Thursday, July 9, 2026
शिक्षा का स्वप्न और भारत का भविष्य: फुले, गांधी, टैगोर और अंबेडकर के आलोक में.....
Tuesday, July 7, 2026
सरकारी विद्यालय: भारत की आशाओं का आँगन
सरकारी विद्यालय: भारत की आशाओं का आँगन
— प्रभात मिश्र
किसी सुबह यदि आप किसी सरकारी विद्यालय के प्रांगण में खड़े हों, तो आपको वहाँ केवल बच्चों की आवाज़ें नहीं सुनाई देंगी; वहाँ आपको भारत का भविष्य बोलता हुआ दिखाई देगा। कोई बच्चा फटी हुई कॉपी में अक्षर बना रहा होगा, कोई प्रार्थना में पूरे मन से स्वर मिला रहा होगा, कोई अपने मित्र के साथ टिफिन बाँट रहा होगा और कोई अपने शिक्षक से कोई नया प्रश्न पूछने का साहस जुटा रहा होगा। देखने में यह सब सामान्य लगता है, किंतु वास्तव में यही वे छोटे-छोटे दृश्य हैं जिनसे एक बड़े राष्ट्र का चरित्र निर्मित होता है।
आज सरकारी विद्यालयों की चर्चा प्रायः आँकड़ों, योजनाओं और कमियों के संदर्भ में होती है। कभी भवनों की कमी का उल्लेख होता है, कभी शिक्षकों की संख्या का, तो कभी परीक्षा परिणामों का। इन चर्चाओं का अपना महत्व है, लेकिन एक प्रश्न बार-बार मन में उठता है—क्या हमने कभी उन बच्चों की आँखों में झाँकने का प्रयास किया है, जिनके लिए विद्यालय केवल पढ़ने की जगह नहीं, बल्कि जीवन बदलने की संभावना है?
भारत का संविधान प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार देता है। यह अधिकार केवल विद्यालय तक पहुँचने का नहीं, बल्कि गरिमा के साथ सीखने, सोचने और अपने व्यक्तित्व को विकसित करने का अधिकार है। सरकारी विद्यालय इसी संवैधानिक संकल्प के सबसे बड़े वाहक हैं। वे समाज के उस वर्ग तक शिक्षा पहुँचाते हैं, जहाँ शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, बल्कि पीढ़ियों की नियति बदलने का माध्यम बन जाती है।
सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे साधारण परिवारों से आते हैं। उनके माता-पिता मजदूर, किसान, रिक्शा चालक, घरेलू कामगार, छोटे दुकानदार या असंगठित क्षेत्र के कर्मी होते हैं। उनके पास संपत्ति कम होती है, लेकिन अपने बच्चों के भविष्य के लिए विश्वास बहुत बड़ा होता है। वे जानते हैं कि यदि उनका बच्चा पढ़ जाएगा, तो उसका जीवन उनसे बेहतर होगा। यही विश्वास हर सुबह बच्चे को विद्यालय तक ले आता है।
लेकिन शिक्षा का अर्थ केवल पुस्तकें पढ़ लेना नहीं है। यदि शिक्षा मनुष्य को अधिक संवेदनशील, अधिक ईमानदार और अधिक उत्तरदायी नहीं बनाती, तो वह अधूरी रह जाती है। आज समाज में ज्ञान की कमी से अधिक मूल्यों का संकट दिखाई देता है। तकनीक ने सूचना को सहज बना दिया है, परंतु विवेक और करुणा आज भी शिक्षक और विद्यालय ही सिखा सकते हैं।
मुझे अनेक बार सरकारी विद्यालयों के बच्चों के बीच बैठने का अवसर मिला है। मैंने देखा है कि जिन बच्चों के पास संसाधन सबसे कम होते हैं, उनके भीतर सीखने की ललक अक्सर सबसे अधिक होती है। एक नई पुस्तक उनके लिए उत्सव होती है, शिक्षक की एक प्रशंसा उन्हें कई दिनों तक प्रेरित करती है और विद्यालय का छोटा-सा सम्मान उन्हें जीवनभर याद रहता है। इन बच्चों को देखकर विश्वास होता है कि अभाव प्रतिभा को रोक नहीं सकता; अवसरों का अभाव अवश्य उसे धीमा कर देता है।
सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए। संसाधनों की सीमाओं, प्रशासनिक दायित्वों और अनेक चुनौतियों के बीच भी हजारों शिक्षक निष्ठा के साथ अपना कार्य कर रहे हैं। वे केवल पाठ्यपुस्तक नहीं पढ़ाते, बल्कि बच्चों के भीतर आत्मविश्वास जगाते हैं। कई बार वे शिक्षक से अधिक अभिभावक, मार्गदर्शक और मित्र बन जाते हैं। समाज को ऐसे शिक्षकों की कहानियाँ भी उतनी ही प्रमुखता से सुनानी चाहिए जितनी कमियों की चर्चा करता है।
शिक्षा का प्रश्न केवल सरकार का प्रश्न नहीं है। समाज यदि विद्यालयों से दूर रहेगा, तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। प्रत्येक शिक्षित नागरिक, प्रत्येक साहित्यकार, प्रत्येक उद्योगपति, प्रत्येक पूर्व विद्यार्थी और प्रत्येक सामाजिक संस्था यदि वर्ष में कुछ समय भी किसी सरकारी विद्यालय के बच्चों के साथ बिताए, उन्हें पुस्तकें दे, उनसे संवाद करे, उनकी प्रतिभा को मंच दे, तो परिवर्तन की गति कई गुना बढ़ सकती है। राष्ट्र निर्माण साझी जिम्मेदारी से ही संभव है।
हिंदी के महान साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि साहित्य वही है जो मनुष्य को सुंदर बनाए। यही बात शिक्षा पर भी लागू होती है। शिक्षा वही है जो मनुष्य को अधिक मानवीय बनाए। यदि विद्यालय से निकलने वाला विद्यार्थी केवल सफल है, किंतु संवेदनशील नहीं, तो शिक्षा अपने उद्देश्य में सफल नहीं कही जा सकती।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सरकारी विद्यालयों को केवल सहायता का विषय न मानें, बल्कि सम्मान का विषय बनाएँ। हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारत की लोकतांत्रिक आत्मा इन विद्यालयों में सबसे अधिक दिखाई देती है। यहाँ जाति, धर्म, भाषा और आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर बच्चे एक साथ बैठते हैं। यही वह संस्कार है जो भविष्य के भारत को मजबूत बनाता है।
जब किसी सरकारी विद्यालय का बच्चा डॉक्टर बनता है, शिक्षक बनता है, वैज्ञानिक बनता है, सैनिक बनता है या साहित्यकार बनता है, तब उसकी सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होती; वह पूरे समाज की सफलता होती है। इसलिए सरकारी विद्यालयों में किया गया प्रत्येक निवेश वास्तव में भारत के भविष्य में किया गया निवेश है।
हमें बच्चों को यह विश्वास देना होगा कि उनकी पहचान उनके परिवार की आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उनके सपनों, परिश्रम और चरित्र से बनेगी। जिस दिन सरकारी विद्यालय का प्रत्येक बच्चा यह महसूस करेगा कि पूरा समाज उसके साथ खड़ा है, उसी दिन भारत की शिक्षा व्यवस्था एक नए युग में प्रवेश करेगी।
सरकारी विद्यालयों की घंटी केवल कक्षाएँ आरंभ होने की सूचना नहीं देती; वह हमें यह भी याद दिलाती है कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया हर दिन, हर कक्षा और हर बच्चे के साथ आगे बढ़ रही है। उन बच्चों की आँखों में जो प्रकाश है, वही भारत के भविष्य का वास्तविक उजाला है। उस उजाले को सुरक्षित रखना ही हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।
Wednesday, July 24, 2024
शिवरानी देवी : प्रेमचंद घर में
शिवरानी देवी : प्रेमचंद घर में
रचना – ‘प्रेमचंद घर में ‘1944 ई, (जीवनी विधा)
रचनाकार – शिवरानी देवी
* शिवरानी देवी ने ‘प्रेमचंद घर में’ नाम से प्रेमचंद की जीवनी लिखी। उन्होंने उनके व्यक्तित्व के उस हिस्से को उजागर किया जिससे लोग अनभिज्ञ थे।
* प्रेमचंद ने अपनी पत्नी को हमेशा प्रेरित किया कि वे लिखें और सामाजिक कार्यं में भी बढ़ा-चढ़कर हिस्सा लें। अपनी पत्नी के प्रति प्रेमचंद के मन में अगाध प्रेम और सम्मान था।
* जीवन के अंतिम क्षणों में भी उन्होंने साहित्य रचना का साथ नहीं छोड़ा था। पत्नी के प्रति उनका लागाव और भी बढ़ गया था।
* प्रेमचंद की जीवनी उनके बेटे (अमृतराय) ने ‘कलम का सिपाही’ नाम से’ और मदन गोपाल ने ‘कलम के मजदूर’ नाम से लिखी, जिसमे लेखक की अपनी कल्पनाएँ भी शामिल की होगी।
* शिवरानी देवी द्वारा लिखी गई इस जीवनी का हर घटना खरा सोना की तरह है, क्योंकि शिवरानी देवी ने उनके साथ उन पलों को खुद जिया और महसूस किया है।
* प्रेमचंद के व्यक्तित्व की साफगोई को जिस तरह से उनकी पत्नी ने बयान किया है वह हिंदी साहित्य प्रेमियों के लिए पठनीय है।
* शिवरानी देवी ने अनके साथ बिताए सुनहरे पलों को बड़े ही सहजता के साथ लिखा है उसे शायद ही अन्य साहित्यकार लिख पाता। उनके लेखन में भावनाओं का कहीं अभाव नहीं है और ना ही उनके प्रवाह में कोई कमी नजर आती है।
* शिवरानी देवी को इस बात का मलाल रहा कि वे अपने पति की महानता को मरणोपरांत समझ पाई।
* प्रेमचंद के पिता का नाम अजायबराय और माता का नाम आनंदी देवी था।
* प्रेमचंद को उनके पिता मुंशी धनपत राय तथा चाचा ने मुंशी नबावराय नाम दिया था।
* इन्होंने मर्यादा, हंस तथा जागरण पत्रिकाओं का संपादन किया
* इनका पहला उपन्यास ‘प्रेम’ को माना जाता है। किन्तु इस पुस्तक के अनुसार
* इनका पहला उपन्यास ‘कृष्णा’ है जो 1905 ई. में ‘प्रयाग’ से छपा था।
* दूसरा उपन्यास ‘प्रेमा’ को माना जाता है।
* प्रेमचंद के दो बेटे श्रीपतराय (धुन्न) तथा अमृतराय (बन्नू) थे।
* प्रेमचंद 1935 ई. में प्रगतिशील लेखक संघ के सभापति बने। उनहोंने महात्मा गाँधी के विचारों से प्रभावित होकर सेवा को मूल धर्म बनाया।
* शिवरानी देवी ने प्रेमचंद के संपूर्ण जीवन को इस पुस्तक में 88 भागों में दिखया है।
* पुस्तक की श्रद्धांजलि बनारसीदास चतुर्वेदी तथा आमुख शिवरानी देवी ने लिखा है।
* हिंदी साहित्य में प्रेमचंद की एक जीवनी ‘प्रेमचंद घर में’ (1944 ई.) है।
* दूसरी जीवनी उनके पुत्र अमृतराय ने ‘कलम का सिपाही’ (1962 ई.) लिखा था।
* तीसरी जीवनी ‘कलम का मजदूर’ (1954 ई.) में श्री मदन गोपाल (1919 -2009 ई.) ने लिखी है। मूल पुस्तक अंग्रेजी में लिखी गई थी बाद में श्री मदन गोपाल ने हिंदी में अनुबाद किया।
* प्रेमचंद की मृत्यु के बाद शिवरानी देवी का वह विलाप ह्रदय को छू लेता है कि जब-तक जो चीज हमारे पास रहती है तबतक हमें उसकी कद्र नहीं होती लेकिन वो हमसे ओझल हो जाए तो हमारा मन पछताता रहता है फिर हमारे पास दुःखी होने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता है।
Saturday, June 8, 2024
समास
रचना के आधार पर
Wednesday, June 5, 2024
SSC JHT
Wednesday, May 29, 2024
पत्रकारिता
ssc
Wednesday, March 6, 2024
बुलेट ट्रेन और आर्थिक विकास की संभावनाएं - एक परिचय
भारत की गिनती दुनिया के विकासशील देशों में होती है जोकि बीते कुछ सालों में विश्व की आर्थिक शक्ति के रुप में अपनी पहचान बनाने में सफल साबित हुए हैं। देश में फैली आधुनिकीकरण की लहर के चलते न केवल भारत का सामाजिक उत्थान हुआ है बल्कि आर्थिक बढ़ोतरी ने लोगों के जीवन स्तर को भी बेहतर बनाया है। हर गुजरते वर्ष के साथ देश में विकास एवं सुविधा के नए आयाम बनते जा रहे हैं, फिर चाहे वह रोज़गार के अवसर पैदा करने वाली स्वदेशी एवं विदेशी कंपनियां हो या फिर आवागमन को सुविधाजनक बनाने वाली बुलेट ट्रेन, जो आने वाले कुछ ही वर्षों में देश में दौड़ती नजर आएगी।
बुलेट ट्रेन परियोजना भारत की अब तक की सबसे बड़ी परियोजनाओं में से एक है। बुलेट ट्रेन के पहले चरण में इसे अहमदाबाद से मुम्बई मार्ग पर शुरु करने का फैसला लिया गया है, जिससे अहमदाबाद से मुम्बई के बीच की 508 कि.मी की दूरी को यात्री 320 कि.मी प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ने वाली बुलेट ट्रेन से मात्र 2 घंटे 7 मिनट में तय कर लेंगे।
मुम्बई से अहमदाबाद तक चलने वाली बुलेट ट्रेन कुल 12 स्टेशनों से होकर गुजरेगी, जिनमें साबरमती, अहमदाबाद, आनंद, वडोदरा, भरुच, सूरत, बिलिमोरा, वापी, बोईसर, विरार, ठाणे और बांद्रा कुरला कॉम्पलेक्स (मुंबई) शामिल है। परियोजना के अधीन इन सभी क्षेत्रों में विकासशील कार्य होंगे, जिससे न केवल औधोगिक विकास के नए अवसर पैदा होंगे बल्कि यह परियोजना इन क्षेत्रों में शैक्षिक एवं रोजगार, पर्यटन व बुनियादी सुविधाओं के ढांचे को भी बेहतर बनाने में कारगर साबित होगी।
चाहे वह मुंबई का बांद्रा कुरला कॉम्पलेक्स हो जो कि एक कॉर्पोरेट हब के रुप में जाना जाता है और जहां देश के कई बड़े सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों के मुख्यालय/ कार्यालय स्थित है या फिर सूरत का हीरा और कपड़ा उद्योग, बुलेट ट्रेन परियोजना के पूर्ण होने के उपरांत मुंबई - अहमदाबाद मार्ग पर होने वाली व्यावसायिक स्तर की यात्राओं के समय में कटौती आयेगी जिससे कि पैसे की बचत होगी I साथ ही एम् एम् आर डी ए (MMRDA) के अंतर्गत आने वाले बोइसर, विरार और ठाणे जहां 1500 के करीब मध्य स्तरीय उद्योग और लगभग 1800 लघु उद्योग चल रहे हैं और गुजरात राज्य के वापी, भरुच, वड़ोदरा, आनंद, और अहमदाबाद जहां खाद्य, फार्मास्यूटिकल एवं रासायनिक उद्योग अपने चरम पर है, वहां मेक इन इंडिया के तहत नए उद्योग विकसित होंगे जो भारत के सकल घरेलु उत्पाद (जी. डी. पी.) को ऊपर ले जाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे |
बुलेट ट्रेन परियोजना के अंतर्गत रूडसेट तथा अन्य शैक्षणिक संस्थाओं के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर परियोजना प्रभावित लोगों एवं उनके परिवार के लिए कौशल विकास के कार्यक्रम चलाये जा रहे है जिससे वह सभी लोग स्वरोजगार की ओर प्रेरित हो रहे है | मुंबई अहमदाबाद हाई स्पीड रेल कॉरिडोर के अधीन व्यापक स्तर पर कार्य चल रहे है जिसमे काफी बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर प्रदान किये जा रहें है |शैक्षणिक एवं चिकित्सिकिय सुविधाओं और संस्थानों में बढ़ोतरी होने से आय एवं रोजगार के नए अवसर मिलेंगे जो लोगों को आजीविका के नए साधन उपलब्ध कराएगी |
मुम्बई के पर्यटक स्थल जैसे गेटवे ऑफ इंडिया, नरीमन पॉइंट, कोलाबा कोस्वे और सिद्दी विनायक या फिर ठाणे की झीले, वडोदरा का लक्ष्मी विलास पैलेस या फिर भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री श्री सरदार वल्लभभाई पटेल को श्रद्धांजलि देती विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा स्टेचू ऑफ़ यूनिटी, सूरत का डुमस तट, एवं अहमदाबाद की कणिका झील हमेशा से ही पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहे है परन्तु यात्रा में लगने वाला समय कही न कही पर्यटन व्यवसाय को प्रभावित करता ही है | बुलेट ट्रेन परियोजना के आ जाने से मुंबई से अहमदाबाद की यात्रा को पर्यटक 3 घंटे से भी कम समय में पूरी कर, इन क्षेत्रों के पर्यटक स्थलों का भ्रमण सुविधापूर्वक और सरलता से कर पाएंगे, जो यहां के पर्यटन व्यवसाय के उत्थान के लिए फायदेमंद साबित होगा |
किसी भी परियोजना की सफलता या असफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह किस प्रकार परियोजना के आसपास के क्षेत्रों की आधारभूत संरचनाओं के विकास में योगदान करती है और मुंबई अहमदाबाद हाई स्पीड रेल परियोजना अभी से इस बात की पुष्टि करती है कि यह भारत की सफलतम परियोजनाओं में से एक है | परियोजना की शुरुआत से ही भूमि अधिग्रहण के लिए जिस प्रकार राजस्व विभाग द्वारा जारी की गयी सरकारी दरों (जंत्री दर) से ज्यादा अनुदान दिया गया और परियोजना प्रभावित लोगो की आर्थिक मदद करके उनको मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश की गयी, यह इस परियोजना की कुछ विशिष्टाओं में से एक है |
परियोजना के आरम्भ में ही व्यावसायिक और निजी भूमि पर निर्माण कार्यो में तेजी एवं बाजार मूल्यों में इजाफा इस बात की ओर संकेत करता है कि इस मार्ग पर आने वाले क्षेत्रों की आधारभूत संरचनाओं के विकास कार्यो में तेजी आएगी | यह परियोजना इन शहरों के विकास को नए चरम तक ले जाएगी। जिससे लोगों के जीवन में बुनियादी सुविधाओं की बेहतरी व बढ़ावा देखने को मिलेगा।
हाईस्पीड परियोजना केवल लोगों को आवागमन की एक बेहतर सुविधा ही नही देगी बल्कि इसके अंतर्गत उन क्षेत्रों का जमीनी विकास भी होगा, जिन्हे इस परियोजना का हिस्सा बनाया गया है। निर्माण कार्यों के साथ साथ यहां स्थित शिक्षण, चिकित्सा एवं अन्य संस्थान को इस परियोजना का लाभ मिलेगा। भारत की बुलेट ट्रेन परियोजना केवल दो राज्यों को ही नही जोड़ेगी, बल्कि यह दोनों राज्यों के व्यवसायों को भी बढ़ावा देगी। साथ ही परियोजना से पूर्व, परियोजना के दौरान व इसके पूर्ण होने के पश्चात सैंकड़ो लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से रोजगार मिलेगा। बुलेट ट्रेन की मदद से लोग कम समय में गुजरात व महाराष्ट्र के पर्यटक स्थलों तक पहुंच सकेंगे जोकि इस व्यवसाय के लिए काफी फायदेमंद साबित होगा। बहरहाल यह कहा जा सकता है कि बुलेट ट्रेन भारत में अद्भुत बदलाव लाएगी, जिसका लाभ आम लोगों को रोजगार, परिवहन सुविधा और व्यावसायिक विस्तार के रुप में होगा।
Thursday, January 18, 2024
नाटक एकांकी
Wednesday, November 22, 2023
रविदास जयन्ती पर विशेष-- अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी
रविदास जयन्ती पर विशेष-- अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी
Tuesday, October 31, 2023
आषाढ़ का एक दिन
नाटक की ऐतिहासिकता:
अपने दूसरे नाटक (“लहरों के राजहंस” 1963) की भूमिका में मोहन राकेश ने लिखा है- “मेघदूत पढ़ते समय मुझे लगा करता था कि वह कहानी निर्वासित यक्ष की उतनी नहीं है, जितनी स्वयं अपनी आत्मा से निर्वासित उस कवि की जिसने अपनी ही एक अपराध-अनुभूति को इस परिकल्पना में ढाल दिया हैं।”
इस प्रकार मोहन राकेश जी ने कालिदास की इसी निहित अपराध-अनुभूति को आषाढ़ का एक दिन का आधार बनाया है। इससे यह स्पष्ट होता है, कि जो कालिदास मेघदूत लिखे है, उन्ही के ऊपर यह नाटक है। और उन्ही की भावनाओं और विचारों को लेकर मोहन राकेश जी ने इस नाटक को लिखा है।
जयशंकर प्रसाद के शब्दों में- (स्कंदगुप्त 1928 की भूमिका) में उन्होंने लिखा था। “मेरा अनुमान था कि मातृगुप्त कालिदास तो थे परन्तु द्वितीय और काव्यकर्ता कालिदास।” इस प्रकार हम कह सकते है कि ‘आषाढ़ का एक दिन’ ऐतिहासिक नाटक है
नाटक के पात्र
कालिदास: कवि और नायक
अंबिका: गाँव की एक वृद्धा, मल्लिका की माँ
मल्लिका: अंबिका की पुत्री, कालिदास की प्रेमिका
दंतुल: राजगुरु
मातुल: कवि-मातुल
निक्षेप: गाँव का पुरुष
विलोम: गाँव का पुरुष
रंगीनी, संगिनी: दोनों नागरी
अनुस्वार, अनुनासिक: दोनों अधिकारी
प्रियंगुमंजरी: राजकराजकन्या, कवि-पत्नी
‘अषाढ़ के एक दिन’ नाटक का मुख्य बिंदु:
इस नाटक में मोहन राकेश जी ने भौतिक दर्शन और प्रवृति मार्ग और निवृति मार्ग के घनीभूत द्वंद्व का ही चित्रण किया है।
मोहन राकेश जी ने नाटक में यह दिखाया है कि जीवन में भोग कुछ समय के लिए आकृष्ट तो करता है किन्तु अंत में वह अपना महत्व खो देता है।
इस नाटक में इतिहास और कल्पना का सुन्दर समन्वय है। इस नाटक में तीन अंक और दृश्य भी तीन है।
आषाढ़ का एक दिन
आषाढ़ का एक दिन नाटक की कथानक:
अषाढ़ का एक दिन नाटक की कथावस्तु संस्कृत के प्रसिद्ध कवि नाटककार कालिदास जो कश्मीर के शासक के रूप में मातृगुप्त के रूप में प्रसिद्ध हुए की कहानी है। मल्लिका और कालिदास के प्रेम को आधार बनाकर नाटककार मोहन राकेश जी ने यथार्थ और भावना के द्वंद्व को दिखाया है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि जीवन में भावना का स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण होता है, लेकिन जीवन तो यथार्थ में ही जीना होता है।
यह एक त्रिखंडीय नाटक है। पहले खंड में युवक कालिदास हिमालय में स्थित अपने गाँव में शांतिपूर्ण जीवन गुजार रहें थे और अपनी कला को विकसित कर रहे थे। वहीँ पर उन्हें एक युवती मल्लिका के साथ प्रेम संबंध है। नाटक का दृश्य बदलता है, जब वहाँ से दूर उज्जयनी के कुछ दरबारी कालिदास से मिलते हैं और उसे सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार में चलने के लिए कहते हैं। कालिदास असमंजस में पड़ जाते हैं। एक तरफ उनका सुन्दर, शान्ति से भरा गाँव का जीवन है और दूसरी तरफ उज्जयनी के राजदरबार में प्रश्रय पाकर महानता पाने का अवसर।
कथा का आरंभ अषाढ़ के पहले दिन की वर्षा से होता है। मल्लिका कालिदास की भावनात्मक धरातल पर सच्चा और पवित्र प्रेम करती है। और वह उन्हें महान होते हुए भी देखना चाहती है। वह उन्हें उज्जयनी जाने की राय देती है। कालिदास भारी मन से उज्जयनी चले जाते हैं। उसकी माँ अंबिका कहती है कि जीवन में यथार्थ की पूर्ति भावना मात्र से नहीं हो सकती है। कालिदास उज्जयनी में राज कवि के रूप में बुलाये जाते हैं। आचार्य वररुचि उन्हें लेने के लिए आते हैं।
नाटक के दूसरे खण्ड में पता चलता है कि कालिदास की कीर्ति बढ़ती जाती है। उनका विवाह राजकन्या प्रियंगु मंजरी से हो जाता है। गाँव में मल्लिका दुखी और अकेले रह रही थी। उनको काश्मीर का राजा बनाया जाता है। अब वे कालिदास से मातृगुप्त बन जाते है। कालिदास और प्रियंगु मंजरी कश्मीर जाते हैं। वहाँ वे मल्लिका के गाँव में आते हैं, लेकिन कालिदास मल्लिका से नहीं मिलते हैं प्रियंगुमंजरी ही मल्लिका के घर जाकर उससे मिलती है। वह मल्लिका से सहानुभूति जताती है और कहती है कि वह उसे अपने सखी बना लेगी और उसका विवाह किसी राजसेवक के साथ करवा देगी। मल्लिका साफ़ इनकार कर देती है।
नाटक के तृतीय और अंतिम खण्ड में कालिदास गाँव में अकेले ही आता है। यह खबर मल्लिका को मिलती है कि कालिदास को कश्मीर का राज्यपाल बना दिया गया है लेकिन वह सबकुछ त्याग कर यहाँ आ गया है। समय का चक्र चलता है। मल्लिका की माँ की मृत्यु हो जाती है। मल्लिका की विवशता उसे ग्राम पुरुष विलोम के जाल में फ़सा देती है। निसहाय मल्लिका की शादी विलोम के साथ हो चुकी है और उसकी एक पुत्री है। कालिदास मल्लिका से मिलने आता है लेकिन मल्लिका के जीवन की इन सच्चाइयों को देख कालिदास निराश होकर चला जाता है। नाटक इसी जगह समाप्ति पर पहुँचता है।
यह नाटक दर्शाता है कि कालिदास के महानता पाने के लिए कालिदास और माल्लिका को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। जब कालिदास मल्लिका को छोड़कर उज्जयनी में बस जाता है, तब उसकी ख्याति और उसका रुतवा तो बढ़ जाता है लेकिन उसकी सृजनशक्ति चली जाती है। उसकी पत्नी प्रियंगुमंजरी इस प्रयास में जुटी रहती है कि उज्जयनी में भी कालिदास के इर्द-गिर्द उसके गाँव जैसा ही वातावरण बना रहे, लेकिन वह स्वयं मल्लिका नहीं बन पाती है।
नाटक के अंत में जब कालिदास की मल्लिका से अंतिम बार बात होती है तब वह मानता है कि “तुम्हारे सामने जो आदमी खड़ा है, यह वह कालिदास नहीं है जिसे तुम जानती थी।”
Monday, October 9, 2023
जो साथ न मेरा दे पाए, उनसे कब सूनी हुई डगर?
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
उस-उस राही को धन्यवाद।
जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं,
सीमित पग-डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं।
दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रमाद
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
उस-उस राही को धन्यवाद।
साँसों पर अवलम्बित काया, जब चलते-चलते चूर हुई,
दो स्नेह-शब्द मिल गए, मिली नव स्फूर्ति, थकावट दूर हुई।
पथ के पहचाने छूट गए, पर साथ-साथ चल रही याद
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
उस-उस राही को धन्यवाद।
जो साथ न मेरा दे पाए, उनसे कब सूनी हुई डगर?
मैं भी न चलूँ यदि तो भी क्या, राही मर लेकिन राह अमर।
इस पथ पर वे ही चलते हैं, जो चलने का पा गए स्वाद
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
उस-उस राही को धन्यवाद।
कैसे चल पाता यदि न मिला होता मुझको आकुल अन्तर?
कैसे चल पाता यदि मिलते, चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर।
आभारी हूँ मैं उन सबका, दे गए व्यथा का जो प्रसाद
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
उस-उस राही को धन्यवाद।
Thursday, September 28, 2023
मजदूरी और प्रेम
Wednesday, September 27, 2023
हिंदी गद्य के उद्भव और विकास
हिंदी गद्य के उद्भव और विकास
हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य पर भी पड़ा। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेज़ी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढ़ा और जीवन में बदलाव आने लगा। भावना के साथ-साथ विचारों को पर्याप्त प्रधानता मिली। पद्य के साथ-साथ गद्य का भी विकास हुआ और छापखाना के आते ही साहित्य के संसार में एक नयी क्रांति हुई।
हिंदी गद्य के संबंध में आरंभ के विद्वान एकमत नहीं है। कुछ इसका आरंभ 10वीं शताब्दी मानते हैं तो कुछ 11वीं शताब्दी और कुछ 13वीं शताब्दी। राजस्थानी एवं ब्रज भाषा में हमें गद्य के प्राचीनतम प्रयोग मिलते हैं। राजस्थानी गद्य की समय सीमा 11वीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी तथा ब्रज गद्य की सीमा 14वीं शताब्दी से 16वीं शताब्दी तक मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि 10वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी के मध्य ही हिंदी गद्य की शुरुआत हुई थी। खड़ी बोली के प्रथम दर्शन अकबर के दरबारी कवि गंग द्वारा रचित ‘चंद छंद बरनन’ की महिमा में मिलता है।
हिंदी गद्य साहित्य का विकास-
शैली की दृष्टि से साहित्य के दो भेद हैं- गद्य और पद्य। गद्य वाक्यबद्ध, विचारात्मक रचना है और पद्य छंदबद्ध/लयबद्ध भावात्मक रचना है। गद्य में बौद्धिक चेष्टाएँ और चिंतनशील मनःस्थितियाँ अपेक्षाकृत सुगमता से व्यक्त की जा सकती हैं, जबकि पद्य में भावपूर्ण मनःस्थितियों की अभिव्यक्ति सहज होती है। पद्य में संवेदना और कल्पना की प्रमुखता होती है और गद्य में विवेक की। इसी कारण पद्य को हृदय की भाषा और गद्य को मस्तिष्क की भाषा कहते हैं।
‘गद्य’ शब्द का उद्भव ‘गद्’ धातु के साथ ‘यत्’ प्रत्यय जोड़ने से हुआ है। ‘गद्’ का अर्थ है- बोलना, बताना या कहना। विषय और परिस्थिति के अनुरूप शब्दों का सही स्थान निर्धारण तथा वाक्यों की उचित योजना ही गद्य की उत्तम कसौटी है। इसलिए गद्य में अनेक विधाओं का समावेश है।
गद्य की प्रमुख निम्नलिखित विधाएँ हैं- निबंध, नाटक, कहानी, संस्मरण, एकांकी, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, यात्रावृत्त, जीवनी, डायरी, पत्र, भेंटवार्ता आदि। आरंभ में अनेक विधाओं को कहानी, निबंध आदि के साथ ही सम्मिलित कर लिया जाता था। किन्तु 19वीं शताब्दी के चौथे दशक से इनका स्वतंत्र अस्तित्व परिलक्षित होने लगा।
राष्ट्रभाषा के रूप में मानक हिन्दी खड़ी बोली का ही परिनिष्ठित रूप है। खड़ी बोली गद्य की प्रामाणिक रचनाएँ सत्रहवीं शताब्दी से प्राप्त होती है। इसका प्रमाण जटमल कृत “गोरा बादल” की कथा है। प्रारंभिक गद्य खड़ी बोली ब्रजभाषा से प्रभावित है। ब्रजभाषा के प्रभाव से मुक्त खड़ी बोली गद्य का आरम्भ उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ। खड़ी बोली गद्य का एक रूप “दक्खिनी गद्य” का है। मुस्लिम शासकों के समय, विशेषकर मोहम्मद तुगलक के शासन काल में अनेक उत्तर के मुसलमान दक्षिण में जाकर बस गए थे। ये अपने साथ उत्तर की खड़ी बोली को दक्षिण ले गए। इससे वहाँ “दक्खिनी हिन्दी” का विकास हुआ। दक्खिनी खड़ी बोली गद्य का प्रामाणिक रूप 1580 ई. से प्राप्त होता है। लगभग अठारहवीं सदी के मध्य काल से लेकर बीसवीं सदी के मध्य काल तक (सन् 1785 से 1843 ई.)।
खड़ी बोली गद्य के प्रारंभिक स्वरूप के उन्नयन में चार लेखकों का योगदान महत्त्वपूर्ण है-
पंडित लल्लू लाल (सन् 1763-1825 ई.)
* ये फोर्ट विलियम कॉलेज में भाखा मुंशी पद पर नियुक्त थे। इन्होंने ‘भागवत’ के ‘दशम स्कंध’ की कथा के आधार पर ‘प्रेमसागर’ की रचना की।
* ये आगरा के गुजराती ब्राहमण थे। इसकी भाषा पर ब्रज का प्रभाव था।
द्विवेदी जी के शब्दों में- “इस ब्रजरंजित खड़ी बोली में भी वह सहज प्रभाव नहीं है जो सदासुखलाल की भाषा में है।” शुक्ल जी के दृष्टि में इनकी भाषा “नित्य व्यवहार के अनुकूल नहीं है। ये ‘उर्दू’ भाषा को ‘यामिनी’ भाषा कहते थे और उससे दूर रहने की सलाह देते थे। ग्रियर्सन के अनुसार ‘प्रेमसागर’ की भाषा हिंदी गद्य की स्टैंडर्ड बनी।
‘लालचंद्रिका’ की भूमिका में लल्लूलाल ने अपने ग्रंथ की भाषा के तीन भेद बताएँ हैं- ब्रज, खड़ीबोली और रेख्ते की बोली।
पंडित सदल मिश्र (सन् 1767-1848 ई.)
ये बिहार के रहनेवाले थे। लल्लूलाल की तरह ये भी भाखा मुंशी पद पर थे। इन्होंने ‘नासिकेतोपाख्यान’ की रचना की। ‘नासिकेतोपाख्यान’ पर ब्रज और भोजपुरी का प्रभाव है। किन्तु यह सीधे संस्कृत होने के कारण हिंदी के प्रकृति के अनुरूप है। शुक्ल जी ने इनकी भाषा को साफ़ सुथरी और व्यवहारोपयोगी कहा है। इनकी भाषा में पूर्वीपन और पंडिताऊपन है। आधुनिक हिंदी गद्य का जो आभास ‘सदासुखलाल’ और ‘सदल मिश्र’ की भाषा में दिखाई देता है उसी का आगे विकास हुआ।
मुंशी सदासुखलाल ‘नियाज’ (सन् 1746-1824 ई.)
मुंशी सदासुखलाल ने ‘विष्णु पुराण’ का अंश लेकर उसे खड़ी बोली में प्रस्तुत किया। इनकी भाषा शैली में पंडिताऊपन और वाक्य रचना पर फारसी शैली का प्रभाव था। ये फोर्ट विलियम कॉलेज के बाहर के लेखक थे। ये उर्दू और फ़ारसी के अच्छे लेखक और कवि थे। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार- “इनकी भाषा कुछ निखरी हुई और सुव्यवस्थित है, पर तत्कालीन प्रचलित पंडिताऊ प्रयोग भी इनमे मिल जाते हैं।” ‘सुखसागर’ के अतिरिक्त विष्णुपुराण के प्रसंगों के आधार पर मुंशी सदासुखलाल ने एक अपूर्ण ग्रंथ की भी रचना की थी। इनकी भाषा में ‘सहजता’ और ‘स्वाभाविकता’ है।
मुंशी इंशा अल्ला खाँ (सन् 1735- 1818 ई.)
मुंशी इंशाअल्ला खाँ ने चटपटी हास्य प्रधान शैली में उदयभान चरित/ रानी केतकी की कहानी लिखी। कहानी लिखने का कारण स्पष्ट करते हुए मुंशी जी ने लिखा है- ‘एक दिन बैठे-बैठे यह ध्यान आया कि कोई ऐसी कहानी कहिए जिसमे हिंदवी छुट और किसी बोली का पुट न मिले, तब जाके मेरा जी फूल की कली के रूप में खिले। बाहर की बोली और गँवारी कुछ उसके बीच में न हो, बस जैसे भले लोग अच्छों से आपस में बोलते-चालते हैं, ज्यों का त्यों वही सब डौल रहे और छाँव किसी की न हो यह नहीं होने का।”
राजा शिवप्रसाद सितारे-ए-हिन्द (1823- 1895 ई.)
राजा शिवप्रसाद ‘सितारे’ हिंदी विभाग में निरीक्षक के पद पर थे। ये हिंदी के प्रबल पक्षधर थे। इसलिए इसे ये पाठ्यक्रम की भाषा बनाना चाहते थे। चूकी उस समय साहित्य के पाठ्यक्रम के लिए कोई भी पुस्तक नहीं थी इसलिये उन्होंने स्वयं कोर्स की पुस्तकें लिखी और उसे हिंदी पाठ्यक्रमों में स्थान दिलवाया। इन्हीं के प्रयत्नों से शिक्षा जगत में हिंदी कोर्स की भाषा बनी। इसके बाद उन्होंने बनारस से ‘बनारस अखबार’ निकाला। इसी अखबार के द्वारा राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द ने हिंदी का प्रचार-प्रसार किया। ये हिंदी में विशुद्ध लेख लिखते थे। इन्होंने हिंदी कोर्स की पुस्तकों के लिए पंडित श्रीलाल और पंडित बंशीधर को भी इस कार्य के लिए प्रेरित किया। इसके अतिरिक्त इन्होंने ‘वीरसिंह का वृतांत’ आलसियों का कोड़ा जैसी रचनाओं का सृजन किया। इनकी गद्य भाषा प्रभावशाली और सरल थी। इसका उदहारण “राजा भोज का सपना” में इस प्रकार है- “वह कौन सा मनुष्य है जिसने महाप्रतापी राजा भोज का नाम न सुना हो। उनकी महिमा और कीर्ति तो सारे जगत में व्याप्त रही है। बड़े-बड़े महिपाल उनका नाम सुनते ही काँप उठते और बड़े-बड़े भूपति उसके पाँव पर अपना सिर नवाते।” राजा जी उर्दू के पक्षपाती थे। उन्होंने 1864 ई. में “इतिहास तिमिर नाशक” ग्रंथ लिखा।
राजा लक्षमणसिंह (1887-1956 ई.)
राजा लक्षमणसिंह आगरा के निवासी थे। इन्होंने हिंदी और उर्दू को दो भिन्न-भिन्न भाषाओँ के रूप में स्वीकार किया था। ये हिंदी उर्दू शब्दावली प्रधान गद्य भाषा का प्रयोग करते थे। राजा लक्षमणसिंह ने कालिदास के मेघदूतम, अभिज्ञान शाकुन्तलम् और रघुवंश का हिंदी अनुवाद किया। इन्होंने हिंदी गद्य विकास के लिए 1841 ई. में ‘प्रजा हितैसी’ पत्र भी संपादित और प्रकाशित किया। इनकी गद्य भाषा उत्कृष्ट थी। उदाहरण के लिए ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ का अनुदित गद्य है- “अनसूया (हौले प्रियबंदा से) सखी मैं तो इसी सोच विचार में हूँ। अब इससे कुछ पूछूँगी। (प्रकट) महात्मा तुम्हारे मधुर वचनों के विश्वास में आकार मेरा जी यह पूछने को चाहता है कि तुम किस राजवंश के भूषण हो और किस देश की पूजा को विरह में व्याकुल छोड़कर यहाँ पधारे हो? क्या कारण है? (हिंदी साहित्य का इतिहास- आचार्य रामचंद्र शुक्ल पृष्ठ-300)।
राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द और राजा लक्षमण सिंह के अलावा और अनेक प्रतिभाशाली लेखकों ने हिंदी गद्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अनेक गद्य लेखकों ने अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किए और पाठ्य पुस्तकें लिखी। उनमे श्री मथुराप्रसाद मिश्र, श्री ब्रजवासी दास, श्री रामप्रसाद त्रिपाठी, श्री शिवशंकर, श्री बिहारीलाल चौबे, श्री काशीनाथ खत्री, श्री रामप्रसाद दूबे आदि प्रमुख थे। इसी समय स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ जैसे ग्रंथ की हिंदी गद्य में रचना कर हिन्दू धर्म की कुरीतियों को समाप्त किया। बाबू नवीन चंद्रराय ने 1863-1880 ई. के मध्य हिंदी के विभन्न विषयों की पुस्तकें लिखी और लिखवाई। इसी तरह श्रद्धानंद फुल्लौरी ने सत्यमृत प्रवाह, आत्म चिकत्सा, तत्वदीपक, धर्मरक्षा, उपदेश संग्रह, आदि पुस्तकें लिखकर हिंदी गद्य के विकास में नयी दिशा प्रदान की।
इन लेखकों के कुछ समय पहले रामप्रसाद निरंजनी ने ‘भाषा योगवशिष्ठ’ में तथा मध्यप्रदेश के पं. दौलतराय साधु थे। उनहोंने अपनी रचनाओं में खड़ी बोली गद्य का प्रयोग किया था। इन्हीं दिनों ईसाई मिशनरी ने भी बाइवल का हिन्दी खड़ी बोली गद्य में अनुवाद कराकर हिन्दी गद्य के विकास में अपना योगदान दिया। किन्तु उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण तक हिन्दी गद्य का स्वरूप पूर्णतः परियोजित नहीं हो पाया था। उन्नीसवीं शताब्दी का द्वितीय एवं तृतीय चरण भारतीय सामाजिक एवं राष्ट्रीयता के जागरण का काल था। इस नवीन चेतना का अभ्युदय बंगाल से हुआ। यहीं से समाचार पत्रों के प्रकाशन का प्रारंभ हुआ। यह प्रदेश ब्रजभाषा से दूर था इसलिए नवीन चेतना को अभिव्यक्त करने का भार खड़ी बोली पद्य को वहन करना पड़ा। नवीन चेतना के इस जागरण काल में अनेक संस्थाओं का योगदान था। इनमें प्रमुख थीं- ब्रह्मसमाज, रामकृष्ण मिशन, प्रार्थना समाज, आर्यसमाज, थियोसाफिकल सोसायटी इत्यादि। इन संस्थाओं में विशेषकर आर्यसमाज ने अपने विचारों के प्रचार-प्रसार का माध्यम हिन्दी गद्य को बनाया।
हिंदी गद्य के विकास को सोपानों में विभक्त किया गया है-
भारतेंदु पूर्व युग (1800-1850 ई.)
भारतेंदु युग 1850-1900 ई.
द्विवेदी युग (1900-1920 ई.)
शुक्ल युग (1920-1936 ई.)
अद्यतन (1936 ई. से आजतक
भारतेन्दु पूर्व युग (1800 -1850 ई.)
हिंदी में गद्य का विकास 19वीं शताब्दी के आसपास से माना जाता है विकास के इस काल में कलकाता फोर्ट विलियम कॉलेज की महत्वपूर्ण भूमिका रही इस कॉलेज के दो विद्वान लल्लूलाल तथा सदल मिश्र ने गिलक्रिस्ट के निर्देशन में प्रेमसागर तथा नासिकेतोपाख्यान नामक दो पुस्तके तैयार की। इसी समय सदासुख लाल ने सुखसागर तथा मुंशी इंशाअल्लाह ने रानी केतकी की कहाणी की रचना की। इन सभी ग्रंथों की भाषा में उस समय के प्रयोग में आने वाली खड़ी बोली को स्थान मिला। आधुनिक खड़ी बोली गद्य के विकास में विभिन्न धर्मों की पुस्तकों का खूब सहयोग रहा जिसमे ईसाई धर्म का भी सहयोग था। बंगाल के राजा राममोहन राय ने 1815 ई. में वेदांतसूत्र का हिंदी अनुवाद कर प्रकाशित करवाया इसके बाद उन्होंने 1829 ई. में बंगदूत नाम का पत्र हिंदी में निकाला। इसके पहले 1826 ई. में कानपुर के पंडित जुगलकिशोर हिंदी पहला समाचार पत्र उदंतमार्तंड कलकाता से निकाला। आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश हिंदी में लिखा।
भारतेन्दु युग (1850 -1900 ई.)
भारतेन्दु जी के पूर्व हिन्दी गद्य में दो शैलियाँ प्रचलित थीं। प्रथम राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद की 1823 से 1895 गद्य शैली थी। वे हिन्दी को नफीस बनाकर उसे उर्दू जैसा रूप प्रदान करने के पक्षधर थे। दूसरी शैली के प्रवर्तक राजा लक्ष्मणसिंह थे जो हिंदी को अधिकाधिक संस्कृतनिष्ठ करने के पक्षधर थे। भारतेंदु ने इन दोनों के बीच का मार्ग ग्रहण कर उसे हिंदी भाषा प्रदेशों की जनता के मनोनुकूल बनाया। लोक प्रचलित शब्दावली के प्रयोग के कारण भारतेन्दु जी का गद्य व्यावहारिक, सजीव, और प्रवाहपूर्ण है। बालकृष्ण भट्ट, पं. प्रताप नारायण मिश्र, राधाचरण गोस्वामी, बदरी नारायण चौधरी “प्रेमधन”, ठाकुर जगमोहन सिंह, राधाकृष्ण दास एवं किशोरी लाल गोस्वामी भारतेंदु जी के सहयोगी एवं समकालीन लेखक थे।
पं. बालकृष्ण भट्ट इलाहाबाद से “हिन्दी प्रदीप” नामक मासिक पत्र निकालते थे। उनकी शैली विनोदपूर्ण और चुटीली थी तथा इसमें व्यंग्य में सरसता के साथ मार्मिकता भी है। उन्होंने अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत तथा लोक भाषा के शब्द लिए। उनके निबंधों के विषय में विविधता थी। प्रतापनारायण मिश्र ने “ब्राम्हण” पत्रिका के माध्यम से हिन्दी गद्य साहित्य को समृद्ध करने का प्रयास किया। उन्होंने समाज सुधार एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान की दृष्टि से निबंध लिखे। चुलबुलापन, हास-परिहास, आत्मीयता और सहजता उनकी भाषा शैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं। बदरी नारायण चौधरी “प्रेंमधन” “आनंद कादम्बिनी” पत्रिका का संपादन करते थे। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ तथा शैली काव्यात्मक है। श्री राधाचरण गोस्वामी, ठाकुर जगमोहन सिंह ने सामयिक समस्याओं पर निबंध लिखे।
द्विवेदी युग (1900-1920 ई.)
भारतेन्दु युग में हिंदी गद्य का स्वरूप काफी हद तक निखरा किंतु अभी भी उसमें परिष्कार परिमार्जन की आवश्यकता थी। यह कार्य द्विवेदी युग में पूरा हुआ। इस काल का नामकरण पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर किया गया। द्विवेदी जी ने “सरस्वती” के माध्यम से व्याकरणनिष्ठ, स्पष्ट एवं विचारपूर्ण गद्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। उन्होंने तत्कालीन भाषा का परिमार्जन कर उसे व्याकरण-सम्मत रूप प्रदान किया और साहित्यकारों को विविध विषयों पर लेखन के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित किया।
द्विवेदी युग के प्रमुख गद्यकारों में श्री माधव मिश्र, गोविंद नारायण मिश्र, ‘पद्मसिंह शर्मा, सरदारपूर्ण सिंह, बाबू श्यामसुंदर दास, मिश्र बंधु, बाबा भगवानदीन, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि हैं। इस काल में अनेक गंभीर निबंध, विवेचनापूर्ण आलोचनाएँ, कहानियाँ, उपन्यास तथा नाटक लिखे गये और इस प्रकार गद्य साहित्य के विविध रूपों का विकास हुआ।
हिन्दी निबंध और आलोचना के क्षेत्र में बाबू श्यामसुंदर दास का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने “नागरी प्रचारिणी” सभा की स्थापना की तथा साहित्यिक, सांस्कृतिक भाषा एवं वैज्ञानिक विषयों पर निबंध लिखे। चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी ने अपनी पांडित्यपूर्ण व्यंग्य प्रधान शैली में निबंध और कहानियाँ लिखकर हिन्दी गद्य साहित्य को समृद्ध किया। सरस्वती के अतिरिक्त “प्रभा”, “मर्यादा”, “माधुरी”, “इन्दु”, “सुदर्शन”, “समालोचक”, आदि अन्य पत्रिकाओं में भी गद्य साहित्य के प्रचार एवं प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस युग के उत्तरार्ध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और बाबू गुलाबराय के आविर्भाव से हिंदी गद्य की विकासधारा को एक नई दिशा मिली।
शुक्ल युग (1920 – 1936 ई०)
द्विवेदी युग नैतिक मूल्यों के आग्रह का युग था। जबकि इस युग में द्विवेदी युग की प्रतिक्रिया स्वरूप साहित्य में भाव-तरलता, कल्पना-प्रधानता और स्वच्छंद चेतना आदि भावनाओं का समावेश हुआ। परिणाम यह हुआ कि इस युग में रचित गद्य साहित्य अधिक कलात्मक, लाक्षणिक, कवित्वपूर्ण और अंतर्मुखी हो गया। इस युग के प्रमुख गद्यकारों में आचार्य रामचंद्र शुक्ल, बाबू गुलाबराय, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, रामकृष्ण दास, वियोगी हरि, डॉ. रघुवीर सिंह, शिवपूजन सहाय, वर्मा, पंत, निराला, नंददुलारे बाजपेयी, बेचन शर्मा ‘उग्र’ के नाम मुख्य हैं।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने दो प्रकार के निबंध लिखे – ‘साहित्यिक’ एवं ‘मनोविकार’ संबंधी। उनके साहित्यिक निबंध भी दो वर्ग के हैं – ‘सैद्धांतिक’ तथा ‘व्यावहारिक’ समीक्षा से संबंधित। शुक्ल जी को युगांतकारी निबंधकार कहा जाता है। इसका श्रेय उनके मनोविकार संबंधी निबंधों को जाता है। गुलाबराय जी के कुछ निबंध साहित्यिक विषयों पर तथा कुछ सामान्य विषयों पर लिखे गए हैं। बख्शी जी के निबंध विचारात्मक, समीक्षात्मक तथा विवरणात्मक हैं।
अद्यतन युग (1936 से आजतक )
इस काल में गद्य का चहुंमुखी विकास हुआ इस युग में मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित होकर लेखकों ने यथार्थवादी जीवन दर्शन को महत्व देना आरंभ किया। इस युग में साहित्यकारों की दो पीढ़ियाँ परिलक्षित की जा सकती हैं।
प्रथम पीढ़ी उन साहित्यकारों की है जो स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व से लिखते आ रहे थे। इस पीढ़ी में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, शांतिप्रिय द्विवेदी, रामधारी सिंह दिनकर, यशपाल, उपेन्द्रनाथ अश्क, भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर, जैनेंद्र, अज्ञेय, रामवृक्ष बेनीपुरी, वासुदेव शरण अग्रवाल तथा भगवत शरण उपाध्याय आदि प्रमुख हैं।
दूसरी पीढ़ी उन लेखकों की है जो स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद साहित्य सृजन में प्रवृत्त हुए हैं। इनमें श्री विद्या निवास मिश्र, हरिशंकर परसाई, कुबेरनाथ राय, फणीश्वरनाथ रेणु, धर्मवीर भारती, शिवप्रसाद सिंह के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। इस युग में हिन्दी गद्य साहित्य में नवीन कलात्मक गद्य विधाओं का विकास हुआ तथा उसे राष्ट्रीय गरिमा प्राप्त हुई। आज हिन्दी की यह स्थिति है कि उसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित मान्यता मिलने लगी है।
निष्कर्ष- हिंदी गद्य के विकास में भारतेंदु हरिश्चंद्र का विशेष योगदान है लेकिन भारतेंदु युग के पहले से ही हिंदी गद्य का आरंभ हो चूका था। आधुनिक काल हिंदी गद्य का सर्वांगीण विकास का काल है। इस युग में गद्य के सभी विधाओं का उद्भव हुआ। जिसके परिणाम स्वरुप हिंदी भाषा आज विश्व की भाषाओं में गिनी जाती है।
