Friday, October 23, 2026

प्रशांत भैया: यादों में हमेशा ज़िंदा रहेंगे आप!

प्रशांत भैया: यादों में हमेशा ज़िंदा रहेंगे आप!





विद्यार्थी जीवन की कितनी मधुर स्मृतियाँ जुड़ी हैं प्रशांत भैया के साथ! उनका साथ हमें विशेष बनाता था। उनकी वाक्पटुता, निडरता और बेबाक अंदाज़ उन्हें सबसे अलग बनाता था। वे किसी से डरते नहीं थे, सचमुच करेजा के धनी व्यक्ति थे।

उनकी वजह से हम अक्सर खबरों में बने रहते थे। एक अलग ही भौकाल था। लोग कहते थे, “प्रभात को बोलो, प्रभात खबर में छपवा देगा!” और इस बात के पीछे प्रशांत भैया का साथ और उनका पत्रकारिता जगत में प्रभाव था।

एम.ए. के दिनों में मैंने सबसे अधिक समय प्रशांत भैया के साथ बिताया। गंगाघाट हमारी पसंदीदा जगह हुआ करती थी। वहीं से ब्रेड टोस्ट खाने की आदत लगी। आज भी गंगाघाट की यादों के साथ ब्रेड टोस्ट का स्वाद और प्रशांत भैया का चेहरा आँखों के सामने आ जाता है।

प्रशांत भैया बहुत से लोगों के चहेते थे। उनके मुँह से भोजपुरी सुनना और उनका अपने खास अंदाज़ में गालियाँ देना भी अच्छा लगता था। उनके साथ रहने पर कभी पैसों की चिंता नहीं होती थी। वे साथ होते थे तो लगता था कि सब संभल जाएगा।

प्रेसीडेंसी के दिनों में एक आंदोलन के दौरान उनसे घनिष्ठता बढ़ी। उस आंदोलन ने एक बात बहुत अच्छी तरह सिखा दी कि आंदोलन में सामने दिखाई देने वाले और सचमुच साथ खड़े रहने वाले लोगों में बहुत अंतर होता है। उस दौर में यह भी महसूस हुआ कि हिंदी वाले संवेदना पर लिखना और बोलना तो जानते हैं, लेकिन हर किसी के भीतर संवेदना नहीं होती। प्रशांत भैया उन विरले लोगों में थे, जिनके भीतर संवेदना थी। वे जरूरतमंदों के लिए खड़े होते थे। दूसरों के दुःख को समझना और उनके लिए कुछ करना उनके स्वभाव का हिस्सा था।

शायद समाज की विडंबना ही है कि जो व्यक्ति बाहर के लोगों के लिए बेहद प्रिय होता है, उसे कभी-कभी अपने ही घर में निकम्मा कहा जाता है। लेकिन किसी व्यक्ति की असली पहचान उसके अपनों के बीच नहीं, बल्कि उन लोगों के दिलों में होती है, जिनके लिए वह खड़ा रहा हो।

जिस प्रशांत भैया से मैं अन्नपूर्णा कराने के लिए जिद किया करता था, आज उन्हीं प्रशांत भैया के नाम पर अन्नपूर्णा कराना पड़ रहा है। समय का यह बदलाव मन को भीतर तक झकझोर देता है। कभी जिनके साथ बैठकर भोजन की बातें होती थीं, आज उन्हीं की स्मृति में जरूरतमंदों को भोजन कराना पड़ रहा है। मन यह स्वीकार ही नहीं कर पाता कि प्रशांत भैया अब हमारे बीच नहीं हैं।

प्रशांत भैया, आपने अपनी जिंदगी अपने अंदाज़ में जी। निडर होकर, बेबाक होकर और जरूरतमंदों के साथ खड़े होकर। आपकी हँसी, आपकी भोजपुरी, आपका बेबाक अंदाज़, गंगाघाट की वे शामें और विद्यार्थी जीवन की अनगिनत स्मृतियाँ हमेशा हमारे साथ रहेंगी।

आपके जाने से जीवन का एक ऐसा अध्याय बंद हो गया, जिसे हम बार-बार पढ़ना चाहेंगे, लेकिन अब उसे जी नहीं पाएँगे।

प्रशांत भैया, आपकी यादों में हम रहें या न रहें, लेकिन हमारी यादों में आप हमेशा रहेंगे।

आपकी कमी हमेशा खलेगी, भैया!