण के भाषिक पक्ष को निखारा। सरस्वती पत्रिका में उन्होंने अपनी कविता ‘हे कविते’ में खड़ीबोली का तत्सम शब्द रूप पाठकों के समक्ष रखा –

      “सुरभ्य रूप! रस राशि रंजिते विचित्र वर्णाभरणे! कहाँ गई?

      आलौकिकानंद विधायानी महा कवींद्र कांते! कविते! अहो कहाँ?”

      शुक्ल जी ने लिखा है- “व्याकरण की शुद्धता और भाषा की सफाई के प्रवर्तक द्विवेदी जी ही थे। गद्य की भाषा पर द्विवेदी जी के इस शुभ प्रभाव का स्मरण जब तक भाषा के लिये शुद्धता आवश्यक समझी जाएगी तब-तक बना रहेगा।”

      * द्विवेदी राष्ट्र व राष्ट्रभाषा के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने समाज के दृष्टिकोण में भी सुधार लाने का प्रयास किया।

      * जनसाधारण के दृष्टिकोण से रीतिवादी मानसिकता निकालने और आधुनिक दृष्टिकोण स्थापित करने के लिए उन्होंने लोकवादी रचनाकारों जैसे- भारतेंदु, तुलसी, बिहारी व देव जैसे कलावादी कवियों को श्रेष्ठ माना। वे साहित्य को प्रगतिशील मार्ग पर ले गए।

Saturday, July 29, 2023

भारतेंदु और हिंदी नवजागरण

भारतेंदु और हिंदी नवजागरण

नवजागरण का शाब्दिक अर्थ है- “नये रूप से जागना”

      हिंदी साहित्य में आधुनिक युग का आरंभ भारतेंदु से माना जाता है। उन्होंने समाज में चल रही नवजागरण की प्रक्रिया का न केवल वैचारिक धरातल पर संज्ञान लिया, बल्कि उन मूल्यों को साहित्य से जोड़कर उसे आधुनिक भाव-बोध से समृद्ध भी किया।

      * भारतेंदुयुगीन हिंदी नवजागरण 1857 ई. के आन्दोलन स्वरुप उत्पन्न हुआ। इसमें एक ओर अनेक धार्मिक एवं सामाजिक आन्दोलन का प्रभाव था तो दूसरी ओर पूँजिपति एवं सामंतवाद की टकराहट। इन दोनों के संघर्षपूर्ण द्वंद्व के टकराहट से ही हिंदी नवजागरण एवं भारतेंदु-युगीन साहित्य दोनों का विकास हुआ।

      * भारतेंदु युग मुख्यतः दो संस्कृतियों के टकराहट का काल है। जिसमे “एक ओर मध्ययुगीन दरबारी संस्कृति है तो दूसरी ओर आम जनता में सामाजिक और राजनीतिक आन्दोलन के लिए वातावरण भी तैयार करना था। साहित्य में, देश के बढ़ते हुए असंतोष को सिर्फ पैदा करना भर नहीं था बल्कि सदियों से चली आ रही सामंती विचारों से भी मोर्चा लेना था।” 

      भारतेंदु देश की राजनीतिक स्थितियों का बराबर खबर लेते रहे। नवजागरण के केंद्र में ‘मनुष्य’ की स्थापना है। भारतेंदु ने इसे समझा तथा देश की तत्कालीन परिस्थितियों को परखकर उसकी दुर्दशा के विषय में लिखा-

      “रोवहु सब मिलिकै आवहु भारत हा हा! भारत दुर्दशा न देखी जाई।”

      भारतेंदु केवल दुर्दशा देखकर चिंतित नहीं थे। उन्हें कारणों की भी समझ थी। इसी कारण वे अंग्रेजी शासन की आलोचना करते हुए कहते हैं –

    “अंग्रेज राज सुख-साज सब भारी। पै धन विदेश चलि जात, यहै बडि ख्वारी।।

      भारतेंदु राष्ट्रवाद के केंद्र में, आरंभ में अंग्रेजी शासन की आर्थिक आलोचना की यह राष्ट्रवाद नवजागरण की ही उपज थी। भारतेंदु सारा दोष दूसरों पर नहीं डालते हैं, बल्कि वे अपने ही लोगों को दुर्गुणों के कारण फटकारते थे।

      1884 ई. में उन्होनें देश के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण भाषण दिया, जो “बलिया व्याख्यान” के नाम से प्रसिद्ध है। नवजागरण के केंद्र में धार्मिक-सामाजिक सुधार आन्दोलन रहे। इनका मुख्य सार आडंबरों, कर्मकांडों का विरोध तथा स्त्री व शुद्र समाज की दुर्दशा में परिवर्तन का रहा। बलिया के व्याख्यान में उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन किया, बाल-विवाह का विरोध तथा लड़कियों की शिक्षा का समर्थन किया।

      1870 ई. में अपने युवावस्था में ही उन्होनें “लेवी प्राण लेवी” लेख में अंग्रेजों के विरूद्ध बात कही। एक युवा का ऐसा साहस देख सभी के भीतर देश प्रेम की भावना उमड़ उठी। नवजागरण की इस भावना से प्रेरित “बालकृष्ण भट्ट” ने साहित्य को जनता से जोड़ते हुए कहा–– “साहित्य जन समूह के हृदय का विकास है।”

      नवजागरण की चेतना स्वतंत्रता प्रधान थी। इसलिए वे हर प्रकार के साम्राज्यवाद का विरोध करते रहे। चाहे अंग्रेजों का हो या मुसलमानों का लेकिन वह केवल साम्राज्यवाद का विरोध है धर्मों का नहीं। वे मुसलमानों की समानता की प्रशंसा करते हैं। तमाम प्रगतिशील बातें उन्होंने अंग्रेजों से सीखीं।

      नवजागरण की पृष्ठभूमि में दो संस्कृतियों का संक्रमण है। ‘भारतीय’ संस्कृति और ‘यूरोपीय’ संस्कृति। इन दोनों संस्कृतियों के संक्रमण में यूरोप ने स्वयं को बेहतर बताकर भारतियों को असभ्य बताया। भारतेंदु ने अपने समय को समझा तथा भारतीयों को हीन भावना से बचाने का प्रयास किया। अपनी भाषा को लेकर प्रेम का भाव इसी की देन है। साथ ही गद्य की प्रधानता व उसके लिए खड़ीबोली का प्रयोग जनता को जागरूक करने के लिए भी हुआ।

भारतेंदु ने कई पत्रिकाओं का संपादन किया। उनके द्वारा सम्पादित विभिन्न पत्रिकाओं का हिन्दी नवजागरण के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा। उनके द्वारा सम्पादित “कवि वचन सुधा (1868 ई.), हरिश्चंद्र मैगजिन (1873 ई.) बाला बोधिनी (1874 ई.) में देश की उन्नति और देश के विकास को रोकने वाली कुप्रथाओं की विवेचना की गई है। ‘बाला बोधिनी’ पत्रिका तो मूल रूप से स्त्रियों के लिए निकाली गई थी। समसामयिक समस्याओं पर नाटक-निबंध आदि लिखे। यहाँ तक कि भक्ति-विषयक रचनाओं में भी देश-भक्ति संबंधी आधुनिकता का पुट है। इस प्रकार भारतेंदु हर विधागत माध्यम से नवजागरण की चेतना को संपन्न कर रहे थे।

      भारतेंदु के साहित्य में नवजागरण की चेतना पूर्ण रूप से मिलती है इसमें उनका अंतर्विरोध भी शामिल है (जैसे- राजभक्ति, देशभक्ति आदि)

      1884 ई. में भारतेंदु जब महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं की सूची ‘काल चक्र’ नाम से निर्मित कर रहे थे, उसी वक्त उन्होंने ‘हिन्दी नये चाल में ढली’ (1873 ई.) का भी उल्लेख किया। प्रश्न यह है कि दुनिया की प्रसिद्ध घटनाओं में हिन्दी का नये चाल में ढलना भी क्या एक प्रसिद्ध घटना है? अगर है तो 1873 ई. को ही इसके घटित होने का समय क्यों चुना गया?

      इसका उत्तर आचार्य शुक्ल ने दिया–– “सन् 1873 ई. में उन्होंने ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ नाम की एक मासिक पत्रिका निकाली जिसका नाम ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका’ हो गया। हिन्दी गद्य का ठीक परिष्कृत रूप पहले-पहल इसी ‘चन्द्रिका’ में प्रकट हुआ। भारतेंदु ने नई सुधरी हुई हिन्दी का उदय इसी समय से माना है।

      उन्होंने ‘कालचक्र’ नाम की अपनी पुस्तक में लिखा है कि, “हिन्दी नये चाल में ढली, सन् 1873 ई॰।”

      भारतेंदु लोकभाषा के समर्थक थे। वे टकसाली भाषा के विरूद्ध थे। टकसाली अर्थात गढ़ी हुई भाषा। भारतेंदु भाषा का सहज, सरल, प्रवाहमय और विनोदपूर्ण रूप स्वीकार करते थे। भारतेंदु ‘निज भाषा की उन्नति’ के पक्षधर थे। वे कहते थे :

निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल

 बिनु निज भाषा ज्ञान के मिटत ना हिय को सूल

Thursday, July 20, 2023

अनुवाद

1- साल 2017 में फ़िल्म 'कैदी बैंड' से बॉलीवुड में डेब्यू करने वाले रणवीर कपूर और करीना कपूर खान की बुआ के बेटे आदर जैन लगभग 4 साल बाद एक बार फिर 'हेलो चार्ली' के जरिए फिल्मों में वापसी करने जा रहे हैं।
2 फ़िल्म की कहानी चिराग रस्तोगी उर्फ चार्ली (आदर जैन) के बारे में है,जो इंदौर से मुम्बई यूं ही बिना किसी प्लान के सफल होने के लिए आ गया है।
3 अपने मरहूम पिता का कर्ज उतारना है।
4 जल्दी से पैसा कमाने के लिए चार्ली एक काम अपने हाथ में लेता है,जिसमें उसे एक गोरिल्ला को मुम्बई से दीव तक पहुँचाना है।

Wednesday, July 19, 2023

अनुवाद

Exercise 1 B

1 साजिदा का घर बहुत बड़ा है।
2 अर्पिता अगले वर्ष स्नातक होगी।
3 काव्या अत्यंत बुद्धिमान छात्रा है।
4 मिसेज दिव्या द्वितीय वर्ष में मेरी अध्यापिका थी।
5 क्या यह मकान सौ साल पुराना है?
6 40 छात्र उपस्थित नहीं थे।
7 क्या परीक्षा का हॉल बहुत भव्य था?
8 ये विद्यार्थी हमारे प्रकाशस्तम्भ होंगे।
9 उसके पास पांच सौ रुपए हैं।
10 गुरप्रीत की दो बहनें है।

Exercise 1B

1 He made me work.
2 Get the computer purchased by your father.
3 Radha caused Sohan to get beaten.
4 Vibhuti has got his form filled.
5 I made Ramesh eat too much.


Tuesday, July 18, 2023

आधे-अधूरे




आधे-अधूरे नाटक का मुख्य बिंदु

  • ‘आधे-अधूरे’ नाटक 1969 में प्रकाशित हुआ था।  
  • आधे-अधूरे नाटक का पहली बार ‘ओमशिवपुरी’ के निर्देशन में दिशांतर द्वारा दिल्ली में फरवरी 1969 में मंचन हुआ था।
  • यह नाटक धर्मयुग साप्ताहिक पत्रिका 1969 के 3-4 अंको में प्रकाशित हुआ था।
  • यह मध्यवर्गीय पारिवारिक जीवन पर आधारित समस्या प्रधान नाटक है।
  • यह पूर्णता की तलाश का नाटक है। इस नाटक को ‘मील का पतथर’ भी कहा जाता है।
  • रंगमंच की दृष्टि से आधे-अधूरे नाटक को प्रयोगशील नाटक कहा जाता है।
  • इस नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक ही पुरुष चार-चार पुरुषों की भूमिका मात्र वस्त्र परिवर्तन के आधार पर करता है। पुरुष एक (महेन्द्रनाथ) पुरुष दो (सिंघानिया) पुरुष तीन (जगमोहन) पुरुष चार (जुनेजा) के रूप में चित्रित है।

आधे-अधूरे नाटक का उद्देश्य:

  • आधे-अधूरे नाटक के माध्यम से मोहन राकेश ने महानगरों में रहने वाले मध्यवर्गीय जीवन की विसंगतियों एवं विडंबनाओं का चित्रण किया है।
  • भूमंडलीकरण के इस दौर में मध्यवर्गीय परिवार के टूटते-बिखरते रिश्ते, उनका अधुरापन, कुंठा, घुटन इत्यादि को मोहन राकेश ने सावित्री और महेन्द्रनाथ के परिवार के माध्यम से सफलतापूर्वक अभिव्यक्ति किया है।
  • आधे-अधूरे नाटक में पारिवारिक विघटन, स्त्री-पुरुष संबंध, स्त्री जीवन की त्रासदी आदि का प्रभावपूर्ण चित्रण हुआ है।    

पात्र परिचय:

सावित्री: नाटक की नायिका, महेन्द्रनाथ की पत्नी उम्र 40 वर्ष

पुरुष- 1 महेन्द्रनाथ (सावित्री का पति उम्र 49 वर्ष)

पुरुष- 2 सिंघानिया (सावित्री का बौस, चीफ़ कमिश्नर)

पुरुष- 3 जगमोहन

पुरुष- 4 जुनेजा

बिन्नी: सावित्री की बड़ी बेटी उम्र 20 वर्ष  

अशोक: सावित्री और महेन्द्रनाथ का बेटा

किन्नी: सावित्री की छोटी बेटीउम्र 12,13 वर्ष

मनोज: बिन्नी का पति (मात्र संबादों में उल्लेखनीय)


नाटक का विषय:

  • मध्यवार्गीय जीवन की विडंबनाओं का चित्रण
  • पारिवारिक विघटन का चित्रण  
  • स्त्री-पुरुष सम्बन्ध का चित्रण   
  • नारी की त्रासदी का चित्रण
  • वैवाहिक संबंधों की विडंबना   

आधे-अधूरे: नाटक का कथानक

      मोहन राकेश का आधे-अधूरे नाटक एक मध्यवर्गीय, शहरी परिवार की कहानी है। इस परिवार का हर एक सदस्य अपने आप को अधूरा महसूस करता है। परिवार का हर व्यक्ति अपने को पूर्ण करने की चेष्टा करता है। परिवार में पति-पत्नी, एक बेटा और दो बेटियाँ हैं। पति महेन्द्रनाथ व्यापार में सफल नहीं होता हुआ।    

      महेन्द्रनाथ बहुत समय से व्यापार में असफल होकर घर पर बेकार बैठ जाते हैं। उसकी पत्नी सावित्री नौकरी करके घर चलाती है। महेंद्रनाथ अपनी पत्नी सावित्री से बहुत प्रेम करते हैं, किन्तु बेरोजगार होने के कारण वह पत्नी सावित्री के कमाई पर पलता हुआ अत्यंत दुखी है। उसकी स्थिति अपने ही परिवार में ‘एक ठप्पा एक रबर की टुकड़े’ की तरह है। सावित्री अपनी अन्नत और बहुमुखी अपेक्षाओं के कारण महेन्द्रनाथ से वितृष्णा करती है। जगमोहन, जुनेजा और सिंघानिया के संपर्क में आती है, किन्तु किसी में भी उसे अपनी भावनाओं की तृप्ति नहीं मिलती है। महेंद्रनाथ और सावित्री की बड़ी बेटी बिन्नी मनोज के साथ भाग जाती है। सावित्री का बेटा अशोक को भी घर के किसी सदस्य से लगाव नहीं होता है। वह भी पिता की तरह ही बेकार है। उसका नौकरी में मन नहीं लगता है। वह भी बदमिजाज और बदजुबान है। उसकी दिलचस्पी केवल अभिनेत्रियों की तस्वीरों और अश्लील पुस्तकों के सहारे बीतता है। छोटी बेटी भी इस वातावरण में बिगड़कर जिद्दी, मुँहफट तथा चिड़चिड़ी हो गई है और उम्र से पहले ही यौन संबंधों में रूचि लेने लगी है। परिवार में तनाव और माता-पिता के संबंधों के कारण उन सब में भी इस तरह की भावना घर कर गई है। इन सभी पात्रों के व्यवहारों में महेन्द्रनाथ और सावित्री के संबंधों का प्रभाव दिखाई पड़ता है। इस तरह इस नाटक में सभी पात्र आधे-अधूरे होने की नियति से अभिशप्त है।

निष्कर्ष- मोहनराकेश एक ऐसे नाटककार थे जिन्होंने जीवन के यथार्थ को अपनी लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है। आधे-अधूरे नाटक उसी प्रयास की एक सार्थक कड़ी है। महानगरों में रहने वाले, आर्थिक अभाव के साथ कई तरह के संघर्षों को झेलने वाले मध्यवार्गीय परिवार के जीवन की त्रासदी का इस नाटक में सजीव चित्रण है। अतः इससे स्पष्ट होता है कि यह नाटक संवेदना और शिल्प दोनों धरातलों पर आधुनिक हिन्दी नाट्य की एक सफल रचना है।

Monday, July 10, 2023

हिंदी में इतिहास लेखन की परंपरा

इतिहास लेखन में प्रथम स्थान ‘गार्दा ता तासी’ का है।

  • हिन्दी में इतिहास लेखन की पंरम्परा की शुरुआत: गार्सा द तासी (फ्रेंच विद्वान) से शुरू हुई। रचना- ‘इस्त्वार द ला लितरेत्युर ऐंदुई ऐंदुस्तानी’ इस रचना का प्रकाशन दो भागों में किया गया। ये रचना दो संस्करण में प्रकाशित हुआ था।
  • पहले संस्करण के दो भाग हैं। इसमें पहला का प्रकाशन 1839 ई० में और दूसरा भाग का प्रकाशन 1847 ई० में हुआ था।
  • दूसरे संस्करण में तीन भाग हैं। पहला दो भाग का प्रकाशन 1870 ई० में और तीसरा भाग का प्रकाशन 1971 ई० में हुआ।
  • इसका प्रकाशक- ‘द ऑरियटल ट्रांसलेशन कमेटी आयरलैंड’ संस्था ने इसका प्रकाशन किया।
  • विशेष तथ्य: यह ‘फ्रेंच’ भाषा में रचित है।
  • इसमें कूल 738 रचनाकारों को स्थान दिया गया है।
  • इसमें हिन्दी के रचनाकारों की संख्या सिर्फ 72 है।
  • इस रचना के कूल 24 अध्याय है। यह वर्णानुक्रम पद्धति में रचित है।
  • इसमें काल विभाजन का कोई प्रयास नहीं किया गया है।
  • इसमें प्रथम कवि के बारे में कोई विचार नहीं किया गया है। (इस ग्रंथ में प्रथम कवि अंगद और अंतिम कवि हेमंत है)
  • मौलवी करीमुद्दीन ने प्रथम दो भागों का क्रमशः ‘तबकाश्शुरा’ और ‘तजकिरा-ई-शुअरा-ई-हिन्दी’ हिन्दी से 1848 ई० में ‘फ़ारसी’ में अनुवाद किया। 
  • ‘तबकाश्शुरा’ और ‘तजकिरा-ई-शुअरा-ई-हिन्दी’ मौलवी करीमुद्दीन के द्वारा अनुदित ग्रंथ में रचनाकारों की संख्या 1004 थी। इसमें हिन्दी के रचनाकारों की संख्या 60 सीमित थी।
  • 1953 ई० में डॉ लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय ने ‘गार्दा द तासी’ के इतिहास ग्रंथ का ‘हिंदुई साहित्य का इतिहास’ नाम से हिन्दी में अनुवाद किया। इसमें कूल रचनाकारों की संख्या 358 थी। जिसमे हिन्दी के 220 रचनाकार थे।

हिन्दी के इतिहास लेखन में दूसरा स्थान ठाकुर शिवसिंह सेंगर का है।

  • रचना- ‘शिवसिंह सरोज’
  • प्रकाशन वर्ष- 1883 ई० में हुआ था। (इसका संशोधित परिवर्धित 1888 ई० में हुआ।
  • प्रकाशन संस्था- ‘नवल किशोर प्रेस लखनऊ’ से हुआ।
  • हिन्दी में रचित हिन्दी साहित्य का यह पहला इतिहास ग्रंथ है।
  • इसमें कूल रचनाकार 1003 हैं। हिन्दी के कूल रचनाकार 769 हैं।
  • काल विभाजन का कोई प्रयास नहीं किया गया है।
  • इस ग्रंथ में पुष्य/पुंड को पहला कवि माना है।
  • यह ग्रंथ वर्णानुक्रम पद्धति में रचित है।

हिन्दी के इतिहास लेखन में तीसरा स्थान जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन का आता है।

  • रचना- ‘द मार्डन वर्नाकुलर लिट्रेचर ऑफ हिन्दुस्तान’
  • यह इतिहास ग्रंथ ‘द रॉयल ऐसियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की पत्रिका के विशेषांक के रूप में 1888 ई० में तथा एक पुस्तक के रूप में 1889 ई० में प्रकाशित हुआ।
  • इसकी पद्धति कालानुक्रम थी। कालानुक्रम पद्धति में रचित यह हिन्दी साहित्य का प्रथम इतिहास था।
  • यह ‘अंग्रेजी’ भाषा में लिखी गई थी। इसमें कूल रचनाकार 952 थे। इसमें सभी रचनाकार हिन्दी के थे।
  • इन्होने ही ‘भक्तिकाल’ को हिन्दी साहित्य का ‘स्वर्ण युग’ कहा। भक्तिकाल को हिन्दी का साहित्य का स्वर्ण कहना सबसे बड़ी उपलब्धि है।
  • यह पहला इतिहास ग्रंथ था, जिसमे केवल हिन्दी के रचनाकारों को स्थान दिया गया था।
  • यह पहला इतिहास ग्रंथ था, जिसमे काल विभाजन का प्रयास किया गया था।

हिन्दी के इतिहास लेखन में चौथा स्थान ‘मिश्रबंधु’ का आता है।

  • ‘मिश्रबंधु’ ये तीनों सगे भाई और तीनों साहित्यकार थे। गणेश बिहारी मिश्र, श्याम बिहारी मिश्र और शुकदेव बिहारी मिश्र।
  • ये तीनों ‘मिश्रबंधु’ के नाम से रचना करते थे। इन तीनों भाइयों ने नागरी प्रचारणी सभा काशी के द्वारा हस्तलिखित ग्रंथों की खोज कर इक्कठा किया।
  • मिश्र बंधुओं ने ‘मिश्रबंधु विनोद’ नाम से हिन्दी साहित्य के एक वृहद् इतिहास की रचना किया।
  • ‘मिश्रबंधु विनोद’ के चार भाग हैं।
  • प्रथम तीन भाग का प्रकाशन 1913 ई० में हुआ था। चतुर्थ भाग का प्रकाशन 1934 ई० में हुआ। प्रकाशन संस्था नागरी प्रचारिणी सभा-काशी थी।
  • यह रचना कालानुक्रम पद्धति में रचित है। इसमें कूल रचनाकार 4591 वास्तविक संख्या है लगभग (5000)।
  • मिश्रबंधुओं ने हिन्दी साहित्य के विकाशक्रम को मुख्यतः 5 युगों में तथा उपविभाजन सहित 8 युगों में बाँटा है।
  • इन्होने आदिकाल को ‘आरंभिक काल’ के नाम से संबोधित किया है।
  • पुष्य/पुंड्र को इन्होने पहला कवि माना है।
  • रचनाकारों को इन्होने मुख्यतः तीन श्रेणियों में बाँटा है- उत्तम श्रेणी, माध्यम श्रेणी और सामान्य श्रेणी।
  • रचनाकारों को श्रेणीबद्ध करने वाले मिश्रबंधु प्रथम इतिहासकार माने जाते हैं। इन्होने कवियों का तुलनात्मक पद्धति से वर्गीकरण किया है।
  • यह इतिहास ग्रंथ नागरी प्रचारिणी सभा काशी की हस्तलिखित ग्रंथ खोज रिपोर्ट समिति के आधार पर लिखा गया था।
  • यह (मिश्रबंधु विनोद) इतिहास ग्रंथ आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतिहास ग्रंथ का उपजीव्य अथार्त आधार ग्रंथ माना जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने इतिहास ग्रंथ के लिए सामग्री ‘मिश्रबंधु विनोद’ से ग्रहण किया था।

हिन्दी के इतिहास लेखन में पाँचवा स्थान आचार्य रामचंद्र शुक्ल: का आता है।

  • रचना का नाम- ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’
  • प्रकाशन वर्ष- 1929 ई०,
  • प्रकाशन संस्था- नागरी प्रचारिणी सभा काशी से हुआ था।
  • पद्धति- विधेयात्मक थी। इसमें कूल रचनाकार 997 (लगभग 1000) हैं।
  • 1908 ई० में सरयूकरण पारीक, हरदेव बाहरी और आचार्य रामचंद्र शुल्क इन तीनों को नागरी प्रचारिणी सभा काशी ने आमंत्रित किया था। हिन्दी शब्दकोष लिखने के लिए दिया गया। वह ‘शब्दकोष सागर’ 1928 ई० में तैयार कर दिया गया। भूमिका लिखने का कार्य आचार्य रामचंद्र शुक्ल को दिया गया। शुक्ल ने इसकी भूमिका ‘हिन्दी साहित्य का विकाश’ नाम से लिखा जो बहुत विशाल हो गया। उसी भूमिका को उन्होंने बाद में हिन्दी साहित्य के इतिहास के नाम से छपवा दिया।
  • संशोधित और परिवर्तित संस्करण 1940 ई० हिन्दी साहित्य के विकासक्रम को चार युगों में बाँटा और हिन्दी साहित्य का आरम्भ सिद्ध साहित्य से माना है।

हिन्दी के इतिहास लेखन में छठा स्थान डॉ रामकुमार वर्मा का आता है।

  • रचना- ‘हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास’
  • प्रकाशन वर्ष- 1938 ई०
  • इसमें 693 ई० से 1693 ई० तक का ही वर्णन है।
  • इन्होने अपने इतिहास में आदिकाल से लेकर भक्तिकाल तक का ही वर्णन किया है।
  • यह इतिहास आलोचनात्मक पद्धति में लिखा गया था।
  • यह इतिहास शोध प्रबंध के रूप में लिखा गया था।

हिन्दी के इतिहास लेखन में सातवाँ स्थान आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का आता है।

  • इन्होने (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी)हिन्दी साहित्य की तीन पुस्तकें लिखी।
  • इन्हें आधुनिक युग का बाणभट्ट के नाम से भी जाना जाता है।   
  • हिन्दी साहित्य की भूमिका- 1940 ई०
  • हिदी साहित्य उद्भव एवं विकास- 1952 ई०
  • हिन्दी साहित्य का आदिकाल- 1952 / 1953 ई० (यह सबसे महत्वपूर्ण रचना है)
  • ये तीनों रचनाएँ समाजशास्त्रीय पद्धति में हैं।
  • इन तीनों रचनाओं में 1229 रचनाकारों का परिचय है।
  • इसमें तुलनात्मक पद्धति अपनाई गई है।

हिन्दी के इतिहास लेखन में आठवाँ स्थान डॉ गंपतिचंद्र चन्द्रगुप्त का आता है।

  • रचना- ‘हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास’ है।
  • इस रचना के दो भाग हैं।
  • प्रथम भाग का प्रकाशन- 1964 ई० में हुआ
  • दूसरा भाग का प्रकाशन- 1965 ई० में हुआ
  • यह वैज्ञानिक पद्धति में लिखा गया है।

हिन्दी के इतिहास लेखन में नौवां स्थान डॉ नगेन्द्र का आता है।

  • रचना- ‘हिन्दी साहित्य का वृहद् इतिहास’।
  • इसमें दस खण्ड हैं।
  • प्रकाशन वर्ष- 1973 ई० है।  

हिन्दी के इतिहास लेखन में दसवाँ स्थान नागरि प्रचारिणी सभा काशी का आता है।

  • नागरि प्रचारिणी सभा, काशी ने हिन्दी साहित्य के संपूर्ण इतिहास को 18 खण्डों में प्रकाशित करने की योजना बनाई थी किन्तु संपूर्ण इतिहास 16 खंडो में ही पूर्ण हो गया।
  • प्रथम खंड- ‘हिन्दी साहित्य की पीठिका’ थी। इसके संपादक राजबली पांडे थे।
  • सोलहवाँ खंड- ‘हिन्दी का लोक साहित्य’ थी। इसके संपादक राहुल सांस्कृत्यायन थे।

हिन्दी साहित्य के इतिहास से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण रचनाएँ:

  • ‘भाषा काव्य संग्रह’ (1873 ई०) महेशदत्त शुक्ल
  • ‘हिन्दी कोविंद रत्नमाला’ डॉ श्यामसुंदर दास है। इनके रचना के दो भाग है।
  • प्रथम भाग (1909 ई०) में और दूसरा भाग (1914 ई०) में प्रकाशित हुआ था।
  • ‘कविता कौमुदी’ (1917 ई०) रामनरेश त्रिपाठी
  • ‘हिन्दी के मुसलमान कवि’ (1926 ई०) गंगा प्रसाद अखोरी
  • ‘ब्रज माधुरी सार’ (1923 ई०) वियोगी हरि
  • ‘मॉडन हिन्दी लिटरेचर’ (1939 ई०) डॉ इन्द्रनाथ मदान
  • ‘खड़ी बोली हिन्दी साहित्य का इतिहास’ (1914 ई०) ब्रजरत्न दास
  • ‘हिन्दी साहित्य: बीसवी शताब्दी’ (1950 ई०) आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी
  • ‘हिन्दी का गद्य साहित्य’ (1955 ई०) रामचंद्र तिवारी
  • ‘हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’ (1996 ई०) डॉ बच्चन सिंह
  • ‘हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास’ (1986 ई०) डॉ रामस्वरुप चतुर्वेदी
  • ‘हिन्दी साहित्य: युग एवं प्रवृतियाँ’- शिवकुमार शर्मा
  • ‘हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास’- सुमन राजे
  • ‘राजस्थानी साहित्य की रुपरेखा’ (1939 ई०) डॉ मोतीलाल मेनारिया
  • ‘आधुनिक हिन्दी साहित्य’ (1925 ई०) डॉ कृष्णलाल
  • ‘सुकवि सरोज’ (1927 ई०) गौरीशंकर दिवेदी
  • ‘हिन्दी भाषा और उसके साहित्य का विकास’ (1930 ई०) अयोध्या सिंह ‘हरिऔंध’