Thursday, July 9, 2026

शिक्षा का स्वप्न और भारत का भविष्य: फुले, गांधी, टैगोर और अंबेडकर के आलोक में.....

शिक्षा का स्वप्न और भारत का भविष्य: फुले, गांधी, टैगोर और अंबेडकर के आलोक में

— प्रभात मिश्र

किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति उसके प्राकृतिक संसाधन नहीं, उसके शिक्षित और संवेदनशील नागरिक होते हैं। सभ्यताएँ युद्धों से नहीं, शिक्षा से आगे बढ़ती हैं। भारत का आधुनिक इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि जिन महापुरुषों ने समाज को नई दिशा दी, उन्होंने शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं माना, बल्कि मनुष्य की चेतना, स्वतंत्रता और सामाजिक परिवर्तन का आधार समझा। महात्मा ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर और डॉ. भीमराव अंबेडकर—इन सभी की शिक्षा-दृष्टि अलग-अलग थी, किंतु उनका लक्ष्य एक था—ऐसा भारत जहाँ शिक्षा हर व्यक्ति तक पहुँचे और मनुष्य को अधिक मानवीय बनाए।

उन्नीसवीं शताब्दी का भारत गहरे सामाजिक विभाजनों से जूझ रहा था। शिक्षा कुछ वर्गों तक सीमित थी और स्त्रियाँ तथा वंचित समुदाय उससे लगभग बाहर थे। ऐसे समय में महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा को सामाजिक क्रांति का माध्यम बनाया। सावित्रीबाई फुले ने जब लड़कियों के लिए विद्यालय खोला, तब उन्होंने केवल एक विद्यालय की स्थापना नहीं की, बल्कि भारतीय समाज की जड़ सोच को चुनौती दी। उन्होंने सिद्ध किया कि शिक्षा जन्म से नहीं, अधिकार से मिलनी चाहिए।

महात्मा गांधी की शिक्षा-दृष्टि का केंद्र था—जीवन। वे चाहते थे कि विद्यालय केवल परीक्षा पास करने वाले विद्यार्थी न बनाएँ, बल्कि श्रम, आत्मनिर्भरता, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व से युक्त नागरिक तैयार करें। उनकी 'नई तालीम' में हाथ, हृदय और मस्तिष्क—तीनों के संतुलित विकास पर बल था। गांधी मानते थे कि शिक्षा तभी सार्थक है जब वह व्यक्ति को समाज से जोड़े और उसे श्रम का सम्मान करना सिखाए।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शिक्षा को प्रकृति, कला और स्वतंत्र चिंतन से जोड़ा। उनके लिए विद्यालय चारदीवारी में कैद संस्था नहीं, बल्कि ऐसा जीवंत वातावरण था जहाँ बच्चा प्रश्न पूछ सके, कल्पना कर सके और जीवन को अनुभव कर सके। वे रटने वाली शिक्षा के विरोधी थे। उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के भीतर छिपी सृजनात्मकता को मुक्त करना है।

इन सभी विचारों के बीच डॉ. भीमराव अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि विशेष महत्व रखती है। उनके लिए शिक्षा सामाजिक न्याय का सबसे शक्तिशाली साधन थी। उन्होंने स्वयं भेदभाव और वंचना का जीवन देखा था। इसलिए वे जानते थे कि शिक्षा केवल रोजगार नहीं देती, वह मनुष्य को आत्मसम्मान देती है। उनका आह्वान—"शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो"—आज भी भारत के लोकतांत्रिक जीवन का प्रेरक मंत्र है।

अंबेडकर का विश्वास था कि कोई भी समाज तब तक समान नहीं हो सकता जब तक शिक्षा पर सबका समान अधिकार न हो। वे शिक्षा को संविधान में निहित समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की भावना का आधार मानते थे। यदि किसी बच्चे की शिक्षा उसकी जाति, गरीबी या सामाजिक स्थिति से प्रभावित होती है, तो लोकतंत्र अधूरा रह जाता है।

आज भारत नई शिक्षा नीति के माध्यम से समग्र, बहुभाषी, कौशल-आधारित और लचीली शिक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। यह स्वागतयोग्य है, किंतु यह भी आवश्यक है कि नीति का लाभ समाज के अंतिम बच्चे तक पहुँचे। तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल शिक्षा तभी सार्थक होंगी जब गाँव के सरकारी विद्यालय का बच्चा भी उसी आत्मविश्वास से उनका उपयोग कर सके, जिस आत्मविश्वास से महानगर का विद्यार्थी करता है।

हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती केवल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं, बल्कि मूल्यपरक शिक्षा है। सूचना का विस्फोट हो चुका है, लेकिन संवेदनशीलता का विस्तार नहीं हो पाया है। पढ़े-लिखे लोग भी हिंसा, घृणा, भ्रष्टाचार और असहिष्णुता के शिकार हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि शिक्षा ने ज्ञान तो दिया, किंतु विवेक नहीं। यही वह बिंदु है जहाँ गांधी की नैतिकता, टैगोर की सृजनात्मकता, फुले की समानता और अंबेडकर का सामाजिक न्याय एक-दूसरे से मिलते हैं।

सरकारी विद्यालय इस राष्ट्रीय स्वप्न के सबसे बड़े वाहक हैं। यहाँ भारत का वह बच्चा पढ़ता है जिसके पास संसाधन कम हैं, लेकिन सपने बड़े हैं। यदि इन विद्यालयों को सक्षम शिक्षक, आधुनिक संसाधन, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएँ और समाज का सहयोग मिले, तो यही बच्चे भारत की सबसे बड़ी शक्ति बनेंगे। शिक्षा का लोकतंत्रीकरण सरकारी विद्यालयों को सशक्त किए बिना संभव नहीं है।

आज आवश्यकता किसी एक महापुरुष की शिक्षा-दृष्टि को चुनने की नहीं, बल्कि इन सभी दृष्टियों के श्रेष्ठ तत्वों को अपनाने की है। फुले से समान अवसर, सावित्रीबाई से साहस, गांधी से नैतिकता, टैगोर से सृजनशीलता और अंबेडकर से सामाजिक न्याय—यदि भारतीय शिक्षा इन पाँच धाराओं का संगम बन सके, तो वह केवल कुशल पेशेवर नहीं, बल्कि श्रेष्ठ नागरिक तैयार करेगी।

भारत के भविष्य का निर्माण संसद में जितना होता है, उससे कहीं अधिक विद्यालय की कक्षा में होता है। एक शिक्षक की आवाज़, एक पुस्तक का स्पर्श और एक बच्चे का जागा हुआ आत्मविश्वास इतिहास की दिशा बदल सकता है। इसलिए शिक्षा पर किया गया प्रत्येक निवेश वास्तव में भारत के भविष्य पर किया गया निवेश है।

शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल सफल जीवन नहीं, बल्कि सार्थक जीवन है। जिस दिन भारत का प्रत्येक बच्चा बिना किसी भेदभाव के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, समान अवसर और सम्मानपूर्ण वातावरण प्राप्त करेगा, उसी दिन हम उन महापुरुषों के स्वप्न के अधिक निकट होंगे जिन्होंने शिक्षा को मानव मुक्ति का सबसे बड़ा साधन माना था।

Tuesday, July 7, 2026

सरकारी विद्यालय: भारत की आशाओं का आँगन

सरकारी विद्यालय: भारत की आशाओं का आँगन

— प्रभात मिश्र

किसी सुबह यदि आप किसी सरकारी विद्यालय के प्रांगण में खड़े हों, तो आपको वहाँ केवल बच्चों की आवाज़ें नहीं सुनाई देंगी; वहाँ आपको भारत का भविष्य बोलता हुआ दिखाई देगा। कोई बच्चा फटी हुई कॉपी में अक्षर बना रहा होगा, कोई प्रार्थना में पूरे मन से स्वर मिला रहा होगा, कोई अपने मित्र के साथ टिफिन बाँट रहा होगा और कोई अपने शिक्षक से कोई नया प्रश्न पूछने का साहस जुटा रहा होगा। देखने में यह सब सामान्य लगता है, किंतु वास्तव में यही वे छोटे-छोटे दृश्य हैं जिनसे एक बड़े राष्ट्र का चरित्र निर्मित होता है।

आज सरकारी विद्यालयों की चर्चा प्रायः आँकड़ों, योजनाओं और कमियों के संदर्भ में होती है। कभी भवनों की कमी का उल्लेख होता है, कभी शिक्षकों की संख्या का, तो कभी परीक्षा परिणामों का। इन चर्चाओं का अपना महत्व है, लेकिन एक प्रश्न बार-बार मन में उठता है—क्या हमने कभी उन बच्चों की आँखों में झाँकने का प्रयास किया है, जिनके लिए विद्यालय केवल पढ़ने की जगह नहीं, बल्कि जीवन बदलने की संभावना है?

भारत का संविधान प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार देता है। यह अधिकार केवल विद्यालय तक पहुँचने का नहीं, बल्कि गरिमा के साथ सीखने, सोचने और अपने व्यक्तित्व को विकसित करने का अधिकार है। सरकारी विद्यालय इसी संवैधानिक संकल्प के सबसे बड़े वाहक हैं। वे समाज के उस वर्ग तक शिक्षा पहुँचाते हैं, जहाँ शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, बल्कि पीढ़ियों की नियति बदलने का माध्यम बन जाती है।

सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे साधारण परिवारों से आते हैं। उनके माता-पिता मजदूर, किसान, रिक्शा चालक, घरेलू कामगार, छोटे दुकानदार या असंगठित क्षेत्र के कर्मी होते हैं। उनके पास संपत्ति कम होती है, लेकिन अपने बच्चों के भविष्य के लिए विश्वास बहुत बड़ा होता है। वे जानते हैं कि यदि उनका बच्चा पढ़ जाएगा, तो उसका जीवन उनसे बेहतर होगा। यही विश्वास हर सुबह बच्चे को विद्यालय तक ले आता है।

लेकिन शिक्षा का अर्थ केवल पुस्तकें पढ़ लेना नहीं है। यदि शिक्षा मनुष्य को अधिक संवेदनशील, अधिक ईमानदार और अधिक उत्तरदायी नहीं बनाती, तो वह अधूरी रह जाती है। आज समाज में ज्ञान की कमी से अधिक मूल्यों का संकट दिखाई देता है। तकनीक ने सूचना को सहज बना दिया है, परंतु विवेक और करुणा आज भी शिक्षक और विद्यालय ही सिखा सकते हैं।

मुझे अनेक बार सरकारी विद्यालयों के बच्चों के बीच बैठने का अवसर मिला है। मैंने देखा है कि जिन बच्चों के पास संसाधन सबसे कम होते हैं, उनके भीतर सीखने की ललक अक्सर सबसे अधिक होती है। एक नई पुस्तक उनके लिए उत्सव होती है, शिक्षक की एक प्रशंसा उन्हें कई दिनों तक प्रेरित करती है और विद्यालय का छोटा-सा सम्मान उन्हें जीवनभर याद रहता है। इन बच्चों को देखकर विश्वास होता है कि अभाव प्रतिभा को रोक नहीं सकता; अवसरों का अभाव अवश्य उसे धीमा कर देता है।

सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए। संसाधनों की सीमाओं, प्रशासनिक दायित्वों और अनेक चुनौतियों के बीच भी हजारों शिक्षक निष्ठा के साथ अपना कार्य कर रहे हैं। वे केवल पाठ्यपुस्तक नहीं पढ़ाते, बल्कि बच्चों के भीतर आत्मविश्वास जगाते हैं। कई बार वे शिक्षक से अधिक अभिभावक, मार्गदर्शक और मित्र बन जाते हैं। समाज को ऐसे शिक्षकों की कहानियाँ भी उतनी ही प्रमुखता से सुनानी चाहिए जितनी कमियों की चर्चा करता है।

शिक्षा का प्रश्न केवल सरकार का प्रश्न नहीं है। समाज यदि विद्यालयों से दूर रहेगा, तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। प्रत्येक शिक्षित नागरिक, प्रत्येक साहित्यकार, प्रत्येक उद्योगपति, प्रत्येक पूर्व विद्यार्थी और प्रत्येक सामाजिक संस्था यदि वर्ष में कुछ समय भी किसी सरकारी विद्यालय के बच्चों के साथ बिताए, उन्हें पुस्तकें दे, उनसे संवाद करे, उनकी प्रतिभा को मंच दे, तो परिवर्तन की गति कई गुना बढ़ सकती है। राष्ट्र निर्माण साझी जिम्मेदारी से ही संभव है।

हिंदी के महान साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि साहित्य वही है जो मनुष्य को सुंदर बनाए। यही बात शिक्षा पर भी लागू होती है। शिक्षा वही है जो मनुष्य को अधिक मानवीय बनाए। यदि विद्यालय से निकलने वाला विद्यार्थी केवल सफल है, किंतु संवेदनशील नहीं, तो शिक्षा अपने उद्देश्य में सफल नहीं कही जा सकती।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सरकारी विद्यालयों को केवल सहायता का विषय न मानें, बल्कि सम्मान का विषय बनाएँ। हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारत की लोकतांत्रिक आत्मा इन विद्यालयों में सबसे अधिक दिखाई देती है। यहाँ जाति, धर्म, भाषा और आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर बच्चे एक साथ बैठते हैं। यही वह संस्कार है जो भविष्य के भारत को मजबूत बनाता है।

जब किसी सरकारी विद्यालय का बच्चा डॉक्टर बनता है, शिक्षक बनता है, वैज्ञानिक बनता है, सैनिक बनता है या साहित्यकार बनता है, तब उसकी सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होती; वह पूरे समाज की सफलता होती है। इसलिए सरकारी विद्यालयों में किया गया प्रत्येक निवेश वास्तव में भारत के भविष्य में किया गया निवेश है।

हमें बच्चों को यह विश्वास देना होगा कि उनकी पहचान उनके परिवार की आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उनके सपनों, परिश्रम और चरित्र से बनेगी। जिस दिन सरकारी विद्यालय का प्रत्येक बच्चा यह महसूस करेगा कि पूरा समाज उसके साथ खड़ा है, उसी दिन भारत की शिक्षा व्यवस्था एक नए युग में प्रवेश करेगी।

सरकारी विद्यालयों की घंटी केवल कक्षाएँ आरंभ होने की सूचना नहीं देती; वह हमें यह भी याद दिलाती है कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया हर दिन, हर कक्षा और हर बच्चे के साथ आगे बढ़ रही है। उन बच्चों की आँखों में जो प्रकाश है, वही भारत के भविष्य का वास्तविक उजाला है। उस उजाले को सुरक्षित रखना ही हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।

Wednesday, July 24, 2024

शिवरानी देवी : प्रेमचंद घर में

शिवरानी देवी : प्रेमचंद घर में

रचना – ‘प्रेमचंद घर में ‘1944 ई, (जीवनी विधा)

रचनाकार – शिवरानी देवी

      * शिवरानी देवी ने ‘प्रेमचंद घर में’ नाम से प्रेमचंद की जीवनी लिखी। उन्होंने उनके व्यक्तित्व के उस हिस्से को उजागर किया जिससे लोग अनभिज्ञ थे।

      * प्रेमचंद ने अपनी पत्नी को हमेशा प्रेरित किया कि वे लिखें और सामाजिक कार्यं में भी बढ़ा-चढ़कर हिस्सा लें। अपनी पत्नी के प्रति प्रेमचंद के मन में अगाध प्रेम और सम्मान था।

      * जीवन के अंतिम क्षणों में भी उन्होंने साहित्य रचना का साथ नहीं छोड़ा था। पत्नी के प्रति उनका लागाव और भी बढ़ गया था।

      * प्रेमचंद की जीवनी उनके बेटे (अमृतराय) ने ‘कलम का सिपाही’ नाम से’ और मदन गोपाल ने ‘कलम के मजदूर’ नाम से लिखी, जिसमे लेखक की अपनी कल्पनाएँ भी शामिल की होगी।

      * शिवरानी देवी द्वारा लिखी गई इस जीवनी का हर घटना खरा सोना की तरह है, क्योंकि शिवरानी देवी ने उनके साथ उन पलों को खुद जिया और महसूस किया है।

      * प्रेमचंद के व्यक्तित्व की साफगोई को जिस तरह से उनकी पत्नी ने बयान किया है वह हिंदी साहित्य प्रेमियों के लिए पठनीय है।

      * शिवरानी देवी ने अनके साथ बिताए सुनहरे पलों को बड़े ही सहजता के साथ लिखा है उसे शायद ही अन्य साहित्यकार लिख पाता। उनके लेखन में भावनाओं का कहीं अभाव नहीं है और ना ही उनके प्रवाह में कोई कमी नजर आती है।

      * शिवरानी देवी को इस बात का मलाल रहा कि वे अपने पति की महानता को मरणोपरांत समझ पाई।

      * प्रेमचंद के पिता का नाम अजायबराय और माता का नाम आनंदी देवी था।

      * प्रेमचंद को उनके पिता मुंशी धनपत राय तथा चाचा ने मुंशी नबावराय नाम दिया था।

      * इन्होंने मर्यादा, हंस तथा जागरण पत्रिकाओं का संपादन किया

      * इनका पहला उपन्यास ‘प्रेम’ को माना जाता है। किन्तु इस पुस्तक के अनुसार      

      * इनका पहला उपन्यास ‘कृष्णा’ है जो 1905 ई. में ‘प्रयाग’ से छपा था।

      * दूसरा उपन्यास ‘प्रेमा’ को माना जाता है।

      * प्रेमचंद के दो बेटे श्रीपतराय (धुन्न) तथा अमृतराय (बन्नू) थे।

      * प्रेमचंद 1935 ई. में प्रगतिशील लेखक संघ के सभापति बने। उनहोंने महात्मा गाँधी के विचारों से प्रभावित होकर सेवा को मूल धर्म बनाया।

      * शिवरानी देवी ने प्रेमचंद के संपूर्ण जीवन को इस पुस्तक में 88 भागों में दिखया है।

      * पुस्तक की श्रद्धांजलि बनारसीदास चतुर्वेदी तथा आमुख शिवरानी देवी ने लिखा है।

      * हिंदी साहित्य में प्रेमचंद की एक जीवनी ‘प्रेमचंद घर में’ (1944 ई.) है।

      * दूसरी जीवनी उनके पुत्र अमृतराय ने ‘कलम का सिपाही’ (1962 ई.) लिखा था।

      * तीसरी जीवनी ‘कलम का मजदूर’ (1954 ई.) में श्री मदन गोपाल (1919 -2009 ई.) ने लिखी है। मूल पुस्तक अंग्रेजी में लिखी गई थी बाद में श्री मदन गोपाल ने हिंदी में अनुबाद किया।

      * प्रेमचंद की मृत्यु के बाद शिवरानी देवी का वह विलाप ह्रदय को छू लेता है कि जब-तक जो चीज हमारे पास रहती है तबतक हमें उसकी कद्र नहीं होती लेकिन वो हमसे ओझल हो जाए तो हमारा मन पछताता रहता है फिर हमारे पास दुःखी होने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता है।

Saturday, June 8, 2024

समास

हवन-सामग्री, नीलोत्पल, शताब्दी, महोदधि, दुतरफा, आनन्दाश्रम, राजदरबार, त्रिभुवन, देशहितैषी, शोभा निकेतन, कुछ - कुछ, अनाथालय, वस्तुतत्व, झाड़-झंखार, धरतीधकेल, बुद्धिहीन, चहल-पहल, पाश् र्वभूमि, हिमालय, डांट-फटकार, चतुर्भुज

संधि

शिवालिक, अन्तर्भूत, परमावश्यक, अन्तर्निरुद्ध, सद्गुण, दुर्जन, उल्लास, दोशोद्धार, सज्जन, अनाथालय, द्वन्द्वातीत, आविर्भाव, कुबेरोचित, निस्संदेह, नीरस, परमेश्वर, महात्मा, विचारोत्तेजक, संतोष, नीलोत्पल, महोदधि, संशोधित, रत्नाकर, संतुष्ट, कुटोल्लास, यद्यपि 

रचना के आधार पर

1 लड़के से तुम कल युवा पुरुष हो जाओगे। (संयुक्त वाक्य)
2 एक आदमी जिसकी पीठ पर बड़ा सा गट्ठर बंधा था, कलकते जा रहा था। (सरल वाक्य)
3 कृष्णानगर में तो कोई खास तब्दील नहीं आई।(प्रश्नवाचक) 
4 मेरा लड़का चिरागदीन तुमलोगों का दर्जी था। (मिश्र वाक्य)
5 मैं उठा और दो - तीन तमाचे और जड़ दिया। (सरल वाक्य)
6 दोनों भाई - बहिन पिता केे दोनों हाथ पकड़कर बड़ी खुशी के साथ जा रहे थे। (संयुक्त वाक्य में).
 मैंने अपने मन को काफी नसीहत दी(मिश्र वाक्य में)
8 सुंदर देई उदास होकर बड़े भाई को देखने लगी। (संयुक्त वाक्य में)
9 वास्तविक प्रेम करने का आत्मबल उनमें बिल्कुल नहीं है। (मिश्र वाक्य में)
10 जो कुर्सी थी मैं उस पर पांव लटकाएं बैठा था। (सरल वाक्य में)
11 ईश्वरी हार कर भी मुस्कराता रहता था। (मिश्र वाक्य में)
12 यह वो मस्जिद है जो ज्यों की त्यों खड़ी है। ( सरल वाक्य)
13 वे एक्टर हैं, नट हैं।  (संयुक्त वाक्य में)
14 साहब की उम्र कोई 11 साल की थी पर बहिन की उमर कोई छह सात वर्ष की होगी। (संयुक्त वाक्य में)
15 आज  नटी इमली का भारत मिलाप है।(निषेध वाचक वाक्य में)
16 स्टेशन पर कई आदमी हमारा स्वागत करने के लिए खड़े थे। (मिश्र वाक्य में) 
17 पर्वत शोभा-निकेतन होते है।( मिश्र वाक्य में) 
18 तब एकाएक मुझे भान हुआ मानो मेरे मस्तिष्क की संदुक में सचमुच आलू और भंटे भरे हुए है। (सरल वाक्य) 
19 उस नुक्कड़ पर सुक्खी भटियारिन की भट्टी थी, जहां अब वह पानवाला बैठा है। (संयुक्त वाक्य में) 
20 इस रवैये का असर टैंकनीक पर पड़ता है। (मिश्र वाक्य में) 
21 उसका धर्म यहीं तक सीमित है। (प्रश्नवाचक वाक्य में)
22 जो लोग खुशी से न देंगे उसकी जमीन छीननी पड़ेगी। (सरल वाक्य में)
23 मुझपर व्रजपात हो गया था। (निषेधवाचक वाक्य में)
24 तुम्हारा मकान उन्हीं दिनों जल गया था। ( मिश्र वाक्य में)
25 साढ़े सात साल पहले तू इतना - सा था। (प्रश्नवाचक)
26 यदि तुम अभी से देशी चीजें काम में लाओगे, तो मैं स्वदेश की बनी हुई कोई उत्तम चीज तुम्हें इनाम दूंगा। (सरल वाक्य में)
27 उनके इस अभिमत में बहुत कुछ सार है। (मिश्र वाक्य में) 
28 बूढ़े मुसलमान ने बच्चे को देने के लिए चो पैसा निकाला था, वह उसे वापस जेब में रख लिया। (सरल वाक्य में) 
29 कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहाया दिखते हैं, उनकी जड़े काफी गहरी पैठी होती हैं। (सरल वाक्य में) 
30 क्या उसका धर्म यहीं तक सीमित है? (निषेधवाचक वाक्य में) 

Wednesday, June 5, 2024

SSC JHT

1) किस क्रमांक में ई स्वर का सही उच्चारण स्थान है?
क) कण्ठ (ख)तालु (ग)ओष्ठ (घ) मूर्धा
2) हिंदी शब्द कोश में ज्ञान शब्द कहाँ मिलेगा?
क) 'ख' वर्ण वाले शब्दों के बाद  
(ख) वर्ण वाले शब्दों के बाद 
(ग) 'छ' वर्ण वाले शब्दों के बाद 
(घ) प्र' वर्ण वाले शब्दों के बाद
3) बहिरंग' शब्द में कौन सी संधि है- 
(क) व्यंजन संधि  ख) विसर्ग संधि  ग) गुण संधि
घ) दीर्घ संधि
4) किस क्रम में उचित संधि-विच्छेद नहीं है?
क) सम् + विधान ख) धनम्न+ जय ग)सम् + निधि
घ) दिक् + नाथ
5) इनमें से किस शब्द में विसर्ग संधि नहीं है? 
क) नींव ख) निर्दय ग) निडर घ)नीरोग
6) तथापि में कौन सा संधि है?
क) दीर्घ ख) वृद्धि ग) विसर्ग घ) गुण
7)किस क्रम में देशज शब्द है?
क) तमना ख) भोंदू ग)अग्नि घ) अक्षी
8) कौन सा शब्द देशज नहीं है- 
क) ढिवरी ख)पगड़ी ग)दौर घ) पुष्कर
9) परीक्षा' शब्द निम्नलिखित वर्गों में से किस वर्ग में आता है- क) तत्सम ख) तद्‌भव ग) देशज घ) विदेशज 
10) 'आदमी' किस भाषा का शब्द है-
क) फारसी ख)अरबी ग) तुर्की घ)पुर्तगाली
11) किस क्रमांक का शब्द तत्सम है?
क) सूरज ख) सूर ग)खेत घ)सूत्र
12) किस क्रमांक का शब्द तद्‌भव है?.
क) अंक ख)मिथुक ग) भगिनी घ)बाँसुरी
13) किंस क्रमांक का शब्द तद्‌भव है?
क) मातुल ख) मक्खी ग)मित्र  घ)मयूर
14) किस क्रमांक का शब्द तत्सम है? 
क) भाप ख) शक्कर ग) लक्ष घ) सींग 
15): उपेक्षा' का सही विलोम है-
क)तिरस्कार  ख)सम्मान ग)अपेक्षा घ)अपमान
16 'संकीर्ण' का सही विलोम है-
क) संकुचित ख) गहरा ग) संकुचन घ) विस्तीर्ण
17) 'मैं' विरोध से उतना डरता हूँ जितना कि-से, वाक्य में रेखांकित शब्द के सही विलोम का क्रमांक है
क) पक्ष ख) पक्षपात ग)सहमति घ) समर्थन 
18) "हमें भूलकर भी कठोर क्चन नहीं कहने चाहिए"वाक्य में रेखांकित शब्द के लिए विलोम शब्द है -
क) सरस ख)सरल ग) मृदु घ) उग्र
19) वक्र' शब्द का सही विलोम है- क) ऋजु ख)टेढ़ा ग)तिरछा घ)क्षुद्र 
20) किस क्रमांक का शब्द 'वर्ग' पर्यायवाची नहीं है?
क) द्युलोक ख) नाक गा विभावरी घ) सुरलोकं
21-लाघव - चिह्न का प्रयोग होता है-
उद्धरण के लिए बड़े अंश का संक्षिप्त रुप लिखने के लिए 
त्रुटि सुधार के लिए अभिवादन के लिए
22 हमारे बैल धर-उधर भटकते हुए पड़ोसियों के खेत में  जा पहुंचे वाक्यमें किस प्रकार की अशुद्धि है - 
पदक्रम  संज्ञा ग लिंग घ वचन
23 मेरी बात वह हंसी से टाल गया- वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है 
विभक्ति परसर्ग ग  कारक विच्छेद 
24 मुझे ईश्वर पर आत्मविश्वास है - वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है 
क  विशेषण क्रिया ग क्रिया विशेषण संज्ञा
25 इसमें समस्त प्राणी मात्र का कल्याण है - वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है 
प्र विशेषण विशेषण उत्तमावस्था पदक्रम 
26 वह निज में वहां जाना नहीं चाहता-
वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है 
संज्ञा सर्वनाम क्रिया समुच्चयबोधक
27 पगड़ी ओढ़ कर जाओ - वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है 
क्रिया ख कृ धातु संज्ञा भाववाचक संज्ञा
28 मैं उसे सब कुछ समझ लूंगा-वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है
क्रिया संयुक्त क्रिया नाम धातु प्रेरणार्थक क्रिया
29  एकमात्र दो उपाय है-वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है
क  क्रिया अव्यय अविकारी क्रिया- विशेषण
30 अगर वह आया तो मैं चला जाऊंगा-अर्थ के आधार पर वाक्य भेद बताइए
संकेतवाचक विधानवाचक  प्रश्नवाचक आज्ञार्थक 
31 भारत की राजधानी दिल्ली में एक करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं 
क संज्ञा पदबंध ख सर्वनाम पदबंध ग विशेषण पदबंध
क्रिया पदबंध
32 बालक रोता हुआ शनै: शनै: मां के पास पहुंचा
संज्ञा पदबंधविशेषण पदबंधक्रियापद पदबंध
क्रियाविशेषण
33 अधिकरण तत्पुरुष में-
पहले पद प्रधान होता हैदूसरा पद प्रधान होता है 
दोनों पद प्रधान होता हैप्रथम व तृतीय पद प्रधान होता है
34 शताब्दी शब्द में समास है-
क द्वंद ख दिगु ग कर्मधारय घ तत्पुरुष
35 अव्ययीभाव समास का उदाहरण है-
लव कुश ख भरपेट  त्रिभुवन  घ छात्रधारी
36 स्वर्ण घाट का विग्रह है 
स्वर्ण में घाट घाट में स्वर्णस्वर्ण का घाटस्वर्ण के लिए घाट
37 निम्नलिखित में से किस शब्द में समास और संधि दोनों है
  यज्ञशाला स्वधर्म ग जलोष्मा घ पंकज
38 व्यंजन संधि का उदाहरण है-
 क उद्यात परमौषध दुरुपयोग तपोवन
39 गुण संधि का उदाहरण है-
महर्षि पावक अभ्युदय मतैक्य

40. विसर्ग संधि का उदाहरण है -
क) हरिशचंद्र 
ख) हरिश्चंद्र
ग) हरीशचंद्र 
घ) दिनेशचंद्र 
41. सच्चिदानंद का विच्छेद  है -
क) सत्+चित्र+आनन्द 
ख) सच्चिद+ आनन्द
ग) सच्चि+ दामंद 
घ) सत्+चिद्+आनन्द
42. किस क्रमांक में सभी पर्यायवाची शब्द सही है -
क) सरस्वती, भारती ,शारदा ,कामिनी
ख) कुंरग, सारंग, मृग, कुंजर 
ग) बैकुंठ, देवलोक, सुरलोक, घुलोक
घ) मृगेंद्र, मृगपती, दंती, केसरी
43. निम्नलिखित में से कौन सा शब्द 'बाल' का पर्यायवाची है -
क) कच
ख) शिखी
ग) कुंतल 
घ) अलक
44. किस शब्द युग्मेंम  में सही अर्थ भेद नहीं है -
क) गोत्र- गोत्रा-वंश और पृथ्वी
ख) द्रव - द्रव्य - तरल पदार्थ और धन
ग) तप - ताप - तपस्या और गर्मी 
घ) जरा - ज़रा - थोड़ा और बुढ़ापा 
45. किस क्रमांक में 'सूत-सुत' शब्द - युग्म का सही अर्थ भेद है ?
क) सारथी - पुत्र
ख) घर - संसार
ग) घर - सुंदर
घ) घर - समुद्र
46. किस क्रमांक में 'भीति - भित्ति' शब्द - युग्म का सही अर्थ - भेद है -
क) डर - दीवार
ख) आकाश भय
ग) डर - नौकर
घ) धरती - भय
47. किस क्रमांक में 'कलश - कुलिश' शब्द - युग्म का सही अर्थ - भेद है-
क) घड़ा - कुटिल
ख)  घड़ा  - व्रज
ग) व्रज - कटोरा 
घ) लोटा अत्याचारी
48. 'आंधी के आम' मुहावरे का सही अर्थ है -
क) थोड़े दिन टिकने वाली वस्तु
ख) स्थिर रहना
ग) एक जगह बने रहना
घ) रुक जना
49. 'आकाश का फूल' मुहावरे का अर्थ है -
क) कठिन कार्य
ख) अप्राप्य वस्तु
ग) पर्वत जैसी कठोर वस्तु 
घ) अप्राप् र्य कार्य 
50. 'कपोल - कल्पित' होना मुहावरे का अर्थ है -
क) बनी बनाई बात
ख) बातों को न जाना ना
ग) मनगढ़ंत होना 
घ) शक करना
51. 'और का और होना' मुहावरे का सही अर्थ है-
क) विशेष परिवर्तन होना
ख) सत्ता बदलना
ग) राजा बदलना 
घ) सरकार बदलना
52. 'कढ़ी का - सा उबाल' मुहावरे का अर्थ है -
क) शीघ्र ही समाप्त हो जाने वाला जोश
ख) समाप्त होना
ग) शुरू होना
घ) शीघ्र समाप्त होना
53. 'कबहु निरामिष होय ना कागा' लोकोक्ति का अर्थ -
क) मित्र अपनी मित्रता नहीं छोड़ता
ख) दुष्ट अपने दुष्टता नहीं छोड़ता 
ग) गांव ना छोड़ना 
घ) दोस्ती ना छोड़ना
54. 'जंगल में मोर नाचा' किसने देखा लोकोक्ति का अर्थ-
क) प्रशंसा करना
ख) पुरस्कृत करना
ग) सराहना के बिना योग्यता का व्यर्थ हो जना
घ) पुरस्कार देकर प्रशंसा करना
55) गंगा गए तो गंगादास, जमुना जाए तो जमुनादास - लोकोक्ति का अर्थ है-
क) समझौतावादी ख) अत्यधिक मित्रता ग) अवसरवादी घ) घमंडी हो जाना
56) सावन हरे ने भादों सूखे :- लोकोक्ति का अर्थ है
क) गंगा की तरह बहना ख) शंकर भगवान
ग) सदा एक समान घ) वर्षा न होना
57) एक अकेला दो ग्यारह - लोकोक्ति का अर्थ -
क) सामाजिक संगठन ख) राजनीतिक पार्टी ग)सरकार 
घ) संगठन में ही शक्ति है।
58) जैसे नागनाथ वैसे साँपनाथ - लोकोक्ति का अर्थ है
क) लोगों का एक होना ख) दो भाई का एक होना ग) दोनों एक समान हुष्ट प्रवृति के होना। घ)दो पड़ोसी एक होना
59) श्रुति' शब्द का एक अर्थ, कान है, तो इसका दूसरा अर्थ है-
क) रामायण ख) वेद ग) पुराण घ)उपनिषद
60) पान शहद का एक अर्थ पत्ता होता है, तो इसका दूसरा अर्थ है- क) बेल ख)ताम्बूल  ग)वृक्ष  घ)कुंज
61)किस वर्ग में सभी शब्द अनेकार्थक है?
क) अंक, मधु, कीचि ख) वर्ण,पद,कारक  ग)अर्थ, हस्त, यूथप घ) तात, दुर्ग, भुजंग 
62) निम्न में से हंस का अर्थ नहीं है-
क) सूर्य ख) मराल ग)कमल घ)जीवात्मा
63) किस क्रम में शुरु वर्तनी नहीं है?
क) गरिष्ठ ख) तश्तरी ग) चारुताई घ) नीरव 
64) किस क्रम में शुद्ध शब्द है?
क) ज्योत्सना ख)तदोपरांत ग)झांसी घ) तनख़्‌वाह

Wednesday, May 29, 2024

पत्रकारिता

1 वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के उत्तर दीजिए :-
क ऑनलाइन उपलब्ध होने वाली दो साहित्यिक पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
ख पहल और वागर्थ पत्रिका कहां से प्रकाशित होती है।
ग हंस के संपादक कौन थे? इसका प्रकाशन किस वर्ष में होना आरंभ हुआ।
घ माधुरी पत्रिका कहाँ से प्रकाशित होती थी? इसके संपादक कौन थे।
ङ प्रभात खबर कोलकाता के संपादक कौन है?
च राजस्थान पत्रिका कोलकाता के संपादक का नाम बताएं
छ प्रभात खबर के प्रकाशक का नाम बताएं-
ज सन्मार्ग के संपादक है-
झ प्रतियोगिता दर्पण किस प्रकार की पत्रिका है।
ञ विशाल भारत के संपादक कौन है?

2-निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए :-

समकालीन साहित्यिक पत्रकारिता की मूल प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालिए। 
छायावाद युगीन साहित्यिक पत्रकारिता की  प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालिए। 
साहित्यिक पत्रकारिता में अनुवाद की भूमिका पर प्रकाश डालिए 
साहित्यिक पत्रकारिता की अवधारणा पर प्रकाश डालिए 


3-टिप्पणी लिखिए :-
कर्मवीर 
स्वदेश 
 ग बनारस अखवार 
 घ हिंदोस्थान
 ङ मतवाला

ssc

1 स्वर रहित 'र'का प्रयोग हुआ है-
क ट्रक में  पुनर्निर्माण में  त्राटक शत्रु में

निम्नलिखित में से कंठ-तालव्य स्वर कौन से है-
ए-ऐ ए-ओ ए-ऊ ओ-उ

मिठास शब्द है 
क व्यक्तिवाचक ख विशेषण  ग भाववाचक घ समूह वाचक

मोहन प्रकाश जी........ हिंदी पढ़ाते है। इस वाक्य में रिक्त स्थान की पूर्ति अन्य पुरुषवाचक सर्वनाम से करो। 
क मुझे ख तुम्हें ग उन्हें घ हमें 

हमें गरीबों पर दया करनी चाहिए। इसमें रेखांकित शब्द है 
क अवस्था सूचक विशेषण  ख संज्ञा  ग विशेषण घ क्रिया 

सभा में लोग शांतिपूर्वक बैठे हैं-अर्थ की दृष्टि से वाक्य भेद बताइए
क  इच्छाबोधक ख विधानवाचक ग आज्ञार्थक घ संकेतवाचक 

वह अध्यापक था जो कल यहां आया था रेखांकित उपवक का नाम बताइए 
क संज्ञा ख विशेषण ग क्रिया विशेषण घ कोई नहीं 

इनमें 'कृत वाच्य ' से संबंधित वाक्य कौन सा है 
क आरामशीन न से लकड़ी काटी जा रही थी 
ख वृद्ध से चला नहीं गया। 
ग लोगों से वह करूणा नहीं देखा गया। 
घ भारत एक नया उपग्रह छोड़ा 

हमें सफलता मिलने तक प्रयास करना चाहिए इस वाक्य में 'तक' है क समुच्चयबोधक ख क्रिया विशेषण ग संबंध बोधक
 घ विस्मयादिबोधक 

10 निम्नलिखित में से स्त्रीलिंग शब्द का चयन कीजिए 
क अपराध ख अध्याय ग स्वदेश 
घ स्थापना 

11 अपूर्ण भूत का उदाहरण है 
क पत्र मिल गया था। ख बालक सो रहा था। ग वर्ष हुई होगी। घ वर्ष हुई थी। 

12 `मैं खाना खा चुका, तब तक वह आया' यह वाक्य है 
क सरल वाक्य ख संयुक्त वाक्य ग मिश्र वाक्य घ संक्षिप्त वाक्य 

13 'को' और 'के'लिए किस कारक का चिह्न है 
क संप्रदान ख करण ग अपादान घ संबोधन 

14 राजा साहब बाजरों पर बैठकर गए-वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है 
क वचन ख क्रिया ग सर्वनाम घ विशेषण 

15 हिंदी की शिक्षा अनिवार्य कर दिया गया-इस वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है 
क क्रिया ख वचन ग सर्वनाम घ लिंग 


16 दूध में कौन पड़ा- इस वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है 
क संज्ञा ख सर्वनाम ग विशेषण घ लिंग 


17 यह सबसे उत्तम है- इस वाक्य में व्याकरण की कौन सी अशुद्धि है
 क विशेषण ख क्रिया विशेषण  ग संबंध बोधक घ समुच्चयबोधक 

18 वह उठने लग पड़ा- इस वाक्य में किस प्रकार की अशुद्धि है 
क पदक्रम ख अन्विति ग क्रिया घ क्रिया-विशेषण 

19 पुस्तकें ये किसकी है- इस वाक्य में किस प्रकार की शुअद्धि है 
क पदक्रम ख अन्विति ग क्रिया विशेषण घ संज्ञा 

20 क्या आप पढ़ लिए-इस वाक्य में किस प्रकार के अशुद्धि है 
क पदक्रम ख अन्विति ग क्रिया विशेषण घ संज्ञा 


21 वाक्य में अशुद्ध भाग का चयन कीजिए- मैं पटना गया (क/तो उसे समय ख/ मेरे पास ग/ केवल बीस रूपये मात्र थे घ/ कोई त्रुटि नहीं घ/


(21) निम्नलिखित में से कौन - सा 'देशज' शब्द है ?

(क) अग्नि  (ख) प्रार्थना
(ग) खेत     (घ) लोटा

(22) स्वतंत्र सत्ता धारण न करने वाले शब्द क्या कहलाते है ?

(क) रूढ़    (ख) यौगिक 
(ग) योगरूढ़ (घ) इनमें से कोई नहीं

(23 निम्नलिखित में कौन ' यौगिक ' शब्द  है?

(क) लेखक  (ख) पुस्तक
(ग) विद्यालय (घ) योगी

(24) प्रयोग की दृष्टि से सूक्ष्म अंतर व्यक्त करने वाले शब्द क्या कहलाते  हैं ?

(क) प्रयोगात्मक (ख) समानार्थक
(ग) अनेकार्थक  (घ) विपरीतार्थक

25  'यौगिक'  शब्द  कौन-सा  है ?

(क) पंकज   (ख) पाठशाला
(ग) दिन       (घ) जलज


26  दर्प  का पर्यायवाची शब्द है -
(क) तिरस्कार  (ख) अहंकार
(ग) गर्व           (घ) स्वाभिमान

27 सेना का पर्यायवाची शब्द है -
(क) अनीक    (ख) सैनिक
(ग) अरि          (घ) अतनु

28 प्रसून का पर्यायवाची शब्द है‌‍ -
(क) वृक्ष        (ख) पुष्प 
(ग) चंद्रमा      (घ) अग्नि 

29 अमृत का पर्यायवाची शब्द नहीं है -
(क) अमिय  (ख) सुधा
(ग) पीयूष   (घ) रसाल

30 विभावरी का पर्यायवाची शब्द है‌‌‌ -
(क) चंद्रिका  (ख) तपस्या
(ग) क्षणदा   (घ) तरणि


अनुच्छेद में रिक्त स्थानों की पूर्ति -------



                            गधांश-1
भारत माता की कोख में जो अमूल्य ________ भरी है जिनके कारण वह ________ कहलाती है उससे कौन परिचित न होना चाहेगा? लाखों करोड़ों वर्षों से अनेक प्रकार की धातुओं को पृथ्वी के गर्भ में पोषण  मिला है । दिन रात बहनें वाली नदियों ने पहाड़ों को पीस पीस कर अगणित  प्रकार की मिट्टियों से पृथ्वी  की देह को सजाया है । हमारे _______ आर्थिक _______ के लिए उन सबकी जांच - पड़ताल अत्यंत आवश्यक है। पृथ्वी की गोद में  जन्म लेने वाले खड़े पत्थर कुशल ______ से संवारे जाने पर अत्यंत ________ का प्रतीक बन जाते है । नाना भांति  के_______ नग विंध्य की नदियों के प्रवाह  में सुर्य की धुप से चिलकते रहते हैं उन‌ चीलवटों को जब________ कारीगर पहलदार कटाव पर  लाते हैं ।तब उनके प्रत्येक घाट से नई शोभा और सुन्दरता फूट पड़ती है , वे ________ हो जाते हैं। देश के नर नारियों के रूप मण्डन और सौन्दर्य प्रसाधन में इन छोटे पत्थरों का भी सदा से कितना भाग रहा है , अतएव हमें उनका________ होना भी आवश्यक है।


31.(क) वृत्तियां (ख) मूर्तियां 
    ( ग) कृतियां (घ) निधियां
32.(क) श्वेताम्बरा (ख) नीलाम्बरा
   ( ग ) वसुंधरा ( घ) कन्दरा 
33.(क) भूतकालिक (ख) तात्कालिक
   ( ग) भावी (घ) वर्तमानकालिक 
34 (क) निर्माण (ख) उत्साह
   ( ग) पतन (घ) उत्थान
35 (क) शिक्षितों (ख) युवकों
   (ग) शिल्पियों (घ) प्रशिक्षितों
36.(क) सौन्दर्य (ख) गौरव
   ( ग) समृद्धि (घ) विशालता
37.(क) विशाल (ख) आकर्षित
   (ग)अनगढ़ (घ) भौतिक
38 (क) पुष्ट (ख) चुस्त
    ( ग) दुरुस्त (घ) चतुर
39 (क) चिकने (ख) पतले
   ( ग) अनमोल (घ) विशाल
40.(क) भाव (ख) बोध
      ( ग) ज्ञान ( घ) अभिज्ञान



                                 *पाठ बोधन* 

वैज्ञानिक प्रयोग की सफलता ने मनुष्य की बुद्धि का अपूर्व विकास कर दिया है। द्वितीय महायुद्ध में एटम बम की शक्ति ने कुछ क्षणों में ही जापान की अजेय शक्ति को पराजित कर दिया। इस शक्ति की युद्धकालीन सफलता ने अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रान्स आदि सभी देशों को ऐसे शस्त्रास्त्रों के निर्माण की प्रेरणा दी कि सभी भयंकर और सर्वविनाशकारी शस्त्र बनाने लगे। अब सेना को पराजित करने तथा शत्रु-देश पर पैदल सेना द्वारा आक्रमण करने के लिए शस्त्र-निर्माण के स्थान पर देश के विनाश करने की दिशा में शस्त्रास्त्र बनने लगे हैं। इन हथियारों का प्रयोग होने पर शत्रु-देशों की अधिकांश जनता और संपत्ति थोड़े समय में ही नष्ट की जा सकेगी। चूंकि ऐसे शस्त्रास्त्र प्रायः सभी स्वतन्त्र देशों के संग्रहालयों में कुछ न कुछ आ गये हैं, अतः युद्ध की स्थिति में उनका प्रयोग भी अनिवार्य हो जायेगा। अतः दुनिया का सर्वनाश या अधिकांश नाश तो अवश्य ही हो जायेगा। इसीलिए निःशस्त्रीकरण की योजनाएँ बन रही हैं। शस्त्रास्त्रों के निर्माण में जो दिशा अपनाई गई, उसी के अनुसार आज इतने उन्नत शस्त्रास्त्र बन गये हैं, जिनके प्रयोग से व्यापक विनाश आसन्न दिखाई पड़ता है। अब भी परीक्षणों की रोकयाम तथा बने शस्त्रों के प्रयोग के रोकने के मार्ग खोजे जा रहे हैं। इन प्रयासों के मूल में एक भयंकर आतंक और विश्व विनाज का भय कार्य कर रहा है।
41 इस गद्यांश का मूल कथ्य क्या है?
आतंक और सर्वनाश का भय 
ख विश्व में शस्त्रास्त्रों की होड़
द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका
घ निरस्त्रीकरण और विश्व शांति
42 भयंकर विनाशकारी आधुनिक शस्त्रास्त्रों के बनाने की प्रेरणा किसने दी ?
क अमेरिका ने
ख अमेरिका की विजय ने
ग जापान के विनाश ने
घ बड़े देशों की पारस्परिक प्रतिस्पर्धा ने
43 एटम बम की अपार शक्ति का प्रथम अनुभव कैसे हुआ?
क जापान में हुई भयंकर विनाशलीला से
ख जापान की अजेय शक्ति की पराजय से
ग अमोरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस की प्रतिस्पर्धा से
घ अमेरिका की विजय से
44 बड़े-बड़े देश आधुनिक विनाशकारी शस्त्रास्त्र क्यों बना रहे है ?
क अपनी-अपनी सेनाओं में कमी करने के उद्देश्य से
ख अपने संसाधनों का प्रयोग करने के उद्देश्य से
ग अपना-अपना सामरिक व्यापार बढ़ाने के उद्देश्य से
घ पारस्परिक भय के कारण
45 आधुनिक युद्ध भयंकर व विनाशकारी होते हैं क्योंकि-
क दोनों देशों के शस्त्रास्त्र इन युद्धों में समाप्त हो जाते हैं। 
ख अधिकांश जनता और उसकी सम्पत्ति नष्ट हो जाती है।
ग दोनों देशों में महामारी और भुखमरी फैल जाती है।
घ दोनों देशों की सेनाएँ इन युद्धों में मारी जाती हैं।
46 इस गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक है-
क निःशस्त्रीकरण
ख आधुनिक शस्त्रास्त्रों का विनाशकारी प्रभाव
ग एटम बम की शक्ति
घ आतंक और विश्व विनाश का भय
47  'व्यापक विनाश आसन्न दिखाई पड़ता है।' इस वाक्य में 'आसन्न
का अर्थ क्या है?
क अवश्य घटित होने वाला
ख कुछ समय बाद घटित होने वाला
ग किसी क्षेत्र विशेष में घटित होने वाला
घ कभी घटित नहीं होने वाला
48 निशस्त्रीकरण से क्या तात्पर्य है _______
A) आधुनिक शस्त्रास्त्रो का मुक्त व्यापार 
B) आधुनिक शस्त्रास्त्रो के परीक्षण प्रयोग एवं भंडारण पर प्रतिबंध
 C) एटम की शक्ति का रचनात्मक कार्यों में प्रयोग 
D) एटम बम का जनता पर प्रयोग न करने का संकल्प 
49 निः शस्त्रीकरण की योजनाएं क्यों बनाई जा रही है______
A) क्योंकि आतंक और विश्व के सर्वनाश का भाई बढ़ता जा रहा है 
B) क्योंकि बड़े देशों के संसाधन समाप्त होते जा रहे है
C) क्योंकि तृतीय विश्व युद्ध की अभी कोई संभावना नहीं है 
D) क्योंकि यह योजनाएं संयुक्त राष्ट्र संघ ने बनाई है
50 विश्व को सर्वनाश से बचने के लिए कौन सी योजना सर्वाधिक प्रभावित हो सकती है_______
क एटम शक्ति का नियोजन 
ख निशस्त्रीकरण की योजना 
ग प्रत्येक देश को आधुनिक शस्त्रास्त्रो से सुसज्जित करने की योजना 
घ रूस अमेरिका की मित्रता की योजना


                     वाक्यों में रिक्त स्थानों ---

51 उदयशंकर भट्ट हिन्दी साहित्य के प्रमुख ..... है ।
(क) कहानीकार (ख) निबंधकार
(ग) उपन्यासकार (घ) नाटककार
52 युद्ध-प्रधान एवं राष्ट्र-चेतनापरक कविताओं में..…. की प्रधानता होती है।
(क) ओज गुण  (ख) रजोगुण
(ग) तमोगुण     (घ) सतोगुण
53 मैया मोहि ...... बहुत खिजायो
(क) आधा     (ख) दाऊ
(ग) सुदामा    (घ) सखा
54 रवीन्द्रनाथ टैगोर का नाम सांस्कृतिक एवं .….....जगत में सदा
अविस्मरणीय रहेगा ।
(क) दर्शन   (ख) संगीत
(ग) साहित्यिक  (घ) चित्रकला
55 मनुष्य मृत्यु को असुन्दर ही नहीं .... भी मानता है।
(क) अनिवार्य  (ख) सुन्दर
(ग) त्याज्य    ‌‌ (घ) अपवित्र
56 अनयक परिश्रम और सतत.... से व्यक्ति सफलता की चरम सीमा को पा लेता है।
(क) व्यवसाय (ख) अध्यवसाय
(ग) समवाय  (घ) संकाय
57 केवल पुस्तकीय ज्ञान छात्रों की मौलिक प्रतिभा का .... नहीं कर सकता।
(क) अमर्ष  (ख) उन्मेष
(ग) पीयूष  (घ) प्रत्यूष
58 देवानन्द की काम के प्रति लगन और निष्ठा..... है ।
(क) दयनीय  (ख) अनुकरणीय
(ग) शोभनीय (घ) हास्यास्पद
59 जो लोग समय का ख्याल नहीं रखते उनकी ...... की जाती है
(क) तारीफ  (ख) शिकायत
(ग) प्रशंसा   (घ) निंदा
60 कमल का .......  सौंदर्य  भँवरे को ही आकर्षित कर सकता
 है , भैंस को नहीं।
(क) सौम्या  (ख) रम्य
(ग) सौरभ  (घ) सुकुमार

निर्देश : रेखांकित वाक्यांश के लिए एक शब्द का चयन कीजिए ----
 61 . रवि ईश्वर को न मानने वाला मनुष्य है।

  ‌ (क) सनाथ (ख) पंडित
   (ग) आस्तिक (घ) नास्तिक

62  ईश्वर का कोई आकार नहीं होता
   है।
 (क) सरोकार (ख) साकार
 (ग) निराकार (घ) इनमें से कोई नहीं

63 आंखों के सामने घटित घटना पर विश्वास तो करना ही पड़ेगा।
  (क) प्रत्यक्ष (ख) परोक्ष 
 ‌(ग) प्रारूपतः (घ) प्रत्येक

64 भारतीयों की बुरी दशा देखकर गांधीजी का मन द्रवित हो गया।
 (क) दुर्व्यवहार (ख) दीनता
 (ग) दुर्दशा (घ) दुर्दिन

65. दोपहर के समय शालू आराम कर रही थी। 
 ( क) पूर्वाह्न (ख) मध्याह्न 
( ग) कालिग्रह (घ) अपराह्न


विलोम शब्द ---

66 परोक्ष का विलोम शब्द है --
(क) प्रत्यक्ष (ख ) स्थूल
 (ग ) द्रष्टव्य (घ ) अपरोक्ष

 67 उपेक्षा का विलोम हऐ--
(क) परीक्षा (ख) अपेक्षा
(ग) उत्प्रेक्षा ( घ) लौकिक
 
68 पाश्चात्य का विलोम शब्द है --
(क) प्रतीची (ख) प्राची
(ग)पौर्वात्य (घ) प्रत्यक्ष
 69 शाश्वत का विलोम शब्द है --
(क)सदैव (ख) अनश्वर 
(ग) नश्वर (घ) रहस्यमय

70 शब्द के चार विलोम दिए गए हैं। सही विलोम शब्द का चयन कीजिए ---
हर्ष
(क) खेद (ख)वेदना
(ग) दुःख (घ)विषाद


*लोकोक्तियां* 

71 ओखली में सर दिया तो मुसलो का क्या डर का क्या अर्थ है___
a) मूर्ख के साथ मित्रता करने पर हानि ही होती है 
b) मुसीबत में घबराना किसी भी प्रकार से उचित नहीं 
c) अच्छे व्यक्ति किसी को लाभ नहीं पहुंचा सकते 
d) कठिन काम शुरू करने पर कष्ट तो सहन करने ही पड़ते हैं 
72 जैसी बहे बयार, पीठ तब तैसी दीजे का अर्थ है_____
a) समय का रुख देखकर काम करना चाहिए 
b)राजनीति में दल बदल करते रहना चाहिए 
c)ऐसा काम करना चाहिए जिससे संकट में न फंसा जाए 
d)पवन की तरह कभी शीतल और कभी उसमें होना चाहिए
73  बिल्ली पहले ही दिन मारना चाहिए का अर्थ है_____
a) भय का शमन शुरू में ही कर देना चाहिए 
b) दुश्मन पर पहले ही वार कर देना चाहिए 
c) रॉब पहले ही दिन पकड़ता है, फिर नहीं 
d) बुरा समय आते ही सचेत हो जाना चाहिए 
74 सिर सहलाए भेजा खाए का  अर्थ है_______
a) एकदम निकट आकर शोरगुल करना 
b) किसी के सिर पर सवार हो जाना 
C) दोस्त बनकर हानि पहुंचाना 
d) चापलूसो के कहने को करना 
75 एक तो करेला आप तीता दूजा नीम चढ़ा का अर्थ है ____
a) बुरे का और बुरे से संग होना 
b) एक बुरा तो दूसरा उसे भी बुरा 
c) बुरे व्यक्ति की बुरी संतान 
d) बुरे का अच्छे से संग होना

    *मुहावरे*   
76  तेली का बैल होना का अर्थ हैं __
a) बुरी तरह काम में लगे रहना 
b) काम करने से बहन मारना 
c) मन लगाकर काम नहीं करना 
d) निर्धन होना 

77 आंख का नीर (पानी) ढल जाना का अर्थ है__ 
a) मरते समय आंसू बहाना 
b) निरुत्साहित होना 
c) निर्लज्ज होना 
d) निष्प्रभ होना

78 कच्चे घड़े पानी भरना का अर्थ है____
a) कमजोर से मदद की अपेक्षा करना 
b) ठीक ढंग से कम न करना 
c) कठिन काम करना 
d) मूर्खतापूर्ण काम करना 
 79 मखमली जूते मारना का  अर्थ हैं______

a) मीठी बातों से लज्जित करना 
b) व्यंग्य करना 
c) धनी व्यक्ति को प्रताड़ित करना 
d) अपमानित करना 
 80 शैतान की आँत का अर्थ है_____
a) अत्यंत धूर्त व्यक्ति 
b) निराश हो जाना 
c) बहुत लंबी वस्तु
d) दुर्दशाग्रस्त होना

वाक्य में क्रमबद्धत
81 
1 प्राय : विद्वान यह मानते हैं कि जीवन का बाहरी पक्ष
( य ) जीवन को प्रेरित करने वाले आदर्श 
(र)जैसेरहन-सहन ,मकान ,सड़क, यातायात के साधन आदि 
(ल)जैसे सत्य प्रेम अहिंसा आदि 
(व)सभ्यता के अंतर्गत आते हैं और
(6)उपलब्ध करा सके।
a. य र ल व 
b. र व य ल
c. ल व य र 
d. व य र ल

82 जंगल में जिस प्रकार 
 (य)अपनी संस्कृतियों के द्वारा     एक  दूसरे के साथ मिलकर 
   (र)अनेक लता वृक्ष और  वनस्पति अपने 
     (ल)अविरोधी स्थिति प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय जन
    (व)अदम्य भाव से उठाते हुए पारस्परिक सम्मेलन से 
(6)राष्ट्र में रहते हैं

a. य र  व ल

b. र व ल य 

c. व य र ल

d. व र य ल
83 अपनी व्यक्तिगत सत्ता की
   (य)यह जगत के वास्तविक दृश्यों और
  (र) जीवन की वास्तविक दशा में जो हृदय समय-समय 
  (ल)निज के योग - क्षेम  में से संबंध से मुक्त करके
   (व)अलग भावना से हटाकर 
   (6)वह रमता है ,वही सच्चा कवि हृदय है
a. ल र य व
b. य र व ल
c. व ल य र 
d.ल व ल य
84) यदि अपवित्र और मंगलकारी विचार 
(य)हमारा सारा जीवन, उसके कार्य और फल एक दूषित वातावरण से भर जाएंगे और
(र)हमारे पार्थिव शरीर की समाप्ति ही नहीं 
(ल)हमारे अन्तस् में आविर्भुत होने लगे तो 
(व)अपितु उन मानव - मूल्यों की भी समाप्ति हो जाएगी जिन पर
(6)मानव जीवन और उसका अस्तित्व अवलंबित है

a. ल र य व
b.र ल य व
c.ल य र व
d.य ल र व

85 हमारा उद्देश्य होगा , जीवन के
य करना कि हमारा सामाजिक जीवन 
र हर सांस्कृतिक पहलू का इस प्रकार विकास 
ल पूर्णगठित हो और वह सौंदर्य एवं आनंद को 
व स्वतंत्रता, समता और मानवता के आधार पर 
6 उपलब्ध करा सके। 
a. व र ल य
b. र य ल व
c. र य व ल
d. व र य ल

समास
86  जितेन्द्रिय ' में कौन सा समास है?
क) द्वंद 
ख) बहुव्रीहि 
ग)‌ तत्पुरुष
घ) कर्मधारय 

87  ‌ कौन - सा शब्द बहुव्रीहि समाज का सही उदाहरण है?
a.निशिदिन 
b.त्रिभुवन 
c.पंचानन 
d.पुरुषसिंह
88  विशेषण और विशेष्य के योग से कौन - सा समास बनता है? 
a.द्विगु
b.द्वंद
c.कर्मधारय 
d.तत्पुरुष

89 किस में सही सामासिक पद है? 
a. पुरुषधन्वी
b. दिवारात्रि
c. त्रिलोकी
d. मंत्रीपरिषद 

90 'गोशाला' में कौन सा समास है?
a. तत्पुरुष
b. द्वंद
c. कर्मधारय
d. द्विगु

वर्तनी शुद्धि 


91 किस क्रमांक में सभी शुद्ध है? 
क)ऐतिहासिक‌ , अलौकिक 
ख)कंगन , कंगाल 
ग)कँचन , दैहिक
घ)इतिहांसिक , अलौकिक

92)किस क्रमांक में सभी शुद्ध है? 
क)संतुष्ट, अनिष्ट 
ख)क्रितज्ञ , विशिष्ट 
ग)प्रशाद , विष
घ)विशिष्ट , श्लिष्ट

93 निम्नलिखित में से कौन - सा शब्द शुद्ध है?
क)अभिषेक 
ख)अभिसेक
ग)अभिशेक
घ)अभीषेक


94) निम्नलिखित में से कौन - सा शब्द शुद्ध है?
क)भोगोलिक
ख)भोगोलीक
ग)भौगोलिक 
घ)भूगोलिक


95) निम्नलिखित में से कौन - सा शब्द शुद्ध है?
क)आशीर्वाद 
ख)आर्शीवाद
ग)आशिर्वाद
घ)आर्शिवाद
संधि 


96 पवित्र ' में प्रयुक्त संधि का नाम है-
क)यण संधि
ख)गुण संधि 
ग)अयादि संधि 
घ)वृद्धि संधि


97 ' महोष्ण ' का सही संधि - विच्छेद है?
क) महु + उष्ण
ख) महा+ऊष्ण
ग) महो + उष्ण
घ) महा + उष्ण


98) 'आशीर्वाद' का सही संधि - विच्छेद है?
क)आशीर + वाद
ख)आशी: + वाद
ग)आर्शी‌ + वाद
घ) इनमें से कोई नहीं 


99 'सन्मति' का सही संधि - विच्छेद है-
क)सम् + मति 
ख)सन् + मति
ग)सद् + मति
घ)सत्+ मति


100) 'अन्वय' का सही संधि - विच्छेद है-

क)अनु+अय
ख)अनू+आय
ग)अनू + अय
घ)अनु + आय


              रस 
स्थायी भावों  की कुल संख्या 
क 9 ख 10 ग 11 घ 12 

विस्मय स्थायी भाव किस रस में होता है-
क हास्य में ख शांत में ग अद्भुत में घ विभक्त समय 

छंद

 छंद का सर्वप्रथम उल्लेख कहां मिलता है-
क ऋग्वेद ख यजुर्वेद ग उपनिषद घ सामवेद

कोई भी छंद किसमें विभक्त रहता है? 
क चरणों में ख यति में ग दोनों में ही घ इसमें कोई नहीं 


अलंकार

तरनि तनुजा तट तमाल तरुवर बहु छाय में कौन सा अलंकार है 
क अनुप्रास ख यमक ग उत्प्रेक्षा घ उपमा 

चरण कमल बंदौ हरि राई में कौन सा अलंकार है 
क श्लेष ख उपमा ग रूपक घ अतिशयोक्ति 

राजभाषा 

ब्रज भाषा है 
क पूर्वी हिंदी ख पश्चिमी हिंदी ग बिहारी हिंदी घ पहाड़ी हिंदी 

मगही किस उपभाषा की बोली है? 
क राजस्थानी ख पश्चिमी ग पूर्वी घ बिहारी

Wednesday, March 6, 2024

बुलेट ट्रेन और आर्थिक विकास की संभावनाएं - एक परिचय

भारत की गिनती दुनिया के विकासशील देशों में होती है जोकि बीते कुछ सालों में विश्व की आर्थिक शक्ति के रुप में अपनी पहचान बनाने में सफल साबित हुए हैं। देश में फैली आधुनिकीकरण की लहर के चलते न केवल भारत का सामाजिक उत्थान हुआ है बल्कि आर्थिक बढ़ोतरी ने लोगों के जीवन स्तर को भी बेहतर बनाया है। हर गुजरते वर्ष के साथ देश में विकास एवं सुविधा के नए आयाम बनते जा रहे हैं, फिर चाहे वह रोज़गार के अवसर पैदा करने वाली स्वदेशी एवं विदेशी कंपनियां हो या फिर आवागमन को सुविधाजनक बनाने वाली बुलेट ट्रेन, जो आने वाले कुछ ही वर्षों में देश में दौड़ती नजर आएगी।

बुलेट ट्रेन परियोजना भारत की अब तक की सबसे बड़ी परियोजनाओं में से एक है। बुलेट ट्रेन के पहले चरण में इसे अहमदाबाद से मुम्बई मार्ग पर शुरु करने का फैसला लिया गया है, जिससे अहमदाबाद से मुम्बई के बीच की 508 कि.मी की दूरी को यात्री 320 कि.मी प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ने वाली बुलेट ट्रेन से मात्र 2 घंटे 7 मिनट में तय कर लेंगे।

मुम्बई से अहमदाबाद तक चलने वाली बुलेट ट्रेन कुल 12 स्टेशनों से होकर गुजरेगी, जिनमें साबरमती, अहमदाबाद, आनंद, वडोदरा, भरुच, सूरत, बिलिमोरा, वापी, बोईसर, विरार, ठाणे और बांद्रा कुरला कॉम्पलेक्स (मुंबई) शामिल है। परियोजना के अधीन इन सभी क्षेत्रों में विकासशील कार्य होंगे, जिससे न केवल औधोगिक विकास के नए अवसर पैदा होंगे बल्कि यह परियोजना इन क्षेत्रों में शैक्षिक एवं रोजगार, पर्यटन व बुनियादी सुविधाओं के ढांचे को भी बेहतर बनाने में कारगर साबित होगी।


औद्योगिक विकास

चाहे वह मुंबई का बांद्रा कुरला कॉम्पलेक्स हो जो कि एक कॉर्पोरेट हब के रुप में जाना जाता है और जहां देश के कई बड़े सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों के मुख्यालय/ कार्यालय स्थित है या फिर सूरत का हीरा और कपड़ा उद्योग, बुलेट ट्रेन परियोजना के पूर्ण होने के उपरांत मुंबई - अहमदाबाद मार्ग पर होने वाली व्यावसायिक स्तर की यात्राओं के समय में कटौती आयेगी जिससे कि पैसे की बचत होगी I साथ ही एम् एम् आर डी ए (MMRDA) के अंतर्गत आने वाले बोइसर, विरार और ठाणे जहां 1500 के करीब मध्य स्तरीय उद्योग और लगभग 1800 लघु उद्योग चल रहे हैं और गुजरात राज्य के वापी, भरुच, वड़ोदरा, आनंद, और अहमदाबाद जहां खाद्य, फार्मास्यूटिकल एवं रासायनिक उद्योग अपने चरम पर है, वहां मेक इन इंडिया के तहत नए उद्योग विकसित होंगे जो भारत के सकल घरेलु उत्पाद (जी. डी. पी.) को ऊपर ले जाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे |

प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार

बुलेट ट्रेन परियोजना के अंतर्गत रूडसेट तथा अन्य शैक्षणिक संस्थाओं के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर परियोजना प्रभावित लोगों एवं उनके परिवार के लिए कौशल विकास के कार्यक्रम चलाये जा रहे है जिससे वह सभी लोग स्वरोजगार की ओर प्रेरित हो रहे है | मुंबई अहमदाबाद हाई स्पीड रेल कॉरिडोर के अधीन व्यापक स्तर पर कार्य चल रहे है जिसमे काफी बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर प्रदान किये जा रहें है |शैक्षणिक एवं चिकित्सिकिय सुविधाओं और संस्थानों में बढ़ोतरी होने से आय एवं रोजगार के नए अवसर मिलेंगे जो लोगों को आजीविका के नए साधन उपलब्ध कराएगी |


पर्यटन व्यवसाय

मुम्बई के पर्यटक स्थल जैसे गेटवे ऑफ इंडिया, नरीमन पॉइंट, कोलाबा कोस्वे और सिद्दी विनायक या फिर ठाणे की झीले, वडोदरा का लक्ष्मी विलास पैलेस या फिर भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री श्री सरदार वल्लभभाई पटेल को श्रद्धांजलि देती विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा स्टेचू ऑफ़ यूनिटी, सूरत का डुमस तट, एवं अहमदाबाद की कणिका झील हमेशा से ही पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहे है परन्तु यात्रा में लगने वाला समय कही न कही पर्यटन व्यवसाय को प्रभावित करता ही है | बुलेट ट्रेन परियोजना के आ जाने से मुंबई से अहमदाबाद की यात्रा को पर्यटक 3 घंटे से भी कम समय में पूरी कर, इन क्षेत्रों के पर्यटक स्थलों का भ्रमण सुविधापूर्वक और सरलता से कर पाएंगे, जो यहां के पर्यटन व्यवसाय के उत्थान के लिए फायदेमंद साबित होगा |


मूलभूत विकास

किसी भी परियोजना की सफलता या असफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह किस प्रकार परियोजना के आसपास के क्षेत्रों की आधारभूत संरचनाओं के विकास में योगदान करती है और मुंबई अहमदाबाद हाई स्पीड रेल परियोजना अभी से इस बात की पुष्टि करती है कि यह भारत की सफलतम परियोजनाओं में से एक है | परियोजना की शुरुआत से ही भूमि अधिग्रहण के लिए जिस प्रकार राजस्व विभाग द्वारा जारी की गयी सरकारी दरों (जंत्री दर) से ज्यादा अनुदान दिया गया और परियोजना प्रभावित लोगो की आर्थिक मदद करके उनको मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश की गयी, यह इस परियोजना की कुछ विशिष्टाओं में से एक है |

परियोजना के आरम्भ में ही व्यावसायिक और निजी भूमि पर निर्माण कार्यो में तेजी एवं बाजार मूल्यों में इजाफा इस बात की ओर संकेत करता है कि इस मार्ग पर आने वाले क्षेत्रों की आधारभूत संरचनाओं के विकास कार्यो में तेजी आएगी | यह परियोजना इन शहरों के विकास को नए चरम तक ले जाएगी। जिससे लोगों के जीवन में बुनियादी सुविधाओं की बेहतरी व बढ़ावा देखने को मिलेगा।

हाईस्पीड परियोजना केवल लोगों को आवागमन की एक बेहतर सुविधा ही नही देगी बल्कि इसके अंतर्गत उन क्षेत्रों का जमीनी विकास भी होगा, जिन्हे इस परियोजना का हिस्सा बनाया गया है। निर्माण कार्यों के साथ साथ यहां स्थित शिक्षण, चिकित्सा एवं अन्य संस्थान को इस परियोजना का लाभ मिलेगा। भारत की बुलेट ट्रेन परियोजना केवल दो राज्यों को ही नही जोड़ेगी, बल्कि यह दोनों राज्यों के व्यवसायों को भी बढ़ावा देगी। साथ ही परियोजना से पूर्व, परियोजना के दौरान व इसके पूर्ण होने के पश्चात सैंकड़ो लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से रोजगार मिलेगा। बुलेट ट्रेन की मदद से लोग कम समय में गुजरात व महाराष्ट्र के पर्यटक स्थलों तक पहुंच सकेंगे जोकि इस व्यवसाय के लिए काफी फायदेमंद साबित होगा। बहरहाल यह कहा जा सकता है कि बुलेट ट्रेन भारत में अद्भुत बदलाव लाएगी, जिसका लाभ आम लोगों को रोजगार, परिवहन सुविधा और व्यावसायिक विस्तार के रुप में होगा।

 




Thursday, January 18, 2024

नाटक एकांकी

निम्नलिखित वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के उत्तर दीजिए


1.अंधेर नगरी नाटक का प्रकाशन वर्ष क्या है तथा किसकी रचना है?
2. स्कंद गुप्त की माता का क्या नाम है तथा नाटक में कितने अंक है?
3. माधवी नाटक के किन्हीं दो स्त्री पात्रों  के नाम लिखिए?
4. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए
मैं वास्तव में अपनी........ से प्रेम करती हूं जो पवित्र है, कोमल है,......... है
5. और वह जा ना सकी किस विधा की रचना है तथा इसका मुख्य पात्र कौन है
6. औरंगजेब की आखिरी रात के लेखक का नाम लिखिए। औरंगजेब अपने आखिरी वक्त किस किले में था
7.विषकन्या के लेखक का नाम लिखिए और इसका प्रकाशन वर्ष क्या है?
8. जगदीश चंद्र माथुर के किन्हीं दो एकांकियों के नाम बताएं
9. रामकुमार वर्मा के किन्हीं दो एकांकियों के नाम बताएं.
10. विष कन्या संदेश किसके माध्यम से और किस पर लिखकर भेजती है.

2. लघु उत्तरीय प्रश्नों के उत्तर दीजिए
1.विश्वकन्या एकांकी को  सोउद्देश्यता पर प्रकाश डालिए.
2. स्कंद गुप्त नाटक की रंगमंचीयता पर प्रकाश डालिए
3. गलन का चरित्र चित्रण कीजिए
4. औरंगजेब की आखिरी रात के किसी एक पत्र का चरित्र चित्रण कीजिए
5. माधवी नाटक के प्रतिपाद्य पर विचार कीजिए

3 निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए
1. एकांकी के तत्वों के आधार पर विषकन्या एकांकी की समीक्षा कीजिए
2. स्कंद गुप्त नाटक की देवसेना एक निश्चल पवन और आदर्श प्रेमिका है सिद्ध कीजिए
3. माधवी नाटक में व्यक्त विद्रोही चेतन की समीक्षा कीजिए
4. औरंगजेब की आखिरी रात एकांकी के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि औरंगजेब का मनोवैज्ञानिक चरित्र चित्रण करने में रामकुमार वर्मा सफल हुए हैं
5. और वह जा न सकी में व्यक्त आधुनिक बोध की सोदाहरण विवेचन कीजिए

Wednesday, November 22, 2023

रविदास जयन्ती पर विशेष-- अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी

रविदास जयन्ती पर विशेष-- अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी


रविदास जयन्ती पर विशेष
अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी
निर्गुण भक्ति के दैदिप्तमान नक्षत्र संत शिरोमणि रविदास उर्फ रैदास रामानंद के शिष्य, कबीर के गुरु भाई और भक्ति की प्रकाष्ठा मीरा के अध्यात्मिक गुरु थे। मीरा बाई ने लिखा भी है- 
गुरु मिलीया रविदास जी दीनी ज्ञान की गुटकी
चोट लगी निजनाम हरी की महारे हिवरे खटकी।
15वीं शताब्दी में जब हमारा समाज अनेक विसंगतियों का बंदी था, इस महान संत, दर्शनशास्त्री, कवि, समाज-सुधारक ने एक ऐसा अलख जगाई जिसने आध्यात्मिक और सामाजिक परिवर्तन की लहर को गति प्रदान की।  उन्होंने अपनी अनेक रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान किया। इनकी रचनाओं की विशेषता लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग था, जिसका मानव धर्म और समाज पर अमिट प्रभाव पड़ता है। संत रैदास की वाणी विचार और धर्म की विभिन्न शाखाओं को जोड़ने वाला एक ऐसा सेतु  है । जो समाज जर्जर करने वाली छुआ-छूत, ऊँच-नीच, असमानता की बाधाओं को दूर कर बंधुत्व  में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। आप कहा करते थे-
आज दिवस लेऊँ बलिहारा ।
मेरे घर आया रामका प्यारा।।
आँगन बँगला भवन भयो पावन ।
हरिजन बैठे हरिजस गावन।।
करूँ डंडवत चरन पखारूँ।
तन-मन-धन उन उपरि वारूँ।।
कथा कहै अरु अरथ बिचारैं।
आप तरैं औरन को तारैं।।
कह रैदास मिलैं निज दासा ।
जनम जनमकै काटैं पासा।।
रविदास जी का दर्शन है-
जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।
रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।
हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।।
कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।
हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस।
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास।।
जातिवाद के आधार पर ईश्वर की भक्ति को रैदास ने सारहीन बताया और इस बात पर जोर दिया कि अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर नहीं बल्कि अपने आचरण तथा व्यवहार से मनुष्य महान होता है। 
गाइ गाइ अब का कहि गाऊँ।
गांवणहारा कौ निकटि बतांऊँ।। 
जब लग है या तन की आसा, तब लग करै पुकारा।
जब मन मिट्यौ आसा नहीं की, तब को गाँवणहारा।।
जब लग नदी न संमदि समावै, तब लग बढ़ै अहंकारा। 
tब मन मिल्यौ रांम सागर सूँ, तब यहु मिटी पुकारा।।
जब लग भगति मुकति की आसा, परम तत सुणि गावै।
जहाँ जहाँ आस धरत है यहु मन, तहाँ तहाँ कछू न पावै।।
छाड़ै आस निरास परंमपद, तब सुख सति करि होई।
कहै रैदास जासूँ और कहत हैं, परम तत अब सोई।।
अपने समय के ऐसे महान संत जिन्हें सर्वसमाज सम्मान देता था रविदास जी  के 41 पद सिक्खों के पांचवे गुरु अर्जन देव द्वारा संकलित गुरुग्रंथ साहिब में संकलित हैं। जिनका गायन  विभिन्न रागों में होता है। जिनका विवरण इस प्रकार से है-   राग जैतसारी, रामकली,  केदारा, भाईरऊ,बसंत, गुजारी  तथा रागा-सिरी में एक-एक  पद, मारु, बिलावल, गौंड में दो-दो पद, मलहार, सुही और धनसरी में तीन-तीन पद, गौरी में 5 पद,  असा में 6 पद और सोरथ में 7 पद।
निर्गुण भक्ति के उपासक रविदास जी ने राम के विभिन्न स्वरुपों यथा राम, रघुनाथ, राजा राम चन्द्र, कृष्णा, गोविन्द आदि के नामों का इस्तेमाल अपनी भावनाओं को उजागर करने के लिये किया।
राम मैं पूजा कहा चढ़ाऊँ।
फल अरु फूल अनूप न पाऊँ।।
थन तर दूध जो बछरू जुठारी ।
पुहुप भँवर जल मीन बिगारी।।
मलयागिर बेधियो भुअंगा।
विष अमृत दोउ एक संगा।।
मन ही पूजा मन ही धूप।
मन ही सेऊँ सहज सरूप।।
पूजा अरचा न जानूँ तेरी।
कह रैदास कवन गति मोरी।।
संत शिरोमणि रविदास जी महाराज ऐसी दुनिया बनाना चाहते थे जो बिना किसी दुख, दर्द, डर और भेदभाव, अभाव और अपमान से मुक्त होकर रहें। आप आड़म्बर की बजाय वास्तविक धर्म के पक्षधर थे। एक बार कुछ लोगों ने रविदास जी को गंगा में स्नान के लिए चलने को कहा लेकिन उन्होंने एक ग्राहक को दिये वचन को प्राथमिकता देना आवश्यक समझा। बार-बार आग्रह करने पर आपका मानना था- ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ अर्थात् शरीर से अधिक मन, बुद्धि और आत्मा कोे पवित्र होना चाहिए। अगर हमारी आत्मा और मानसिकता पवित्र और शुद्ध है तो हम कहीं भी नहाये, पवित्र है। अगर आत्मा मैली है तो गंगा स्नान भी व्यर्थ है। अश्पृश्यता के विरोधी संत रविदास जी ने लोगों को संदेश दिया कि ‘ईश्वर ने इंसान बनाया है न कि इंसान ने ईश्वर बनाया है।’ 
संत  रविदास जी के इस दर्शन से प्रभावित होकर अनेक  राजां और समृद्ध लोग उनके अनुयायी बनेे लेकिन वे किसी से भी किसी प्रकार का धन या उपहार नहीं स्वीकारते थे। एक दिन किसी सेठ ने एक कीमती पत्थर उन्हें देना चाहा लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया। इसके बावजूद वह यह कह कर छोडत्र गया कि बाद में ले जाऊंगा। कई वर्षों बाद जब वह लौटा तो पत्थर जस का तस रखा हुआ था। रविदास जी ने सभी को  धन के लालच से दूर रहने की सीख देते हुए कहा, ‘धन कभी स्थायी नहीं होता, आजीविका के लिये कड़ी मेहनत करो।’
यद्यपि जन्म वर्ष को लेकर अनेक मत है लेकिन यह तय है कि वह दिन माघ पूर्णिमा का ही था जब माता कालसा देवी और बाबा संतोख दास के घर रविदास ने अवतार लिया। उनके पिता जूतों का व्यापार और मरम्मत का कार्य करते थे। अपने बचपन से ही रविदास ने जातिगत विषमता को अनुभव कर उसके विरूद्ध बदलाव की ठानी। आपनेे सभी को बिना किसी  भेद-भेदभाव के प्रेम, शांति और भाईचारे से मिलजुल कर रहने की शिक्षा दी। अपने अध्यापन के आरंभिक दिनों में काशी में आपको कुछ  रुढिवादी लोगों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन उनके अध्यापक पंडित शारदानंद को रविदास के असामान्य प्रतिभाशाली और चमत्कारी व्यक्तित्व होने का अहसास हो गया था। उनका पुत्र  और रविदास मित्र बन गये। दोनों साथ-साथ खेला करते। एक शाम दोनो लुका-छिपी खेल रहे थे। बारी-बारी से दोनो छिपते तो दूसरा उसे ढ़ूंढता। जब रविदास  की बारी आई तो अंधेरा बढ़ जाने के कारण खेल रोकना पड़ा। अगली सुबह रविदास अपने मित्र की प्रतीक्षा करते रहे पर वह नहीं आया। जब वे उसके घर गये तो सभी को गुरुपुत्र के शव के पास बैठ रोते पाया। बालक रविदास ने शव के पास जाकर कहा, ‘उठो ये सोने का समय नहीं है दोस्त, ये तो लुका-छिपी खेलने का समय है।’ आश्चर्य कि वह उठ खड़ा हुआ। यह देख सभी चकित रह गये। ,
ईश्वरीय भक्ति और वैराग्य और  पारिवारिक व्यवसाय से नहीं जुड़ पाने से चितिंत रविदास जी के माता-पिता  ने बहुत कम आयु में ही उनका विवाह कर दिया। इसका भी जब बहुत प्रभाव नहीं पड़ा तो  क्षुब्ध होकर पिता ने बिना कोई मदद और पारिवारिक संपत्ति दिये उन्हें अलग कर दिया। इसके बाद से रविदास पारिवारिक सामाजिक मामलों से जुड़ गये। लेकिन अपने असली उद्देश्य यानि प्रभु भक्ति संग सामाजिक समरसता को कभी विस्मृत नहीं किया। समाज में उनकी महान प्राकृतिक शक्तियों और ईश्वर के प्रति उनकी सच्ची निष्ठा देखकर हर जाति और धर्म के लोगों पर प्रभाव पड़ा और वे उनके भक्त और अनुयायी बन गये। 
संत रविदास जी की चमत्कारिक शक्तियों के विषय में अनेक कथायें प्रचलित हैं। कहा जाता है कि एक बार एक व्यक्ति कुंभ स्नान के लिए जा रहा था। संत रविदास जी ने उसे एक सिक्का देते हुए कहा, ‘आप इसे  गंगा माता को ही देना।’ कुंभ स्नान के बाद घर लौटने से पूर्व उस व्यक्ति को रविदास जी के दिये सिक्के की याद हो आई। उसनेे नदी किनारे जाकर जोर से रविदास जी का भेजा सिक्का स्वीकार की बात कही तो गंगा माँ प्रकट होकर उसे स्वीकारा और उपहार के रूप में सोने के दो खूबसूरत कँगन उनके लिए  भेजे। लेकिन रास्ते में उसका मन बदल गया और उसने वे कंगन रविदास जी की बजाय बेचने के लिए बाजार में ले गया। सुनार होशियार था। वह समझ गया कि ये कंगन इसके नहीं हो सकते। उसने वे कँगन  रानी को देखने के लिए भेजे। रानी ने ठीक वैसे ही दो और कंगन लाने को कहा परंतु सुनार बना नहीं सका तब सब बात खुल गई। अंत में वे रविदास जी की शरण में गये तो उन्होंने चमड़ा भिगोने वाले अपने पात्र में हाथ डालकर ठीक वैसे ही अनेक और कंगन देकर उनकी जान बचाई। संत रविदास जी  इस दैवीय शक्ति ने राजा को भी उनका अनुयायी बना दिया।
इसी प्रकार कहा जाता है कि एक बार एक सेठ ने उनसे ज्ञान देने को कहा तो उन्होंने उसे मिट्टी के मैले से बत्रन में पानी देते हुए उसे पीने को कहा। धमंड से भरे उस सेठ ने उसे शुद्ध न समझते हुए पीने का दिखावा करते हुए उसे अपने कपड़ों पर गिरा लिया। कीमती कपड़ों पर लगे दाग छुड़ाने के दौरान गरीब धोबी ने उसे अपने कुष्ठ रोगी बालक को दे दिया। उस बालक ने मुंह से वे दाग छुडज्ञत्रने की कोशिश की तो कपड़ों में समाया वह पवित्र जल उसके अंदर पहुंचकर अमृत बन गया और उसका कुष्ठ ठीक हो गया। जबकि उस सेठ को घर बैठे कुष्ठ  हो गया। उसने योग्य अनुभवी योग्य वैद्यों खूब महंगे से महंगा उपचार कराया लेकिन स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती ही गई। अंत में उसने संत रविदास जी के पास जाकर अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी और फिर से वही जल ग्रहण कर ठीक हुआ।
मन की मैल को धोने को भक्ति बताते हुए रविदास जी कहते हैं-
कवन भगितते रहै प्यारो पाहुनो रे।
घर घर देखों मैं अजब अभावनो रे।।
मैला मैला कपड़ा केता एक धोऊँ ।
आवै आवै नींदहि कहाँलों सोऊँ।।
ज्यों ज्यों जोड़ै त्यों त्यों फाटै।
झूठै सबनि जरै उड़ि गये हाटै ।।
कह रैदास परौ जब लेख्यौ।
जोई जोई, कियो रे सोई सोई देख्यौ।।
इस महान संत की जयन्ती पर उन्हें शत-शत नमन करते हुए आओ हम उनके बताये मार्ग पर चलने का संकल्प ले।
अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी ।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी , जाकी अँग-अँग बास समानी ।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा , जैसे चितवत चंद चकोरा ।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती , जाकी जोति बरै दिन राती ।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा , जैसे सोनहिं मिलत सुहागा ।
प्रभु जी, तुम तुम स्वामी हम दासा , ऐसी भक्ति करै रैदासा

Tuesday, October 31, 2023

आषाढ़ का एक दिन


नाटक की ऐतिहासिकता:

      अपने दूसरे नाटक (“लहरों के राजहंस” 1963) की भूमिका में मोहन राकेश ने लिखा है- “मेघदूत पढ़ते समय मुझे लगा करता था कि वह कहानी निर्वासित यक्ष की उतनी नहीं है, जितनी स्वयं अपनी आत्मा से निर्वासित उस कवि की जिसने अपनी ही एक अपराध-अनुभूति को इस परिकल्पना में ढाल दिया हैं।”

      इस प्रकार मोहन राकेश जी ने कालिदास की इसी निहित अपराध-अनुभूति को आषाढ़ का एक दिन का आधार बनाया है। इससे यह स्पष्ट होता है, कि जो कालिदास मेघदूत लिखे है, उन्ही के ऊपर यह नाटक है। और उन्ही की भावनाओं और विचारों को लेकर मोहन राकेश जी ने इस नाटक को लिखा है।

  कालिदास की चर्चा स्कंदगुप्त नाटक में भी जयशंकर प्रसाद जी ने किया है। स्कंदगुप्त नाटक में जयशंकर प्रसाद जी ने स्कंदगुप्त पर अधिक ध्यान दया है वही आषाढ़ की एक दिन में कालिदास के ऊपर मोहन राकेश ने प्रकाश डाला है। ये वही कालिदास जी है जो मातृगुप्त के रूप में कश्मीर के शासक बने थे।

      जयशंकर प्रसाद के शब्दों में- (स्कंदगुप्त 1928 की भूमिका) में उन्होंने लिखा था। “मेरा अनुमान था कि मातृगुप्त कालिदास तो थे परन्तु द्वितीय और काव्यकर्ता कालिदास।” इस प्रकार हम कह सकते है कि ‘आषाढ़ का एक दिन’ ऐतिहासिक नाटक है   

नाटक के पात्र

कालिदास: कवि और नायक

अंबिका: गाँव की एक वृद्धा, मल्लिका की माँ  

मल्लिका: अंबिका की पुत्री, कालिदास की प्रेमिका  

दंतुल: राजगुरु

मातुल: कवि-मातुल

निक्षेप: गाँव का पुरुष

विलोम: गाँव का पुरुष

रंगीनी, संगिनी: दोनों नागरी

अनुस्वार, अनुनासिक: दोनों अधिकारी

प्रियंगुमंजरी: राजकराजकन्या, कवि-पत्नी

‘अषाढ़ के एक दिन’ नाटक का मुख्य बिंदु:

इस नाटक में मोहन राकेश जी ने भौतिक दर्शन और प्रवृति मार्ग और निवृति मार्ग के घनीभूत द्वंद्व का ही चित्रण किया है।

मोहन राकेश जी ने नाटक में यह दिखाया है कि जीवन में भोग कुछ समय के लिए आकृष्ट तो करता है किन्तु अंत में वह अपना महत्व खो देता है।

इस नाटक में इतिहास और कल्पना का सुन्दर समन्वय है। इस नाटक में तीन अंक और दृश्य भी तीन है।

आषाढ़ का एक दिन

आषाढ़ का एक दिन नाटक की कथानक:

      अषाढ़ का एक दिन नाटक की कथावस्तु संस्कृत के प्रसिद्ध कवि नाटककार कालिदास जो कश्मीर के शासक के रूप में मातृगुप्त के रूप में प्रसिद्ध हुए की कहानी है। मल्लिका और कालिदास के प्रेम को आधार बनाकर नाटककार मोहन राकेश जी ने यथार्थ और भावना के द्वंद्व को दिखाया है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि जीवन में भावना का स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण होता है, लेकिन जीवन तो यथार्थ में ही जीना होता है।

      यह एक त्रिखंडीय नाटक है। पहले खंड में युवक कालिदास हिमालय में स्थित अपने गाँव में शांतिपूर्ण जीवन गुजार रहें थे और अपनी कला को विकसित कर रहे थे। वहीँ पर उन्हें एक युवती मल्लिका के साथ प्रेम संबंध है। नाटक का दृश्य बदलता है, जब वहाँ से दूर उज्जयनी के कुछ दरबारी कालिदास से मिलते हैं और उसे सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार में चलने के लिए कहते हैं। कालिदास असमंजस में पड़ जाते हैं। एक तरफ उनका सुन्दर, शान्ति से भरा गाँव का जीवन है और दूसरी तरफ उज्जयनी के राजदरबार में प्रश्रय पाकर महानता पाने का अवसर। 

       कथा का आरंभ अषाढ़ के पहले दिन की वर्षा से होता है। मल्लिका कालिदास की भावनात्मक धरातल पर सच्चा और पवित्र प्रेम करती है। और वह उन्हें महान होते हुए भी देखना चाहती है। वह उन्हें उज्जयनी जाने की राय देती है। कालिदास भारी मन से उज्जयनी चले जाते हैं। उसकी माँ अंबिका कहती है कि जीवन में यथार्थ की पूर्ति भावना मात्र से नहीं हो सकती है। कालिदास उज्जयनी में राज कवि के रूप में बुलाये जाते हैं। आचार्य वररुचि उन्हें लेने के लिए आते हैं।

       नाटक के दूसरे खण्ड में पता चलता है कि कालिदास की कीर्ति बढ़ती जाती है। उनका विवाह राजकन्या प्रियंगु मंजरी से हो जाता है। गाँव में मल्लिका दुखी और अकेले रह रही थी। उनको काश्मीर का राजा बनाया जाता है। अब वे कालिदास से मातृगुप्त बन जाते है। कालिदास और प्रियंगु मंजरी कश्मीर जाते हैं। वहाँ वे मल्लिका के गाँव में आते हैं, लेकिन कालिदास मल्लिका से नहीं मिलते हैं प्रियंगुमंजरी ही मल्लिका के घर जाकर उससे मिलती है। वह मल्लिका से सहानुभूति जताती है और कहती है कि वह उसे अपने सखी बना लेगी और उसका विवाह किसी राजसेवक के साथ करवा देगी। मल्लिका साफ़ इनकार कर देती है।

       नाटक के तृतीय और अंतिम खण्ड में कालिदास गाँव में अकेले ही आता है। यह खबर मल्लिका को मिलती है कि कालिदास को कश्मीर का राज्यपाल बना दिया गया है लेकिन वह सबकुछ त्याग कर यहाँ आ गया है। समय का चक्र चलता है। मल्लिका की माँ की मृत्यु हो जाती है। मल्लिका की विवशता उसे ग्राम पुरुष विलोम के जाल में फ़सा देती है। निसहाय मल्लिका की शादी विलोम के साथ हो चुकी है और उसकी एक पुत्री है। कालिदास मल्लिका से मिलने आता है लेकिन मल्लिका के जीवन की इन सच्चाइयों को देख कालिदास निराश होकर चला जाता है। नाटक इसी जगह समाप्ति पर पहुँचता है।

       यह नाटक दर्शाता है कि कालिदास के महानता पाने के लिए कालिदास और माल्लिका को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। जब कालिदास मल्लिका को छोड़कर उज्जयनी में बस जाता है, तब उसकी ख्याति और उसका रुतवा तो बढ़ जाता है लेकिन उसकी सृजनशक्ति चली जाती है। उसकी पत्नी प्रियंगुमंजरी इस प्रयास में जुटी रहती है कि उज्जयनी में भी कालिदास के इर्द-गिर्द उसके गाँव जैसा ही वातावरण बना रहे, लेकिन वह स्वयं मल्लिका नहीं बन पाती है।

नाटक के अंत में जब कालिदास की मल्लिका से अंतिम बार बात होती है तब वह मानता है कि “तुम्हारे सामने जो आदमी खड़ा है, यह वह कालिदास नहीं है जिसे तुम जानती थी।”  

Monday, October 9, 2023

जो साथ न मेरा दे पाए, उनसे कब सूनी हुई डगर?

मृत्यु सत्य है ये जानते हुये भी हर व्यक्ति यहॉं रहने का पुरा व्यवस्था कर रहा है। कुछ चीजें सच में भगवान करते है श्रेय हमें मिल जाता है। मेरे मां - पिता को कैंसर था मौत कैंसर से हुई। एक कैंसर घर तोड़ देता है यहां दोनों को हो गया। बिमारी किसे हो, नहीं कहा जा सकता। दुर्गापूजा के समय ही मां को कैंसर हुआ है ये पता चला। पूजा को लेकर जितनी अच्छी स्मृतियाँ थी धूमिल हो गयी। पूजा के समय रोड़ बजार भरा-भरा रहता हो लेकिन अस्पताल खाली रहता है। प्रायः सभी डाक्टर घुमने बाहर चले जाते है। कोई अच्छा डाक्टर नहीं मिला। मां की परेशानी बढ़ती जा रही थी लेकिन हिम्मती थी। जो मेरी मां से मिले होंगे उसके हिम्मतीपन को जानते होंगे। कैंसर जैसे बड़ी बिमारी भी हमलोगों से छुपा कर रखी थी। खुद डाक्टर के पास जाती टेस्ट कराती और हमें कुछ नहीं बताती। मां को कैंसर है ये बात डायग्नोस्टिक सेंटर वाले एक मित्र ने बताया या बुरी तरह से फटकारते हुये कहा कि इतना व्यस्त हो कि मां को कैंसर है और उनके साथ कोई आता भी नहीं है।ये शब्द सुनने के बाद रोम रोम कांप गया। घर गया रिपोर्ट देखने लगा मां समझ गयी और रोने लगी। कैंसर उसका हिम्मत नहीं तोड़ पाया लेकिन संतान को तकलीफ होगा, यह बात उसे अंदर से तोड़ दिया। पिता के बिमारी और पैसे खर्च को जानती थी। उसका कष्ट बिमारी नहीं था उसको तकलीफ इस बात का था कि मेरे वजह से मेरे बच्चों को तकलीफ होगा। टाटा मेडिकल में भर्ती कराया गया नहीं बच पायी। तीन दिन में ही मर गयी। बहुत तकलीफ नहीं दी मरते हुये भी बचा गयी। टाटा से ही सफर शुरू हुआ। मां के मरने के बाद भी टाटा से रिश्ता रहा। भगवान ने निमित्त बना लिया मुझे.... इस बार भी कैंसर के लिये हमें बड़ा मदद मिला है और हम टाटा के साथ मिलकर मरीजों के लिये कुछ कर पायेंगे। भगवान को धन्यवाद.... इस लायक बनाने के लिये। मां के समय मेडिकल प्रबंधन को यह बात अच्छी लगी थी कि आपके साथ इतने लोग है। वो लोग आज भी है..... समाज में हम गिलहरी प्रयास कर रहें है.....दुख बीत जाने के बाद लोग समान्य जीवन में रम जाते है। उन्हें दूसरे के दुख से कोई लेना-देना नहीं रहता। 

धन की भाषा कल भी नहीं समझ पाता और आज भी नहीं। इसलिए बहुत जगह अनफिट हो जाता हूँ। अब लगता है कि प्रभु ने दुख नहीं दिया बल्कि हिम्मती बनाया है।

पूरे घटना क्रम को जब जब सोचता हू शिवमंगल सिंह की कविता याद आती है...... 

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,


उस-उस राही को धन्यवाद।

जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं,
सीमित पग-डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं।
दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रमाद
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
उस-उस राही को धन्यवाद।

साँसों पर अवलम्बित काया, जब चलते-चलते चूर हुई,
दो स्नेह-शब्द मिल गए, मिली नव स्फूर्ति, थकावट दूर हुई।
पथ के पहचाने छूट गए, पर साथ-साथ चल रही याद 
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
उस-उस राही को धन्यवाद।

जो साथ न मेरा दे पाए, उनसे कब सूनी हुई डगर?
मैं भी न चलूँ यदि तो भी क्या, राही मर लेकिन राह अमर।
इस पथ पर वे ही चलते हैं, जो चलने का पा गए स्वाद 
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
उस-उस राही को धन्यवाद।

कैसे चल पाता यदि न मिला होता मुझको आकुल अन्तर?
कैसे चल पाता यदि मिलते, चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर।
आभारी हूँ मैं उन सबका, दे गए व्यथा का जो प्रसाद 
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
उस-उस राही को धन्यवाद।

Thursday, September 28, 2023

मजदूरी और प्रेम

मजदूरी और प्रेम सरदार पूर्ण सिंह का एक प्रसिद्ध निबंध है जिसमें निरंतर कर्म करते रहने की प्रेरणा दी गई है। यह प्रेम प्रेरक निबंध है। इस निबंध में सर्वप्रथम लेखक ने हल चालने वाले किसान के जीवन को प्रस्तुत करते हुए उसे स्वभाव से साधु, त्यागी एवं तपस्वी बतलाया है। खेत उसकी यज्ञशाला है और वह अपने जीवन को तपाते हुए अपनी मेहनत के कणों को ही फसल के रूप में उगाता है। खेती ही उसके ईश्वरीय प्रेम का केन्द्र है। उसका सारा जीवन पत्ते-पत्ते, फूल एवं फल-फल में बिखरा हुआ है। खेती की हरियाली ही उसकी खुशी है। 

लेखक ने गडरिये के पवित्र जीवन का निरूपण करते हुए लिखा है कि किस तरह वह खुले आकाश में बैठा ऊन कातता रहता है और उनकी भेड़ें चरती रहती हैं। उसकी आँखों में प्रेम की लाली छाई रहती है और प्रकृति के स्वच्छ वातावरण में जीवन व्यतीत करता हुआ सदैव स्वस्थ रहता है। वह खुली प्रकृति में जीवन-यापन करता है। उसके बच्चे भी अत्यंत शुद्ध हृदय वाले हैं। लेखक ने ‘मजदूर की मजदूरी’ का उल्लेख करते हुए यह स्पष्ट किया है कि जो मजदूर कठिन परिश्रम करके सारे दिन काम करता है, उसे हम उसके परिश्रम के अनुकूल मजदूरी नहीं देते। यदि कोई अनाथ एवं विधवा स्त्री सारी रात बैठकर किसी कमीज को सीती है और सीते-सीते थक जाती है किंतु, पैसों के लोभ में सोती नहीं, अपितु उसे सी कर ही चैन की सांस लेती है, तो उसके इस अटूट परिश्रम की मजदूरी भला थोड़े पैसों से कैसे चुकाई जा सकती है? वास्तव में ऐसा परिश्रम प्रार्थना, संध्या या नमाज से कम नहीं है। मनुष्य के हाथ से बनी हुई वस्तुओं में निश्चय ही उसकी प्रमे मय पवित्र आत्मा निवास करती है। हाथ से जो परिश्रम किया जाता है, उसमें एक अद्भुत रस होता है, जीवन रहता है उसके हृदय का प्रेम रहता है, मन की पवित्रता रहती है, आभा एवं कान्ति रहती है। ‘मजदूरी और कला’ का निरूपण करते हुए लेखक ने मशीनों के प्रयोग की भर्त्सना की है और उन्हें मजदूरी की मजदूरी छीनने वाली बताया है। लेखक तो मशीनों के स्थान पर मजदूरी के हाथ से होने वाले काम को महत्व देता है, क्योंकि मशीने निकम्मा और अकर्मण्य बना देती है। हाथ से काम करने से मनुष्य सदैव परिश्रमी, उद्योग एवं पवित्र रहता है। 

मजदूरी और फकीरी का वर्णन करते हुए लेखक ने इन्हें मानव के विकास के लिए परमावश्यक बतालया है। बिना परिश्रमी के फकीरी व्यर्थ है और बुद्धि शिथिल पड़ जाती है। अतः किसी को भी भीख माँगना उचित नहीं, अपितु परिश्रम करके खाना चाहिए। ‘समाज का पालन करने वाली दूध की धारा’ का वर्णन करते हुए लेखक ने परिश्रम एवं हाथ से काम करने की प्रवृत्ति एक ऐसी पवित्र दूध की धारा बताया जो मानव के हृदय को पवित्र बनाती हुई इसे सच्चे ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। ‘पश्चिम सभ्यता के एक नये आदर्श’ का वर्णन करते हुए लेखक ने पाश्चात्य देशों में उस नये मोड़ की ओर संकेत किया है, जिसके फलस्वरूप पश्चिम में अब लोग मशीन की अपेक्षा मजदूरी को महत्व देने लगे हैं। मशीनों के कारण पजूंपति पनपा है और मजदूर दरिद्र हुआ है। अन्त में लेखक यही सलाह देता है कि जड़ मशीनों की पूजा छोड़कर सचेतन मजदूरों को गले लगाना चाहिए उन्हें महत्व देना चाहिए, क्योंकि इसी से मानव का कल्याण होगा और समाज समृद्ध होगा, खुशहाल होगा।

Wednesday, September 27, 2023

हिंदी गद्य के उद्भव और विकास

हिंदी गद्य के उद्भव और विकास

हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य पर भी पड़ा। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेज़ी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढ़ा और जीवन में बदलाव आने लगा। भावना के साथ-साथ विचारों को पर्याप्त प्रधानता मिली। पद्य के साथ-साथ गद्य का भी विकास हुआ और छापखाना के आते ही साहित्य के संसार में एक नयी क्रांति हुई।

      हिंदी गद्य के संबंध में आरंभ के विद्वान एकमत नहीं है। कुछ इसका आरंभ 10वीं शताब्दी मानते हैं तो कुछ 11वीं शताब्दी और कुछ 13वीं शताब्दी। राजस्थानी एवं ब्रज भाषा में हमें गद्य के प्राचीनतम प्रयोग मिलते हैं। राजस्थानी गद्य की समय सीमा 11वीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी तथा ब्रज गद्य की सीमा 14वीं शताब्दी से 16वीं शताब्दी तक मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि 10वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी के मध्य ही हिंदी गद्य की शुरुआत हुई थी। खड़ी बोली के प्रथम दर्शन अकबर के दरबारी कवि गंग द्वारा रचित ‘चंद छंद बरनन’ की महिमा में मिलता है।

हिंदी गद्य साहित्य का विकास-

      शैली की दृष्टि से साहित्य के दो भेद हैं- गद्य और पद्य। गद्य वाक्यबद्ध, विचारात्मक रचना है और पद्य छंदबद्ध/लयबद्ध भावात्मक रचना है। गद्य में बौद्धिक चेष्टाएँ और चिंतनशील मनःस्थितियाँ अपेक्षाकृत सुगमता से व्यक्त की जा सकती हैं, जबकि पद्य में भावपूर्ण मनःस्थितियों की अभिव्यक्ति सहज होती है। पद्य में संवेदना और कल्पना की प्रमुखता होती है और गद्य में विवेक की। इसी कारण पद्य को हृदय की भाषा और गद्य को मस्तिष्क की भाषा कहते हैं।

      ‘गद्य’ शब्द का उद्भव ‘गद्’ धातु के साथ ‘यत्’ प्रत्यय जोड़ने से हुआ है। ‘गद्’ का अर्थ है- बोलना, बताना या कहना। विषय और परिस्थिति के अनुरूप शब्दों का सही स्थान निर्धारण तथा वाक्यों की उचित योजना ही गद्य की उत्तम कसौटी है। इसलिए गद्य में अनेक विधाओं का समावेश है।

      गद्य की प्रमुख निम्नलिखित विधाएँ हैं- निबंध, नाटक, कहानी, संस्मरण, एकांकी, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, यात्रावृत्त, जीवनी, डायरी, पत्र, भेंटवार्ता आदि। आरंभ में अनेक विधाओं  को कहानी, निबंध आदि के साथ ही सम्मिलित कर लिया जाता था। किन्तु 19वीं शताब्दी के चौथे दशक से इनका स्वतंत्र अस्तित्व परिलक्षित होने लगा।


राष्ट्रभाषा के रूप में मानक हिन्दी खड़ी बोली का ही परिनिष्ठित रूप है। खड़ी बोली गद्य की प्रामाणिक रचनाएँ सत्रहवीं शताब्दी से प्राप्त होती है। इसका प्रमाण जटमल कृत “गोरा बादल” की कथा है। प्रारंभिक गद्य खड़ी बोली ब्रजभाषा से प्रभावित है। ब्रजभाषा के प्रभाव से मुक्त खड़ी बोली गद्य का आरम्भ उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ। खड़ी बोली गद्य का एक रूप “दक्खिनी गद्य” का है। मुस्लिम शासकों के समय, विशेषकर मोहम्मद तुगलक के शासन काल में अनेक उत्तर के मुसलमान दक्षिण में जाकर बस गए थे। ये अपने साथ उत्तर की खड़ी बोली को दक्षिण ले गए। इससे वहाँ “दक्खिनी हिन्दी” का विकास हुआ। दक्खिनी खड़ी बोली गद्य का प्रामाणिक रूप 1580 ई. से प्राप्त होता है। लगभग अठारहवीं सदी के मध्य काल से लेकर बीसवीं सदी के मध्य काल तक (सन् 1785 से 1843 ई.)।

खड़ी बोली गद्य के प्रारंभिक स्वरूप के उन्नयन में चार लेखकों का योगदान महत्त्वपूर्ण है- 

पंडित लल्लू लाल (सन् 1763-1825 ई.)

* ये फोर्ट विलियम कॉलेज में भाखा मुंशी पद पर नियुक्त थे। इन्होंने ‘भागवत’ के ‘दशम स्कंध’ की कथा के आधार पर ‘प्रेमसागर’ की रचना की।

* ये आगरा के गुजराती ब्राहमण थे। इसकी भाषा पर ब्रज का प्रभाव था।

द्विवेदी जी के शब्दों में- “इस ब्रजरंजित खड़ी बोली में भी वह सहज प्रभाव नहीं है जो सदासुखलाल की भाषा में है।” शुक्ल जी के दृष्टि में इनकी भाषा “नित्य व्यवहार के अनुकूल नहीं है। ये ‘उर्दू’ भाषा को ‘यामिनी’ भाषा कहते थे और उससे दूर रहने की सलाह देते थे। ग्रियर्सन के अनुसार ‘प्रेमसागर’ की भाषा हिंदी गद्य की स्टैंडर्ड बनी।

‘लालचंद्रिका’ की भूमिका में लल्लूलाल ने अपने ग्रंथ की भाषा के तीन भेद बताएँ हैं- ब्रज, खड़ीबोली और रेख्ते की बोली।

पंडित सदल मिश्र (सन् 1767-1848 ई.)

      ये बिहार के रहनेवाले थे। लल्लूलाल की तरह ये भी भाखा मुंशी पद पर थे। इन्होंने  ‘नासिकेतोपाख्यान’ की रचना की। ‘नासिकेतोपाख्यान’ पर ब्रज और भोजपुरी का प्रभाव है। किन्तु यह सीधे संस्कृत होने के कारण हिंदी के प्रकृति के अनुरूप है। शुक्ल जी ने इनकी भाषा को साफ़ सुथरी और व्यवहारोपयोगी कहा है। इनकी भाषा में पूर्वीपन और पंडिताऊपन है। आधुनिक हिंदी गद्य का जो आभास ‘सदासुखलाल’ और ‘सदल मिश्र’ की भाषा में दिखाई देता है उसी का आगे विकास हुआ।    


मुंशी सदासुखलाल ‘नियाज’ (सन् 1746-1824 ई.)

      मुंशी सदासुखलाल ने ‘विष्णु पुराण’ का अंश लेकर उसे खड़ी बोली में प्रस्तुत किया। इनकी भाषा शैली में पंडिताऊपन और वाक्य रचना पर फारसी शैली का प्रभाव था। ये फोर्ट विलियम कॉलेज के बाहर के लेखक थे। ये उर्दू और फ़ारसी के अच्छे लेखक और कवि थे। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार- “इनकी भाषा कुछ निखरी हुई और सुव्यवस्थित है, पर तत्कालीन प्रचलित पंडिताऊ प्रयोग भी इनमे मिल जाते हैं।” ‘सुखसागर’ के अतिरिक्त विष्णुपुराण के प्रसंगों के आधार पर मुंशी सदासुखलाल ने एक अपूर्ण ग्रंथ की भी रचना की थी। इनकी भाषा में ‘सहजता’ और ‘स्वाभाविकता’ है।

      मुंशी इंशा अल्ला खाँ (सन् 1735- 1818 ई.)

मुंशी इंशाअल्ला खाँ ने चटपटी हास्य प्रधान शैली में उदयभान चरित/ रानी केतकी की कहानी लिखी। कहानी लिखने का कारण स्पष्ट करते हुए मुंशी जी ने लिखा है- ‘एक दिन बैठे-बैठे यह ध्यान आया कि कोई ऐसी कहानी कहिए जिसमे हिंदवी छुट और किसी बोली का पुट न मिले, तब जाके मेरा जी फूल की कली के रूप में खिले। बाहर की बोली और गँवारी कुछ उसके बीच में न हो, बस जैसे भले लोग अच्छों से आपस में बोलते-चालते हैं, ज्यों का त्यों वही सब डौल रहे और छाँव किसी की न हो यह नहीं होने का।”

राजा शिवप्रसाद सितारे-ए-हिन्द (1823- 1895 ई.)

      राजा शिवप्रसाद ‘सितारे’ हिंदी विभाग में निरीक्षक के पद पर थे। ये हिंदी के प्रबल पक्षधर थे। इसलिए इसे ये पाठ्यक्रम की भाषा बनाना चाहते थे। चूकी उस समय साहित्य के पाठ्यक्रम के लिए कोई भी पुस्तक नहीं थी इसलिये उन्होंने स्वयं कोर्स की पुस्तकें लिखी और उसे हिंदी पाठ्यक्रमों में स्थान दिलवाया। इन्हीं के प्रयत्नों से शिक्षा जगत में हिंदी कोर्स की भाषा बनी। इसके बाद उन्होंने बनारस से ‘बनारस अखबार’ निकाला। इसी अखबार के द्वारा राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द ने हिंदी का प्रचार-प्रसार किया। ये हिंदी में विशुद्ध लेख लिखते थे। इन्होंने हिंदी कोर्स की पुस्तकों के लिए पंडित श्रीलाल और पंडित बंशीधर को भी इस कार्य के लिए प्रेरित किया। इसके अतिरिक्त इन्होंने ‘वीरसिंह का वृतांत’ आलसियों का कोड़ा जैसी रचनाओं का सृजन किया। इनकी गद्य भाषा प्रभावशाली और सरल थी। इसका उदहारण “राजा भोज का सपना” में इस प्रकार है- “वह कौन सा मनुष्य है जिसने महाप्रतापी राजा भोज का नाम न सुना हो। उनकी महिमा और कीर्ति तो सारे जगत में व्याप्त रही है। बड़े-बड़े महिपाल उनका नाम सुनते ही काँप उठते और बड़े-बड़े भूपति उसके पाँव पर अपना सिर नवाते।”  राजा जी उर्दू के पक्षपाती थे। उन्होंने 1864 ई. में “इतिहास तिमिर नाशक” ग्रंथ लिखा।

राजा लक्षमणसिंह (1887-1956 ई.)

      राजा लक्षमणसिंह आगरा के निवासी थे। इन्होंने हिंदी और उर्दू को दो भिन्न-भिन्न भाषाओँ के रूप में स्वीकार किया था। ये हिंदी उर्दू शब्दावली प्रधान गद्य भाषा का प्रयोग करते थे। राजा लक्षमणसिंह ने कालिदास के मेघदूतम, अभिज्ञान शाकुन्तलम् और रघुवंश का हिंदी अनुवाद किया। इन्होंने हिंदी गद्य विकास के लिए 1841 ई. में ‘प्रजा हितैसी’ पत्र भी संपादित और प्रकाशित किया। इनकी गद्य भाषा उत्कृष्ट थी। उदाहरण के लिए ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ का अनुदित गद्य है- “अनसूया (हौले प्रियबंदा से) सखी मैं तो इसी सोच विचार में हूँ। अब इससे कुछ पूछूँगी। (प्रकट) महात्मा तुम्हारे मधुर वचनों के विश्वास में आकार मेरा जी यह पूछने को चाहता है कि तुम किस राजवंश के भूषण हो और किस देश की पूजा को विरह में व्याकुल छोड़कर यहाँ पधारे हो? क्या कारण है? (हिंदी साहित्य का इतिहास- आचार्य रामचंद्र शुक्ल पृष्ठ-300)।

      राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द और राजा लक्षमण सिंह के अलावा और अनेक प्रतिभाशाली लेखकों ने हिंदी गद्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अनेक गद्य लेखकों ने अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किए और पाठ्य पुस्तकें लिखी। उनमे श्री मथुराप्रसाद मिश्र, श्री ब्रजवासी दास, श्री रामप्रसाद त्रिपाठी, श्री शिवशंकर, श्री बिहारीलाल चौबे, श्री काशीनाथ खत्री, श्री रामप्रसाद दूबे आदि प्रमुख थे। इसी समय स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ जैसे ग्रंथ की हिंदी गद्य में रचना कर हिन्दू धर्म की कुरीतियों को समाप्त किया। बाबू नवीन  चंद्रराय ने 1863-1880 ई. के मध्य हिंदी के विभन्न विषयों की पुस्तकें लिखी और लिखवाई। इसी तरह श्रद्धानंद फुल्लौरी ने सत्यमृत प्रवाह, आत्म चिकत्सा, तत्वदीपक, धर्मरक्षा, उपदेश संग्रह, आदि पुस्तकें लिखकर हिंदी गद्य के विकास में नयी दिशा प्रदान की।                

      इन लेखकों के कुछ समय पहले रामप्रसाद निरंजनी ने ‘भाषा योगवशिष्ठ’ में तथा मध्यप्रदेश के पं. दौलतराय साधु थे। उनहोंने अपनी रचनाओं में खड़ी बोली गद्य का प्रयोग किया था। इन्हीं दिनों ईसाई मिशनरी ने भी बाइवल का हिन्दी खड़ी बोली गद्य में अनुवाद कराकर हिन्दी गद्य के विकास में अपना योगदान दिया। किन्तु उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण तक हिन्दी गद्य का स्वरूप पूर्णतः परियोजित नहीं हो पाया था। उन्नीसवीं शताब्दी का द्वितीय एवं तृतीय चरण भारतीय सामाजिक एवं राष्ट्रीयता के जागरण का काल था। इस नवीन चेतना का अभ्युदय बंगाल से हुआ। यहीं से समाचार पत्रों के प्रकाशन का प्रारंभ हुआ। यह प्रदेश ब्रजभाषा से दूर था इसलिए नवीन चेतना को अभिव्यक्त करने का भार खड़ी बोली पद्य को वहन करना पड़ा। नवीन चेतना के इस जागरण काल में अनेक संस्थाओं का योगदान था। इनमें प्रमुख थीं- ब्रह्मसमाज, रामकृष्ण मिशन, प्रार्थना समाज, आर्यसमाज, थियोसाफिकल सोसायटी इत्यादि। इन संस्थाओं में विशेषकर आर्यसमाज ने अपने विचारों के प्रचार-प्रसार का माध्यम हिन्दी गद्य को बनाया।


हिंदी गद्य के विकास को सोपानों में विभक्त किया गया है-

भारतेंदु पूर्व युग (1800-1850 ई.)

भारतेंदु युग 1850-1900 ई.

द्विवेदी युग (1900-1920 ई.)

शुक्ल युग (1920-1936 ई.)

अद्यतन (1936 ई. से आजतक

भारतेन्दु पूर्व युग (1800 -1850 ई.)

      हिंदी में गद्य का विकास 19वीं शताब्दी के आसपास से माना जाता है विकास के इस काल में कलकाता फोर्ट विलियम कॉलेज की महत्वपूर्ण भूमिका रही इस कॉलेज के दो विद्वान लल्लूलाल तथा सदल मिश्र ने गिलक्रिस्ट के निर्देशन में प्रेमसागर तथा नासिकेतोपाख्यान नामक दो पुस्तके तैयार की। इसी समय सदासुख लाल ने सुखसागर तथा मुंशी इंशाअल्लाह ने रानी केतकी की कहाणी की रचना की। इन सभी ग्रंथों की भाषा में उस समय के प्रयोग में आने वाली खड़ी बोली को स्थान मिला। आधुनिक खड़ी बोली गद्य के विकास में विभिन्न धर्मों की पुस्तकों का खूब सहयोग रहा जिसमे ईसाई धर्म का भी सहयोग था। बंगाल के राजा राममोहन राय ने 1815 ई. में वेदांतसूत्र का हिंदी अनुवाद कर प्रकाशित करवाया इसके बाद उन्होंने 1829 ई. में बंगदूत नाम का पत्र हिंदी में निकाला। इसके पहले 1826 ई. में कानपुर के पंडित जुगलकिशोर हिंदी पहला समाचार पत्र उदंतमार्तंड कलकाता से निकाला। आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश हिंदी में लिखा।  

भारतेन्दु युग (1850 -1900 ई.)

      भारतेन्दु जी के पूर्व हिन्दी गद्य में दो शैलियाँ प्रचलित थीं। प्रथम राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद की 1823 से 1895 गद्य शैली थी। वे हिन्दी को नफीस बनाकर उसे उर्दू जैसा रूप प्रदान करने के पक्षधर थे। दूसरी शैली के प्रवर्तक राजा लक्ष्मणसिंह थे जो हिंदी को अधिकाधिक संस्कृतनिष्ठ करने के पक्षधर थे। भारतेंदु ने इन दोनों के बीच का मार्ग ग्रहण कर उसे हिंदी भाषा प्रदेशों की जनता के मनोनुकूल बनाया। लोक प्रचलित शब्दावली के प्रयोग के कारण भारतेन्दु जी का गद्य व्यावहारिक, सजीव, और प्रवाहपूर्ण है। बालकृष्ण भट्ट, पं. प्रताप नारायण मिश्र, राधाचरण गोस्वामी, बदरी नारायण चौधरी “प्रेमधन”, ठाकुर जगमोहन सिंह, राधाकृष्ण दास एवं किशोरी लाल गोस्वामी भारतेंदु जी के सहयोगी एवं समकालीन लेखक थे।

पं. बालकृष्ण भट्ट इलाहाबाद से “हिन्दी प्रदीप” नामक मासिक पत्र निकालते थे। उनकी शैली विनोदपूर्ण और चुटीली थी तथा इसमें व्यंग्य में सरसता के साथ मार्मिकता भी है। उन्होंने अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत तथा लोक भाषा के शब्द लिए। उनके निबंधों के विषय में विविधता थी। प्रतापनारायण मिश्र ने “ब्राम्हण” पत्रिका के माध्यम से हिन्दी गद्य साहित्य को समृद्ध करने का प्रयास किया। उन्होंने समाज सुधार एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान की दृष्टि से निबंध लिखे। चुलबुलापन, हास-परिहास, आत्मीयता और सहजता उनकी भाषा शैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं। बदरी नारायण चौधरी “प्रेंमधन” “आनंद कादम्बिनी” पत्रिका का संपादन करते थे। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ तथा शैली काव्यात्मक है। श्री राधाचरण गोस्वामी, ठाकुर जगमोहन सिंह ने सामयिक समस्याओं पर निबंध लिखे।

द्विवेदी युग (1900-1920 ई.)

      भारतेन्दु युग में हिंदी गद्य का स्वरूप काफी हद तक निखरा किंतु अभी भी उसमें परिष्कार परिमार्जन की आवश्यकता थी। यह कार्य द्विवेदी युग में पूरा हुआ। इस काल का नामकरण पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर किया गया। द्विवेदी जी ने “सरस्वती” के माध्यम से व्याकरणनिष्ठ, स्पष्ट एवं विचारपूर्ण गद्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। उन्होंने तत्कालीन भाषा का परिमार्जन कर उसे व्याकरण-सम्मत रूप प्रदान किया और साहित्यकारों को विविध विषयों पर लेखन के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित किया।

द्विवेदी युग के प्रमुख गद्यकारों में श्री माधव मिश्र, गोविंद नारायण मिश्र, ‘पद्मसिंह शर्मा, सरदारपूर्ण सिंह, बाबू श्यामसुंदर दास, मिश्र बंधु, बाबा भगवानदीन, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि हैं। इस काल में अनेक गंभीर निबंध, विवेचनापूर्ण आलोचनाएँ, कहानियाँ, उपन्यास तथा नाटक लिखे गये और इस प्रकार गद्य साहित्य के विविध रूपों का विकास हुआ।

      हिन्दी निबंध और आलोचना के क्षेत्र में बाबू श्यामसुंदर दास का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने “नागरी प्रचारिणी” सभा की स्थापना की तथा साहित्यिक, सांस्कृतिक भाषा एवं वैज्ञानिक विषयों पर निबंध लिखे। चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी ने अपनी पांडित्यपूर्ण व्यंग्य प्रधान शैली में निबंध और कहानियाँ लिखकर हिन्दी गद्य साहित्य को समृद्ध किया। सरस्वती के अतिरिक्त “प्रभा”, “मर्यादा”, “माधुरी”, “इन्दु”, “सुदर्शन”, “समालोचक”, आदि अन्य पत्रिकाओं में भी गद्य साहित्य के प्रचार एवं प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस युग के उत्तरार्ध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और बाबू गुलाबराय के आविर्भाव से हिंदी गद्य की विकासधारा को एक नई दिशा मिली।


शुक्ल युग (1920 – 1936 ई०)

      द्विवेदी युग नैतिक मूल्यों के आग्रह का युग था। जबकि इस युग में द्विवेदी युग की प्रतिक्रिया स्वरूप साहित्य में भाव-तरलता, कल्पना-प्रधानता और स्वच्छंद चेतना आदि भावनाओं का समावेश हुआ। परिणाम यह हुआ कि इस युग में रचित गद्य साहित्य अधिक कलात्मक, लाक्षणिक, कवित्वपूर्ण और अंतर्मुखी हो गया। इस युग के प्रमुख गद्यकारों में आचार्य रामचंद्र शुक्ल, बाबू गुलाबराय, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, रामकृष्ण दास, वियोगी हरि, डॉ. रघुवीर सिंह, शिवपूजन सहाय, वर्मा, पंत, निराला, नंददुलारे बाजपेयी, बेचन शर्मा ‘उग्र’ के नाम मुख्य हैं।

      आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने दो प्रकार के निबंध लिखे – ‘साहित्यिक’ एवं ‘मनोविकार’ संबंधी। उनके साहित्यिक निबंध भी दो वर्ग के हैं – ‘सैद्धांतिक’ तथा ‘व्यावहारिक’ समीक्षा से संबंधित। शुक्ल जी को युगांतकारी निबंधकार कहा जाता है। इसका श्रेय उनके मनोविकार संबंधी निबंधों को जाता है। गुलाबराय जी के कुछ निबंध साहित्यिक विषयों पर तथा कुछ सामान्य विषयों पर लिखे गए हैं। बख्शी जी के निबंध विचारात्मक, समीक्षात्मक तथा विवरणात्मक हैं।

अद्यतन युग (1936 से आजतक )

       इस काल में गद्य का चहुंमुखी विकास हुआ इस युग में मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित होकर लेखकों ने यथार्थवादी जीवन दर्शन को महत्व देना आरंभ किया। इस युग में साहित्यकारों की दो पीढ़ियाँ परिलक्षित की जा सकती हैं।

      प्रथम पीढ़ी उन साहित्यकारों की है जो स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व से लिखते आ रहे थे। इस पीढ़ी में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, शांतिप्रिय द्विवेदी, रामधारी सिंह दिनकर, यशपाल, उपेन्द्रनाथ अश्क, भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर, जैनेंद्र, अज्ञेय, रामवृक्ष बेनीपुरी, वासुदेव शरण अग्रवाल तथा भगवत शरण उपाध्याय आदि प्रमुख हैं।

      दूसरी पीढ़ी उन लेखकों की है जो स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद साहित्य सृजन में प्रवृत्त हुए हैं। इनमें श्री विद्या निवास मिश्र, हरिशंकर परसाई, कुबेरनाथ राय, फणीश्वरनाथ रेणु, धर्मवीर भारती, शिवप्रसाद सिंह के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। इस युग में हिन्दी गद्य साहित्य में नवीन कलात्मक गद्य विधाओं का विकास हुआ तथा उसे राष्ट्रीय गरिमा प्राप्त हुई। आज हिन्दी की यह स्थिति है कि उसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित मान्यता मिलने लगी है।


निष्कर्ष- हिंदी गद्य के विकास में भारतेंदु हरिश्चंद्र का विशेष योगदान है लेकिन भारतेंदु युग के पहले से ही हिंदी गद्य का आरंभ हो चूका था। आधुनिक काल हिंदी गद्य का सर्वांगीण विकास का काल है। इस युग में गद्य के सभी विधाओं का उद्भव हुआ। जिसके परिणाम स्वरुप हिंदी भाषा आज विश्व की भाषाओं में गिनी जाती है।